केंद्र सरकार की गरीबों और गर्भवती महिलाओं के लिए चलाई जा रही सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक, 'प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना' (PMMVY) में भ्रष्टाचार का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। सिस्टम में बैठे भ्रष्टाचारियों और दलालों के गठजोड़ ने योजना में बड़ी सेंधमारी करते हुए करीब 96 लाख रुपये का गबन कर लिया है। यह सरकारी धन, जो गरीब गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के पोषण और स्वास्थ्य के लिए था, उसे 1000 से अधिक फर्जी बैंक खातों में ट्रांसफर कर डकार लिया गया।READ ALSO:-कुदरत की आतिशबाजी: आज रात आसमान में होगी 'सितारों की बरसात', 1 घंटे में 70 बार टूटेंगे तारे; जानें इस खगोलीय घटना का पूरा सच
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इस बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा होते ही बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग (ICDS) से लेकर जिला प्रशासन तक में हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से उच्च-स्तरीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।
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क्या है पीएम मातृत्व वंदना योजना (PMMVY)?

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यह योजना केंद्र सरकार द्वारा गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य और पोषण स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य से चलाई जाती है। इसके तहत, पात्र लाभार्थियों को वित्तीय सहायता सीधे उनके बैंक खातों (DBT) में भेजी जाती है।
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    पहला बच्चा: पहले जीवित बच्चे के जन्म पर तीन किस्तों में कुल 5,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
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    दूसरा बच्चा: यदि दूसरी संतान बालिका होती है, तो एकमुश्त 6,000 रुपये का लाभ दिया जाता है।
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    इसके अतिरिक्त, संस्थागत प्रसव (अस्पताल में डिलीवरी) कराने पर जननी सुरक्षा योजना के तहत अलग से लाभ मिलता है। सरकार की मंशा है कि इस राशि से गर्भवती महिलाएं प्रसव पूर्व और प्रसव बाद अपनी देखरेख कर सकें, लेकिन भ्रष्टाचारियों ने इसी मंशा पर पानी फेर दिया।
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सुनियोजित साजिश: कैसे हुआ खुलासा?

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यह घोटाला कोई मानवीय भूल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश का नतीजा है। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि भ्रष्टाचारियों ने बेहद शातिराना अंदाज में इस खेल को अंजाम दिया। बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग (ICDS) द्वारा कराई गई एक आंतरिक ऑडिट (Internal Audit) के दौरान इस गड़बड़ी की परतें खुलीं। ऑडिट टीम ने पाया कि लाभार्थियों की सूची और उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए बैंक खातों के सत्यापन विवरण में भारी विसंगतियां (Discrepancies) हैं। जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि जिन खातों में पैसा भेजा गया है, उनमें से 1000 से ज्यादा खाते फर्जी या संदिग्ध हैं।
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आशंका जताई जा रही है कि इस पूरे प्रकरण के पीछे कोई संगठित गिरोह सक्रिय हो सकता है, जिसने विभाग के कुछ लोगों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज तैयार कर इस घोटाले को अंजाम दिया।
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सदर ब्लॉक बना भ्रष्टाचार का 'हॉटस्पॉट'

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जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) राजेश त्रिपाठी ने इस बड़े गबन की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि यह पूरी अनियमितता डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) प्रक्रिया में की गई है, जो सीधे लाभार्थियों के खाते में पैसा भेजने का तंत्र है। डीपीओ के अनुसार, प्रारंभिक जांच में 96 लाख रुपये के गबन का आंकड़ा सामने आया है।
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हैरानी की बात यह है कि जांच में जिले का सदर ब्लॉक इस घोटाले का केंद्र बिंदु बनकर उभरा है। सबसे अधिक फर्जीवाड़े और फर्जी बैंक खातों की संख्या इसी ब्लॉक में पाई गई है। इससे स्थानीय स्तर पर तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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एक्शन में प्रशासन: तीन अफसरों की कमेटी गठित

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घोटाले की गूंज ऊपर तक पहुँचने के बाद जिला प्रशासन सख्त एक्शन के मूड में है। मुख्य विकास अधिकारी (CDO) सार्थक अग्रवाल ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। उनके निर्देश पर तत्काल प्रभाव से एक उच्च-स्तरीय जांच कमेटी का गठन कर दिया गया है। इस कमेटी में तीन वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया है, जो इस पूरे प्रकरण की गहनता से जांच करेंगे।
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कमेटी को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे यह पता लगाएं कि फर्जी खाते कैसे खोले गए, लाभार्थियों का सत्यापन किसने किया, और इस पूरे खेल में कौन-कौन लोग शामिल हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और उनके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, जांच टीम दस्तावेजों को खंगालने में जुट गई है।
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