प्रयागराज: सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर धार्मिक घृणा और दुर्भावना फैलाने वालों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है। हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि WhatsApp या किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी विशेष धार्मिक समुदाय को निशाना बनाने वाले मैसेज भेजना अब सीधे तौर पर अपराध की श्रेणी में आता है।READ ALSO:-मेरठ ब्रेकिंग: 'नो-एंट्री ज़ोन' बनेगा मेरठ शहर! भैसाली बस अड्डा इतिहास बनने को तैयार, ट्रैफिक जाम से मिलेगी परमानेंट आज़ादी
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई भी संदेश जो धर्म, जाति, या समुदाय के आधार पर घृणा, दुश्मनी या दुर्भावना फैलाता हो, वह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353 (2) (पूर्व में IPC की धारा 153A) के तहत दंडनीय अपराध माना जाएगा।
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हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा
\r\n\r\nजस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक टिप्पणी की। कोर्ट ने माना कि संविधान द्वारा दी गई बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है, और इसका उपयोग समाज में विभाजन या शत्रुता पैदा करने के लिए नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट ने साफ़ कहा:
\r\n\r\n "डिजिटल प्लेटफॉर्म, जैसे WhatsApp, अब संचार का एक शक्तिशाली साधन बन चुका है। लेकिन किसी भी विशेष धार्मिक समुदाय को निशाना बनाने वाले संदेश भेजना, जो धर्म के आधार पर घृणा, दुश्मनी या दुर्भावना फैलाते हैं, न केवल सामाजिक सौहार्द बिगाड़ते हैं, बल्कि कानून का स्पष्ट उल्लंघन हैं। ऐसा कृत्य करने वाले पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 353 (2) के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।"
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क्या है पूरा मामला? FIR रद्द करने की याचिका हुई खारिज
\r\n\r\nयह अहम फैसला अफाक अहमद नामक एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए आया। अफाक अहमद ने अपने खिलाफ़ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
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मामले के तथ्य
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- \r\n आरोप: अफाक अहमद पर WhatsApp ग्रुप्स पर और व्यक्तिगत रूप से कई लोगों को भड़काऊ और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले मैसेज भेजने का आरोप था।\r\n \r\n
- \r\n याचिका की मांग: शख्स ने तर्क दिया था कि एफआईआर में लगाए गए आरोप गलत हैं और वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कर रहा था।\r\n \r\n
- \r\n कोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया (On the face of it) याचिकाकर्ता द्वारा भेजे गए संदेश दुर्भावनापूर्ण और सांप्रदायिक शत्रुता को बढ़ावा देने वाले प्रतीत होते हैं, जो भारतीय न्याय संहिता की धारा 353 (2) के दायरे में आते हैं।\r\n \r\n
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साइबर अपराध पर सख्त न्यायिक रुख
\r\n\r\nयह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश में सोशल मीडिया के दुरुपयोग और हेट स्पीच (Hate Speech) के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट के इस स्पष्टीकरण से पुलिस को साइबर स्पेस में धार्मिक विद्वेष फैलाने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।
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BNS की धारा 353 (2) का प्रावधान
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- \r\n पहले क्या थी: यह धारा पूर्व में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A के रूप में जानी जाती थी।\r\n \r\n
- \r\n क्या है अपराध: जो कोई भी धर्म, जाति, जन्मस्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देता है, और सद्भाव बनाए रखने के प्रतिकूल कार्य करता है।\r\n \r\n
- \r\n दंड: इस अपराध के लिए तीन साल तक की कैद या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है।\r\n \r\n
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इस फैसले के बाद, सोशल मीडिया यूजर्स को अब WhatsApp फॉरवर्ड करने या किसी भी प्लेटफॉर्म पर धार्मिक टिप्पणियाँ करते समय अत्यंत सावधानी बरतनी होगी।



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