रसोई गैस (LPG) आज हर घर की बुनियादी जरूरत है। एक छोटे से बदलाव का असर देश के करोड़ों परिवारों पर पड़ता है। ऐसे में एलपीजी गैस उपभोक्ताओं (LPG Consumers) के लिए एक बेहद चौंकाने वाली लेकिन सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। अगर आप अपने गैस कनेक्शन में दर्ज रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर (Registered Mobile Number) को बदलने की सोच रहे हैं, तो अब यह काम पहले की तरह चुटकियों में नहीं होगा। पेट्रोलियम कंपनियों ने सुरक्षा को पुख्ता करने और गैस सब्सिडी व डिलीवरी में हो रहे फर्जीवाड़े को जड़ से खत्म करने के लिए नियमों में बड़ा बदलाव किया है।READ ALSO:-ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर हो गया है? तुरंत करें ये काम, वरना रद्द हो जाएगा लाइसेंस और कटेगा भारी चालान; जानें ऑनलाइन रिन्यूअल का A to Z प्रोसेस
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अब गैस कनेक्शन में मोबाइल नंबर तुरंत अपडेट नहीं किया जाएगा। नए नियम के अनुसार, नंबर बदलने की प्रक्रिया में अब पूरे 90 दिन (3 महीने) का समय लगेगा। साथ ही, अब इस प्रक्रिया के लिए बायोमेट्रिक जांच (Biometric Verification) को भी अनिवार्य कर दिया गया है। आइए इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि इसका आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
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क्या है एलपीजी का यह नया नियम? (What is the New LPG Rule?)

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पहले की व्यवस्था में, यदि किसी उपभोक्ता का मोबाइल नंबर खो जाता था या वह नया नंबर लेना चाहता था, तो वह आसानी से अपनी गैस एजेंसी पर जाकर या ऑनलाइन पोर्टल/ऐप के माध्यम से तुरंत अपना मोबाइल नंबर अपडेट कर लेता था। मिनटों में नया नंबर सिस्टम में चढ़ जाता था और उसी नंबर पर गैस बुकिंग और डिलीवरी के मैसेज आने लगते थे।
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लेकिन, नई व्यवस्था के तहत इस त्वरित प्रक्रिया (Instant Update) पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। अब जब आप नंबर बदलने का आवेदन करेंगे, तो वह नंबर तुरंत चालू (Active) नहीं होगा। सिस्टम में इस नए नंबर को पूरी तरह से रजिस्टर होने और एक्टिवेट होने में 90 दिन की प्रतीक्षा अवधि (Waiting Period) लगेगी। इस दौरान पुरानी और नई दोनों जानकारियों का गहन सत्यापन किया जाएगा।
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बायोमेट्रिक और KYC (e-KYC) हुआ पूरी तरह अनिवार्य

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सिर्फ 90 दिन का इंतजार ही नहीं, बल्कि आवेदन की प्रक्रिया को भी सख्त बना दिया गया है। पेट्रोलियम कंपनियों (जैसे- Indane, HP Gas, Bharat Gas) ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना 'बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन' के मोबाइल नंबर में कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा।
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इसका मतलब क्या है?

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    उपभोक्ता को स्वयं अपनी गैस एजेंसी या वितरक (Distributor) के पास जाना होगा।
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    वहां फिंगरप्रिंट स्कैनर या आइरिस स्कैनर के जरिए उनके बायोमेट्रिक्स लिए जाएंगे।
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    उपभोक्ता का आधार कार्ड (Aadhaar Card) और गैस पासबुक का मिलान किया जाएगा।
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    ई-केवाईसी (e-KYC) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सिस्टम मोबाइल नंबर बदलने के अनुरोध को स्वीकार करेगा।
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    यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जो व्यक्ति नंबर बदलवा रहा है, वह वास्तव में वही है जिसके नाम पर गैस कनेक्शन जारी किया गया है।
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कंपनियों को क्यों लेना पड़ा यह सख्त फैसला? (Why this Strict Decision?)

