नई दिल्ली/व्यापार डेस्क: अगर आप भी वीकेंड या खास मौकों पर शराब, बीयर या वाइन (Wine) का शौक रखते हैं, तो अपना बजट बढ़ाने के लिए तैयार हो जाइए। आने वाले दिनों में आपके पसंदीदा ब्रांड की बीयर या शराब की बोतल के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं।READ ALSO:-भारतीय रेलवे में 40 साल बाद 'महा-बदलाव': खत्म होगा पुराना रिजर्वेशन सिस्टम, अब AI करेगा फैसला- आपका वेटिंग टिकट कन्फर्म होगा या नहीं!
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शराब बनाने वाली देश और दुनिया की दिग्गज कंपनियों ने राज्य सरकारों के सामने गुहार लगाई है कि मौजूदा दामों पर व्यापार करना अब उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। महंगाई का यह नया झटका किसी घरेलू नीति के कारण नहीं, बल्कि सात समंदर पार चल रहे ईरान-अमेरिका (Iran-US Conflict) युद्ध और मिडिल ईस्ट (Middle East) के तनाव के कारण लगने जा रहा है।
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इस युद्ध ने ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) को बुरी तरह से बाधित कर दिया है, जिसके कारण शराब पैक करने वाली कांच की बोतलें, एल्युमीनियम कैन और अन्य पैकेजिंग मटेरियल (Packaging Material) की लागत में बेतहाशा वृद्धि हो गई है।
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CIABC और BAI का राज्य सरकारों को पत्र: "लागत बढ़ी, मुनाफा घटा"
\r\n\r\nभारत में शराब और बीयर उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाली दो सबसे बड़ी और प्रमुख संस्थाओं— कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनीज (CIABC) और ब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने इस संकट को लेकर आपातकालीन कदम उठाए हैं।
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इन दोनों प्रमुख संस्थाओं ने विभिन्न राज्य सरकारों के आबकारी विभागों (Excise Departments) को आधिकारिक पत्र लिखकर कीमतों में बदलाव (Price Revision) की तुरंत अनुमति मांगी है।
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- \r\n 15% से 20% तक बढ़ोतरी की मांग: ब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि कच्चे माल और पैकेजिंग की लागत इतनी अधिक बढ़ गई है कि उसकी भरपाई के लिए बीयर और शराब के दामों (MRP) में कम से कम 15% से 20% तक का इजाफा करना बेहद जरूरी हो गया है।\r\n \r\n
- \r\n दिग्गज कंपनियों का दबाव: आपकी जानकारी के लिए बता दें कि BAI में यूनाइटेड ब्रूअर्स (United Breweries), एबी इनबेव (AB InBev) और कारल्सबर्ग (Carlsberg) जैसी बहुराष्ट्रीय और दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। देश के कुल बीयर मार्केट में इन कंपनियों की करीब 85% हिस्सेदारी है। इन कंपनियों का स्पष्ट कहना है कि उत्पादन की लागत बढ़ने के कारण उनका प्रॉफिट मार्जिन (मुनाफा) लगातार गिर रहा है। अगर जल्द ही कीमतें नहीं बढ़ाई गईं, तो उनके लिए इस पुराने रेट पर बिजनेस को सस्टेन (Sustain) करना असंभव हो जाएगा।\r\n \r\n
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फिरोजाबाद के ग्लास हब में हाहाकार: गैस संकट से ठप हुआ उत्पादन
\r\n\r\nशराब की बोतलों की बात हो और उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद (Firozabad) का जिक्र न हो, ऐसा नहीं हो सकता। फिरोजाबाद पूरे भारत का सबसे बड़ा ग्लास मैन्युफैक्चरिंग हब (Glass Manufacturing Hub) है। शराब और वाइन की ज्यादातर कांच की बोतलें यहीं तैयार होती हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन टूटने का सबसे खौफनाक असर यहीं देखने को मिल रहा है।
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- \r\n 60% गैस की ही हो रही सप्लाई: CIABC के आंकड़ों और रिपोर्ट के मुताबिक, कांच गलाने वाली भट्टियों को चलाने के लिए जिस प्राकृतिक गैस की आवश्यकता होती है, उसकी भारी किल्लत पैदा हो गई है। गैस की इस कमी के कारण फिरोजाबाद की फैक्ट्रियों को उनकी कुल जरूरत की तुलना में केवल 60% गैस ही मिल पा रही है।\r\n \r\n
- \r\n महंगी गैस खरीदने की मजबूरी: पर्याप्त गैस न मिलने के कारण वेंडर्स और फैक्ट्री मालिकों को मजबूरन स्पॉट मार्केट से अत्यधिक महंगी एलएनजी (LNG) या एलपीजी (LPG) खरीदनी पड़ रही है। महंगी गैस से कांच की बोतलों की निर्माण लागत (Manufacturing Cost) कई गुना बढ़ गई है।\r\n \r\n
- \r\n बंदी की कगार पर यूनिट्स: हालत यह हो गई है कि जो छोटे कारखाने इस बढ़ी हुई लागत का बोझ नहीं उठा पा रहे हैं, वे बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इससे बोतलों की सप्लाई में भारी कमी आ गई है, जिससे शराब कंपनियों की पैकेजिंग लाइनें प्रभावित हो रही हैं।\r\n \r\n
