आजकल युवाओं के बीच 'एनर्जी ड्रिंक्स' का क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा है। जिम जाने वाले युवाओं से लेकर, पढ़ाई के दौरान रात भर जागने वाले छात्रों और यहां तक कि ग्रामीण इलाकों के बच्चों के हाथों में भी आपको लाल या नीले रंग की ये बोतलें आसानी से दिख जाएंगी। विज्ञापनों में यह दावा किया जाता है कि इसे पीते ही शरीर में तुरंत ऊर्जा (Energy) का संचार होता है और दिमाग की सारी थकावट दूर हो जाती है। लेकिन, क्या वाकई ये ड्रिंक्स आपको 'एनर्जी' देती हैं?READ ALSO:-मेरठ में कांवड़ यात्रा पर 'महा-एक्शन': ढाबों पर प्याज-लहसुन बैन, मांस-मदिरा की दुकानें होंगी सील, 12 फीट से ऊंचे DJ की 'नो-एंट्री'
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इसी सवाल का जवाब तलाशते हुए भारत सरकार के खाद्य नियामक निकाय, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला लिया है। FSSAI ने देश में बिकने वाली सभी बड़ी कैफीनेटेड पेय कंपनियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे अपने उत्पादों के नाम, लेबल और विज्ञापनों से 'एनर्जी ड्रिंक' (Energy Drink) शब्द को पूरी तरह से हटा दें।
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FSSAI का तर्क: "भारत में 'एनर्जी ड्रिंक' जैसी कोई कैटेगरी नहीं"

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आखिर FSSAI को यह कड़ा कदम क्यों उठाना पड़ा? दरअसल, खाद्य नियामक के अनुसार, भारतीय खाद्य सुरक्षा कानूनों और मानकों में 'एनर्जी ड्रिंक' नाम की कोई आधिकारिक या वैधानिक श्रेणी (Official Category) मौजूद ही नहीं है।
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें तो, 'ऊर्जा' या 'एनर्जी' कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन या फैट से मिलती है। लेकिन इन ड्रिंक्स में जो 'किक' या तुरंत स्फूर्ति महसूस होती है, वह ऊर्जा नहीं बल्कि भारी मात्रा में मिलाए गए कैफीन (Caffeine) और टॉरिन (Taurine) का उत्तेजक (Stimulant) प्रभाव होता है। कैफीन आपके दिमाग के उन रिसेप्टर्स को ब्लॉक कर देता है जो आपको थकान का अहसास कराते हैं। यानी, ये ड्रिंक्स आपको ऊर्जा नहीं देतीं, बल्कि आपके दिमाग को धोखा देकर थकान महसूस नहीं होने देतीं।
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FSSAI का स्पष्ट रूप से मानना है कि इन पेय पदार्थों को 'एनर्जी ड्रिंक' कहना सीधे तौर पर ग्राहकों को गुमराह (Mislead) करना है। यह ग्राहकों के मन में एक झूठी धारणा बनाता है कि वे कोई स्वास्थ्यवर्धक या ऊर्जावान चीज पी रहे हैं, जबकि हकीकत में वे केवल उच्च कैफीन और चीनी (Sugar) का एक उत्तेजक घोल पी रहे होते हैं।
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बंद कमरे की बैठक और कंपनियों का भारी विरोध

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इस फैसले का सीधा और सबसे बड़ा असर पेप्सीको की 'स्टिंग' (Sting), रेड बुल (Red Bull), मॉन्स्टर बेवरेज (Monster Beverage), रिलायंस की कैम्पा एनर्जी (Campa Energy) और हेल एनर्जी (Hell Energy) जैसी दिग्गज मल्टीनेशनल कंपनियों पर पड़ने वाला है।
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सूत्रों के मुताबिक, जब FSSAI ने यह फरमान सुनाया, तो इन कंपनियों में हड़कंप मच गया। हाल ही में इन कंपनियों के प्रतिनिधियों और FSSAI के अधिकारियों के बीच एक बंद कमरे में अहम बैठक हुई। इस बैठक में कंपनियों ने आदेश का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि 'एनर्जी ड्रिंक' शब्द हटाने से उनकी सालों पुरानी ब्रांड आइडेंटिटी (Brand Identity) पूरी तरह से खत्म हो जाएगी और इसका सीधा असर उनकी करोड़ों-अरबों की बिक्री (Sales) पर पड़ेगा।
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हालांकि, FSSAI अपने फैसले पर अडिग रहा। नियामक ने दो टूक शब्दों में कंपनियों से कह दिया कि यदि उन्हें इस आदेश से कोई भी आपत्ति है, तो वे बेझिझक अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं। सरकार के इस सख्त और नो-नॉनसेंस रवैये को देखते हुए, उद्योग जगत के सूत्रों का कहना है कि कंपनियों ने अंततः हथियार डाल दिए हैं और नियम मानने पर सहमति जता दी है। FSSAI ने कंपनियों को अपनी पैकेजिंग, बोतलों के लेबल और मार्केटिंग सामग्री में बदलाव करने के लिए 90 दिनों (3 महीने) का अल्टीमेटम दिया है।
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भारत में 'स्टिंग' (Sting) का जलवा और युवाओं पर इसका खतरा