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हर कड़े नियम के पीछे कोई न कोई बड़ी वजह होती है। पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा उठाए गए इस कदम के पीछे देश भर में फैले 'गैस माफिया' और 'कालाबाजारी' का बहुत बड़ा खेल है।
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1. फर्जी डिलीवरी का खेल: लगातार ऐसी शिकायतें आ रही थीं कि डिलीवरी बॉय या कुछ बिचौलिए उपभोक्ताओं की जानकारी के बिना ही उनके गैस कनेक्शन का मोबाइल नंबर सिस्टम में बदल देते थे। इसके बाद वे उस कनेक्शन पर गैस बुक करके, सिलेंडर को ब्लैक मार्केट (काले बाजार) में ऊंचे दामों पर बेच देते थे, जबकि असली उपभोक्ता को पता ही नहीं चलता था।
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2. सब्सिडी की चोरी: उज्ज्वला योजना (Ujjwala Yojana) और सामान्य सब्सिडी वाले सिलेंडरों में मोबाइल नंबर का बहुत महत्व है। ओटीपी (OTP) आधारित डिलीवरी सिस्टम को चकमा देने के लिए शातिर लोग मोबाइल नंबर बदलकर डिलीवरी को प्रमाणित कर देते थे, जिससे असली हकदार को सब्सिडी और सिलेंडर दोनों का नुकसान होता था।
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3. अनजान नंबरों का जुड़ना: कई बार उपभोक्ताओं के फोन पर अचानक मैसेज आता था कि उनकी गैस डिलीवर हो गई है, जबकि उन्होंने बुकिंग ही नहीं की होती थी। जांच में पता चलता था कि उनका रजिस्टर्ड नंबर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हैक या बदल दिया गया है। इसी तरह की सैकड़ों शिकायतों को संज्ञान में लेते हुए कंपनियों ने यह 90 दिन का 'कूलिंग पीरियड' और बायोमेट्रिक अनिवार्य किया है।
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उपभोक्ताओं पर क्या होगा सीधा असर? (Impact on LPG Consumers)

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हालांकि यह कदम सुरक्षा के लिहाज से बहुत अच्छा है, लेकिन इससे आम उपभोक्ताओं, विशेषकर ग्रामीण इलाकों के लोगों को कुछ व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
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    तत्काल नंबर बदलने वालों को दिक्कत: अगर किसी उपभोक्ता का मोबाइल चोरी हो जाता है, सिम टूट जाता है या वह किसी कारणवश तुरंत नया नंबर इस्तेमाल करना शुरू करता है, तो उसे भारी परेशानी होगी। नए नंबर से गैस बुक करने या डिलीवरी ओटीपी (Delivery Authentication Code - DAC) प्राप्त करने में 90 दिनों तक बाधा आ सकती है।
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    बुकिंग और डिलीवरी में देरी: भारत में अब गैस की बुकिंग व्हाट्सएप (WhatsApp), मिस्ड कॉल (Missed Call) या आईवीआरएस (IVRS) के माध्यम से होती है, जो पूरी तरह से रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर निर्भर है। नंबर अपडेट होने में 3 महीने लगने का मतलब है कि इस दौरान उपभोक्ता को गैस एजेंसी के चक्कर काटने पड़ सकते हैं या पुरानी पर्ची प्रणाली का सहारा लेना पड़ सकता है।
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    बुजुर्गों और बीमार लोगों को परेशानी: बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के लिए एजेंसी तक जाना अनिवार्य होने से बुजुर्गों, दिव्यांगों या बीमार लोगों को काफी असुविधा हो सकती है, जो पहले घर बैठे ऑनलाइन अपना नंबर अपडेट कर लिया करते थे।
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गैस कंपनियों का क्या कहना है?

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पेट्रोलियम कंपनियों के अधिकारियों के अनुसार, शुरुआत में यह नियम थोड़ा परेशान करने वाला लग सकता है, लेकिन यह पूरी तरह से 'उपभोक्ता हित' में है। लंबे समय में यह उपभोक्ताओं को हर साल होने वाले करोड़ों रुपये के गैस घोटालों से बचाएगा। कंपनियों का सुझाव है कि:
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    उपभोक्ता अपना वही मोबाइल नंबर गैस कनेक्शन में रजिस्टर कराएं जो वे स्थायी रूप से (Permanent) इस्तेमाल करते हैं।
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    बार-बार सिम कार्ड बदलने की आदत से बचें।
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    जिन उपभोक्ताओं ने अभी तक अपने गैस कनेक्शन की e-KYC पूरी नहीं की है, वे जल्द से जल्द अपनी एजेंसी जाकर आधार ऑथेंटिकेशन पूरा करा लें।
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एलपीजी (LPG) से जुड़ा यह नया अपडेट एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ जहां यह गैस सिलेंडरों की चोरी, अवैध कमर्शियल उपयोग और फर्जी डिलीवरी पर एक बहुत बड़ा प्रहार है, वहीं दूसरी तरफ यह उन ईमानदार ग्राहकों के लिए एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया बन गया है जिनकी वाकई में मजबूरी है अपना नंबर बदलना। 90 दिन का समय एक लंबा वक्त होता है, और ऐसे में कंपनियों को कोई ऐसा 'इमरजेंसी विकल्प' (Emergency Option) भी जरूर खोजना चाहिए, जिससे जेनुइन (Genuine) ग्राहकों को 3 महीने तक गैस बुकिंग के लिए दर-दर न भटकना पड़े। फिर भी, राष्ट्रीय स्तर पर गैस की कालाबाजारी रोकने के लिए उठाया गया यह कदम बेहद सराहनीय और समय की मांग है।
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