Supreme Court on Delhi Restrictions मामले में रविवार को एक बड़ा आदेश सामने आया। राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन के मद्देनजर लगाई गई सख्त पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी आपत्ति जताई। रविवार को इस मामले पर एक विशेष सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने सरकार और पुलिस प्रशासन को 5 कड़े निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जा सकता।
क्या था मामला और क्यों हुई विशेष सुनवाई?
सीजेपी के प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली प्रशासन ने शनिवार को मेट्रो स्टेशनों और रेलवे स्टेशनों को बंद करने, इंटरनेट ठप करने और व्यापक स्तर पर बैरिकेडिंग करने जैसे कदम उठाए थे। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की स्पेशल बेंच ने रविवार को पाबंदियों से जुड़ी याचिकाओं पर विशेष सुनवाई की।
बेंच के समक्ष सीनियर वकीलों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का खुला उल्लंघन किया है। वकीलों ने तर्क दिया कि मेट्रो रेल रोक दी गई, नई दिल्ली और निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन बंद कर दिए गए, और कोई पूर्व ट्रैफिक एडवाइजरी भी जारी नहीं की गई। इसके अलावा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 163 के निषेधाज्ञा क्षेत्र के बाहर भी बड़ी संख्या में लोगों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के 5 बड़े और सख्त निर्देश
इन सभी दलीलों को गंभीरता से सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता की सुविधाओं और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए 5 बड़े निर्देश जारी किए:
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- मेट्रो और रेल सेवाएं बहाल हों: मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए, जब तक कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था में गंभीर खलल को ध्यान में रखते हुए नियम लागू करने की अति आवश्यकता न हो।
- यातायात और बैरिकेडिंग की समीक्षा: ट्रैफिक नियमों के अधीन शहर में लोगों की आवाजाही को अनुमति दी जाए। कानून-व्यवस्था और अन्य ट्रैफिक स्थितियों का ध्यान रखते हुए लगाए गए बैरिकेड्स की तुरंत समीक्षा की जाए।
- इंटरनेट सेवाएं सुचारू रहें: राजधानी में इंटरनेट सेवाएं बिना किसी भी तरह की रुकावट के जारी रहेंगी।
- लोगों की आवाजाही की छूट: कानून के दायरे में शहर में लोगों को सुचारू रूप से आवाजाही (Movement) की अनुमति दी जाए।
- गैर-कानूनी हिरासत पर रोक: कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाएगा। विशेष रूप से धारा 163 के दायरे से बाहर शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को हिरासत में लेने से बचा जाए।
वकीलों और पत्रकारों के काम में न आए बाधा
इन 5 निर्देशों के अलावा, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने में किसी भी प्रकार की बाधा का सामना न करना पड़े।
गौरतलब है कि इससे पहले शुक्रवार को भी भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे प्रदर्शन के नाम पर मेट्रो स्टेशनों को पूरी तरह बंद करने के फैसले पर पुनर्विचार करें और जनता की असुविधा को कम करने के लिए सेवाओं को नियंत्रित तरीके से संचालित करें।
Sabse pehle comment karne wale banein.