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भारत में कैफीन युक्त पेय पदार्थों का बाजार पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर 2017 के बाद से, रॉकेट की रफ्तार से बढ़ा है। इसका सबसे बड़ा कारण पेप्सीको का उत्पाद Sting रहा है।
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पहले रेड बुल या मॉन्स्टर जैसी ड्रिंक्स की कीमत 100 रुपये से अधिक होती थी, जिससे यह केवल उच्च आय वर्ग या शहरी युवाओं तक सीमित थी। लेकिन 'स्टिंग' ने मात्र 20 रुपये में 250ml की बोतल बाजार में उतारकर पूरे गेम को बदल दिया। आज 15 से 19 साल के किशोरों और यहां तक कि ग्रामीण भारत (Rural India) के दूर-दराज के इलाकों में भी स्टिंग कोल्ड ड्रिंक से ज्यादा लोकप्रिय हो चुकी है।
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यही FSSAI की सबसे बड़ी चिंता का विषय है। 20 रुपये की कीमत होने के कारण छोटे बच्चे और किशोर इसे आम कोल्ड ड्रिंक समझकर दिन में कई-कई बोतलें पी रहे हैं, जिससे उनके शरीर में खतरनाक स्तर तक कैफीन और चीनी जा रही है।
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ग्लोबल ट्रेंड: दुनिया भर में उठ रहे हैं सवाल

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हाई कैफीन ड्रिंक्स को लेकर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में चिंताएं जताई जा रही हैं। इनमें मौजूद कैफीन, चीनी और टॉरिन की अत्यधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकती है। इसके ज्यादा सेवन से:
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    दिल की धड़कन तेज होना (Palpitations)
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    नींद न आना (Insomnia)
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    घबराहट और एंग्जायटी (Anxiety)
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    हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
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अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात करें तो, इंग्लैंड (UK) की सरकार ने तो इस पर और भी सख्त रुख अपनाया है। बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को देखते हुए, यूके में अगले साल अप्रैल से 16 साल से कम उम्र के बच्चों को हाई कैफीन वाली ये ड्रिंक्स बेचने पर पूरी तरह से कानूनी रोक (Ban) लगाने का फैसला किया गया है।
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अब क्या कहलाएंगी ये ड्रिंक्स? (What's Next?)

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लेबलिंग में बदलाव के बाद, 90 दिनों के भीतर इन बोतलों से 'Energy' शब्द गायब हो जाएगा। नियमों के अनुसार, अब इन कंपनियों को अपने उत्पादों को 'कैफीनेटेड बेवरेज' (Caffeinated Beverage) या 'प्रोपराइटरी फूड' के रूप में बेचना होगा। इसके अलावा, बोतलों पर स्पष्ट रूप से यह चेतावनी भी अनिवार्य रूप से लिखनी होगी कि "यह पेय बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कैफीन के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए अनुशंसित नहीं है।"
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ख़बरीलाल की सलाह: FSSAI का यह फैसला उपभोक्ताओं, विशेषकर युवाओं और उनके माता-पिता के लिए एक बड़ी आंख खोलने वाली घटना है। अगली बार जब आप थकान मिटाने के लिए कोई लाल या नीली बोतल उठाएं, तो याद रखें कि आप 'एनर्जी' नहीं, बल्कि 'कैफीन का ओवरडोज' ले रहे हैं। बच्चों को इन उत्तेजक पेय पदार्थों से दूर रखना ही उनके बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है।
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