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एल्युमीनियम सप्लाई चेन टूटी: मंडराया बीयर कैन (Beer Cans) का संकट
\r\n\r\nगर्मियों के मौसम में बीयर की मांग हमेशा चरम पर होती है, और आजकल युवा कांच की बोतलों से ज्यादा एल्युमीनियम कैन (Aluminium Cans) वाली बीयर पीना पसंद करते हैं। लेकिन बीयर इंडस्ट्री के लिए इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती इसी एल्युमीनियम की सप्लाई बन गई है।
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- \r\n मिडिल ईस्ट से रुकी आवक: एल्युमीनियम का एक बहुत बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट (Middle East) के देशों से आयात (Import) किया जाता है। ईरान-अमेरिका के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री व्यापारिक मार्गों पर खतरे के कारण मिडिल ईस्ट से एल्युमीनियम की आवक बुरी तरह से प्रभावित हुई है। मालवाहक जहाज या तो आ नहीं रहे हैं, या उन्हें लंबा और बेहद खर्चीला रास्ता तय करना पड़ रहा है (Freight rates बढ़ गए हैं)।\r\n \r\n
- \r\n प्लांट्स बंद होने की चेतावनी: सप्लायर्स ने बीयर कंपनियों को स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि अगर खाड़ी देशों में यह तनाव और लंबा खिंचा, तो कच्चे एल्युमीनियम की सप्लाई जीरो हो सकती है। इसका सीधा मतलब है कि बीयर कैन का उत्पादन पूरी तरह से ठप हो जाएगा। ऐसी स्थिति में कई बीयर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स को मजबूरन शटडाउन (Shut down) करना पड़ सकता है।\r\n \r\n
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कंपनियों ने निकाला बीच का रास्ता: "दाम न बढ़ाएं तो टैक्स घटाएं"
\r\n\r\nकंपनियां जानती हैं कि एकदम से 20% दाम बढ़ाने पर ग्राहकों की ओर से भारी नाराजगी देखने को मिल सकती है और शराब की बिक्री (Sales Volume) गिर सकती है। इसलिए लागत के इस भारी दबाव को कम करने के लिए कंपनियों ने राज्य सरकारों से 'अंतरिम राहत' (Interim Relief) का एक दूसरा फॉर्मूला भी सुझाया है।
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- \r\n मैन्युफैक्चरिंग लेवी में कटौती की मांग: BAI ने राज्य सरकारों को सुझाव दिया है कि यदि सरकार ग्राहकों पर सीधा बोझ नहीं डालना चाहती, तो वह शराब कंपनियों पर लगने वाली मैन्युफैक्चरिंग लेवी (Manufacturing Levy) या एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में करीब ₹3 से ₹5 प्रति लीटर की कटौती कर दे।\r\n \r\n
- \r\n एक्स-डिस्टिलरी प्राइस में संशोधन: इसी तरह, CIABC ने भी वाइन (Wine) और इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL - अन्य अंग्रेजी शराब) के 'एक्स-डिस्टिलरी प्राइस' (Ex-Distillery Price - वह कीमत जिस पर कंपनी फैक्ट्री से शराब बेचती है) में तत्काल संशोधन की मांग की है।\r\n \r\n
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कंपनियों का तर्क है कि टैक्स में यह छूट मिलने से बढ़ी हुई लागत की कुछ हद तक भरपाई हो जाएगी और ग्राहकों पर पड़ने वाले कीमतों के सीधे प्रहार को कुछ हद तक नरम किया जा सकेगा।
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राज्य सरकारों के सामने 'धर्मसंकट'
\r\n\r\nभारत में शराब पर लगने वाला उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और अन्य टैक्स राज्य सरकारों की कमाई (Revenue) का एक बहुत बड़ा स्रोत होते हैं। राज्य के बजट का एक अहम हिस्सा इसी पैसे से चलता है।
\r\n\r\nअब राज्य सरकारों के सामने एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया है।
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- \r\n अगर वे कंपनियों की बात मानकर टैक्स (लेवी) कम करते हैं, तो राज्य के खजाने को करोड़ों का नुकसान होगा।\r\n \r\n
- \r\n अगर वे कंपनियों को एमआरपी (MRP) बढ़ाने की अनुमति देते हैं, तो इसका सीधा बोझ आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा, जिससे महंगाई का ग्राफ और ऊपर जाएगा और राजनीतिक विरोध भी झेलना पड़ सकता है।\r\n \r\n
- \r\n और यदि सरकारें कुछ नहीं करती हैं, तो कंपनियां उत्पादन कम कर देंगी, जिससे बाजार में शराब की किल्लत (Shortage) हो जाएगी और ब्लैक मार्केटिंग (Black Marketing) को बढ़ावा मिलेगा।\r\n \r\n
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फिलहाल गेंद राज्य सरकारों और उनके आबकारी विभागों के पाले में है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकारें कंपनियों की मांग के आगे झुककर कीमतों में वृद्धि का नोटिफिकेशन जारी करती हैं, या फिर टैक्स में छूट देकर ग्राहकों को महंगाई के इस नए झटके से बचाती हैं। बहरहाल, जो हालात दिख रहे हैं, उसमें शराब और बीयर का महंगा होना लगभग तय माना जा रहा है।
Sabse pehle comment karne wale banein.