नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को सिविल और आपराधिक मामलों के बीच अंतर को समझने के लिए विवेक का प्रयोग करने की कड़ी सलाह दी है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग न्याय प्रणाली के लिए एक गंभीर खतरा बन रहा है, जिसे रोकने की सख्त जरूरत है।READ ALSO:-Paytm यूजर्स ध्यान दें! 31 अक्टूबर है आखिरी मौका, वरना रुक जाएंगे आपके सारे ऑटोमैटिक पेमेंट
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सिविल विवादों को आपराधिक मामलों में बदलने की प्रवृत्ति पर चिंता
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जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हाल ही में सामने आ रहे उस चलन पर गहरी चिंता व्यक्त की है, जिसमें लोग अपने सिविल विवादों को आपराधिक मामलों में बदल देते हैं ताकि उनकी शिकायतों का तेजी से निपटान हो सके या बकाया राशि वसूली जा सके।
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पीठ ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया:
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    अदालतें वसूली एजेंट नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें वसूली एजेंट के रूप में कार्य नहीं कर सकती हैं। हाल के दिनों में, यह देखा गया है कि लोग शुद्ध रूप से दीवानी विवादों में धन की वसूली के लिए आपराधिक मामले दर्ज करा रहे हैं।
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    गिरफ्तारी की धमकी स्वीकार्य नहीं: पीठ ने जोर देकर कहा कि बकाया राशि की वसूली के लिए गिरफ्तारी की धमकी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
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पुलिस की दुविधा और सुप्रीम कोर्ट का सुझाव
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उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज ने पीठ को बताया कि पुलिस ऐसे मामलों से जूझ रही है। अगर पुलिस संज्ञेय अपराध का आरोप होने पर मामला दर्ज नहीं करती है, तो उसे अदालत की आलोचना का सामना करना पड़ता है, और अगर दर्ज करती है तो पक्षपात का आरोप लगता है।
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इन टिप्पणियों के बाद, पीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए (जिसमें धन वसूली विवाद में एक व्यक्ति पर अपहरण का आरोप लगाया गया था) कहा:
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    विवेक का प्रयोग: पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले यह सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए कि मामला दीवानी प्रकृति का है या फौजदारी।
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    न्याय व्यवस्था के लिए खतरा: आपराधिक कानून का ऐसा दुरुपयोग न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है।
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पीठ ने पुलिस के सामने आने वाली कठिनाइयों को स्वीकार किया, खासकर ललिता कुमार मामले (2013) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करने के दबाव को देखते हुए, जिसमें संज्ञेय अपराध पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
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नोडल अधिकारी की नियुक्ति का सुझाव
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इस समस्या के समाधान के लिए, पीठ ने सुझाव दिया कि राज्य प्रत्येक जिले के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त कर सकते हैं, अधिमानतः एक सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश। पुलिस इन नोडल अधिकारियों से परामर्श कर यह तय कर सकती है कि कोई मामला दीवानी है या आपराधिक, और फिर कानून के अनुसार आगे बढ़ सकती है।
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शीर्ष अदालत ने एएसजी से इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने और दो सप्ताह के भीतर अदालत को सूचित करने को कहा है।
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