मुंबई (Khabreelal News Desk): भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की बैंकिंग व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी, मजबूत और धोखाधड़ी मुक्त बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। बैंक का कर्ज डकार जाने वाले जानबूझकर (Willful) डिफॉल्टर्स पर नकेल कसने के लिए केंद्रीय बैंक ने नए और बेहद सख्त नियम जारी किए हैं। इन नए नियमों को 'स्ट्रैस्ड एसेट्स डायरेक्शन 2026' (Stressed Assets Direction 2026) का नाम दिया गया है।READ ALSO:-RBI का बड़ा फैसला: जल्द आपकी जेब में होंगे ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोट, चीन-पाकिस्तान पर सख्त बैन के साथ ग्लोबल टेंडर जारी
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आरबीआई के इस नए फरमान के बाद, अब कोई भी बैंक, स्मॉल फाइनेंस बैंक या नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) कर्ज न चुकाने वाले डिफॉल्टर्स या उनसे जुड़ी किसी भी कंपनी को उनकी जब्त की गई संपत्ति (जैसे जमीन, मकान, कमर्शियल बिल्डिंग या फैक्ट्रियां) वापस नहीं बेच सकेंगे। यह फैसला उन चालाक कारोबारियों के लिए एक तगड़ा झटका है, जो बैंकों का पैसा हड़पकर सिस्टम की खामियों का फायदा उठाते थे।
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क्या था वो 'शॉर्टकट' जिसे RBI ने हमेशा के लिए कर दिया बंद?

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दरअसल, बैंकिंग सेक्टर में अक्सर यह देखा जाता था कि कुछ शातिर और चालाक कारोबारी जानबूझकर बैंक का लोन नहीं चुकाते थे। जब बैंक कर्ज वसूली के लिए उनकी गिरवी रखी गई संपत्ति (मकान या फैक्ट्री) को जब्त कर लेता था, तो वे एक नया खेल शुरू करते थे।
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ये डिफॉल्टर अपनी ही किसी अन्य फर्जी (शेल) कंपनी, रिश्तेदारों या करीबियों के जरिए उसी जब्त संपत्ति को सार्वजनिक नीलामी में बहुत कम कीमत (डिस्काउंट रेट) पर वापस खरीद लेते थे। इस तरह उन्हें अपनी संपत्ति भी वापस मिल जाती थी और बैंक को कर्ज की मूल रकम का भारी नुकसान उठाना पड़ता था। आरबीआई के इस नए फैसले से अब इस 'शॉर्टकट' और धोखाधड़ी पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी। नए नियमों के अनुसार, भले ही भविष्य में उस संपत्ति का स्टेटस या कानूनी स्थिति बदल जाए, फिर भी मूल डिफॉल्टर उसे कभी वापस नहीं खरीद पाएगा। यह पता लगाने के लिए कि संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति डिफॉल्टर से जुड़ा है या नहीं, 'इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड' (IBC) 2016 के सख्त पैमानों का इस्तेमाल किया जाएगा।
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कब से लागू होंगे ये नए नियम?

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आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि ये नए नियम 1 अक्टूबर 2026 से पूरे देश के बैंकिंग सिस्टम में सख्ती के साथ लागू हो जाएंगे। हालांकि, जो संपत्तियां बैंकों के पास पहले से जब्त पड़ी हैं, उन्हें इन नए नियमों के दायरे में लाने और अकाउंटिंग में सुधार करने के लिए बैंकों को 30 सितंबर 2027 तक का पर्याप्त समय दिया गया है।
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बैंकों को 7 साल में करनी होगी नीलामी, बैंक नहीं हैं 'प्रॉपर्टी डीलर'

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आरबीआई ने बैंकों को भी कड़ी हिदायत दी है। केंद्रीय बैंक का स्पष्ट मानना है कि बैंकों का मुख्य काम बैंकिंग सेवाएं देना है, न कि रियल एस्टेट या प्रॉपर्टी का व्यापार करना। इसलिए, किसी भी डिफॉल्टर से जब्त की गई अचल संपत्ति (जिसे तकनीकी भाषा में SNFA - Securitisation and Non-Banking Financial Assets कहा जाता है) को बैंकों को अधिकतम 7 साल की समयसीमा के भीतर हर हाल में बेचना होगा।
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संपत्ति की बिक्री में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बैंकों को यह बिक्री मुख्य रूप से 'सरफेसी एक्ट, 2002' (SARFAESI Act, 2002) के कड़े प्रावधानों के तहत एक पारदर्शी 'सार्वजनिक नीलामी' (Public Auction) के जरिए ही करनी होगी। गुपचुप तरीके से या बिना विज्ञापन के संपत्ति बेचने पर कड़ी कार्रवाई होगी।
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बैलेंस शीट और अकाउंटिंग के लिए भी कड़े निर्देश

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जब्त संपत्तियों को लेकर बैंकों की बैलेंस शीट को साफ-सुथरा और पारदर्शी रखने के लिए आरबीआई ने अकाउंटिंग की भी कुछ खास गाइडलाइंस जारी की हैं:
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    दो स्वतंत्र वैल्यूअर (Valuers): अब संपत्ति की मनमानी कीमत तय नहीं होगी। जब्त संपत्ति का सही बाजार मूल्य तय करने के लिए कम से कम दो बाहरी और स्वतंत्र एक्सपर्ट्स (वैल्यूअर) से वैल्यूएशन कराना अनिवार्य होगा।
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    नुकसान तुरंत दर्ज, मुनाफे पर नजरअंदाज (मार्क-टू-मार्केट): हर दो साल में उस जब्त संपत्ति की कीमत की दोबारा जांच की जाएगी। अगर बाजार में उस संपत्ति की कीमत घटती है, तो उस नुकसान को बैंक को तुरंत अपने पीएंडएल (Profit & Loss) अकाउंट में दिखाना होगा। इसके विपरीत, अगर कीमत बढ़ती है, तो बैंक उसे मुनाफे के तौर पर तब तक नहीं दिखा सकते, जब तक कि संपत्ति वास्तव में बिक न जाए।
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    NPA से अलग रखना होगा हिसाब: इन जब्त संपत्तियों को बैंकों के पारंपरिक एनपीए (NPA - Non-Performing Assets) या स्ट्रेस्ड लोन की कैटेगरी में शामिल नहीं किया जाएगा। इन्हें बैलेंस शीट में एक अलग हेड जैसे 'अदर एसेट्स' (Other Assets) या 'नॉन-बैंकिंग एसेट्स' में स्पष्ट रूप से दिखाना होगा।
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अंत में, आरबीआई ने सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को यह निर्देश दिया है कि वे इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने के लिए जल्द से जल्द अपने 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' से मंजूरी लेकर एक सख्त और पारदर्शी पॉलिसी तैयार करें। केंद्रीय बैंक के इस कदम से भारतीय बैंकिंग प्रणाली में एनपीए (NPA) के निस्तारण में तेजी आएगी और ईमानदार कर्जदाताओं का बैंकों पर भरोसा और मजबूत होगा।
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