नई दिल्ली (Business Desk): एक दशक पहले जब भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) की शुरुआत हुई थी, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह तकनीक भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर इस कदर बदल कर रख देगी। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम साबित हुई इस पहल को जल्द ही 10 साल पूरे होने वाले हैं। आज भारत में करोड़ों लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और छोटे से छोटे भुगतान के लिए यूपीआई का बेझिझक इस्तेमाल कर रहे हैं।READ ALSO:-CBSE 10वीं 'सेशन-1' का रिजल्ट घोषित: 25 लाख छात्रों का इंतजार खत्म, अब 'टू-बोर्ड सिस्टम' से मिलेगी तनाव से मुक्ति; जानें हर नया नियम
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इस अपार सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण इसका 'फ्री' (मुफ्त) होना है। फिलहाल यूजर्स से यूपीआई ट्रांजैक्शन के लिए कोई शुल्क (Transaction Fee) नहीं लिया जाता है। यही वजह है कि 10 रुपये की चाय हो या 10,000 रुपये का बिल, यूपीआई हर भारतीय के स्मार्टफोन का सबसे अहम हिस्सा बन गया है। लेकिन, हाल ही में सामने आए एक सर्वे ने इस इकोसिस्टम के भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है।
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लोकलसर्कल्स (LocalCircles) का सर्वे: 75% यूजर्स की दो टूक

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डिजिटल प्लेटफॉर्म 'लोकलसर्कल्स' (LocalCircles) द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में यूपीआई यूजर्स के बीच एक व्यापक सर्वे किया गया। इस सर्वे के जो नतीजे सामने आए हैं, वे नीति निर्माताओं और पेमेंट कंपनियों को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं।
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सर्वे के आंकड़ों से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि यदि भविष्य में यूपीआई के जरिये किए जाने वाले भुगतान (UPI Payments) पर किसी भी प्रकार की 'ट्रांजैक्शन फीस' (Transaction Fee) या सरचार्ज लगाया जाता है, तो 75% यूजर यूपीआई का इस्तेमाल करना पूरी तरह से बंद कर देंगे। वे डिजिटल भुगतान को छोड़कर वापस नकद (Cash) लेनदेन की ओर लौट जाएंगे। सर्वे में शामिल केवल 25% यूजर्स ही ऐसे थे, जिन्होंने कहा कि सुविधा के लिए वे मामूली शुल्क देने को तैयार हैं। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि भारत में डिजिटल भुगतान की सफलता काफी हद तक इसके नि:शुल्क होने पर ही टिकी हुई है।
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57% मर्चेंट्स ने की कैश की डिमांड: क्या है जमीनी हकीकत?

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सर्वे में केवल ग्राहकों के ही नहीं, बल्कि दुकानदारों (Merchants) के व्यवहार को लेकर भी हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। सर्वे में शामिल 57% यूजर्स ने बताया कि पिछले एक साल में उनके साथ कम से कम एक बार ऐसा जरूर हुआ है जब किसी मर्चेंट या दुकानदार ने यूपीआई से पेमेंट लेने से साफ इनकार कर दिया और केवल कैश (Cash) की मांग की।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे— सर्वर डाउन होने का डर, बैंक खातों में ट्रांजैक्शन की सीमा, या फिर सीधे तौर पर अपनी आय को टैक्स के दायरे से बाहर रखने (Tax Evasion) की मंशा। फिर भी, यह आंकड़ा बताता है कि डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी 'कैश इज किंग' (Cash is King) की मानसिकता पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है।
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क्यों फ्री है यूपीआई? क्या है MDR का पूरा गणित

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यूपीआई के फ्री होने के पीछे सरकार की एक सोची-समझी नीति है। दरअसल, साल 2020 में केंद्र सरकार ने डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा देने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate - MDR) को पूरी तरह से हटा दिया था (जीरो MDR)।
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क्या होता है MDR? जब भी हम क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से स्वाइप मशीन पर पेमेंट करते हैं, तो बैंक और पेमेंट प्रोसेसर दुकानदार से हर ट्रांजैक्शन पर एक छोटी सी फीस (लगभग 1% से 2%) वसूलते हैं, इसे ही MDR कहा जाता है। 2020 से पहले, यूपीआई ट्रांजैक्शन पर भी व्यापारियों को बैंकों को लगभग 0.2% से 0.3% की एक छोटी सी फीस देनी पड़ती थी। इस फीस से ही उस पूरे पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च निकलता था। लेकिन 2020 में जीरो MDR नीति लागू होने के बाद, यूपीआई पर यूजर्स और मर्चेंट्स दोनों के लिए किसी भी प्रकार का चार्ज शून्य हो गया।
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बैंकों और पेमेंट ऐप्स का दर्द: आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया

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MDR हटने से ग्राहकों और दुकानदारों की तो मौज आ गई, लेकिन बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (जैसे Google Pay, PhonePe, Paytm आदि) के लिए रेवेन्यू की लाइन लगभग खत्म हो गई। हालांकि आमदनी खत्म हो गई है, लेकिन लागत (Cost) अभी भी वहीं की वहीं है, बल्कि और बढ़ गई है।
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इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, यूपीआई का नेटवर्क अब हर साल 240 बिलियन (24,000 करोड़) से ज्यादा ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करता है।
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    बैंकों का खर्च: बैंक पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर, सर्वर मेंटेनेंस, सेटलमेंट कॉस्ट, और फ्रॉड प्रिवेंशन सिस्टम का भारी भरकम खर्च उठाते हैं।
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    पेमेंट ऐप्स का खर्च: पेमेंट ऐप्स को अपनी बेहतरीन तकनीक, सर्वर की स्पीड, कस्टमर एक्विजिशन (नए ग्राहक जोड़ने) और कस्टमर सपोर्ट (शिकायत निवारण) पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
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जब 240 बिलियन ट्रांजैक्शन प्रोसेस होते हैं, तो हर ट्रांजैक्शन पर आने वाले कुछ पैसों का खर्च भी पूरे सिस्टम के लिए कई हजार करोड़ रुपये की विशाल लागत में बदल जाता है। सरकार एक 'इंसेंटिव स्कीम' (Incentive Scheme) के जरिये इस इकोसिस्टम को मुआवजा देती जरूर है, लेकिन बैंकों का मानना है कि यह मुआवजा उनकी वास्तविक लागत से काफी कम है।
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लागत वसूलने के नए तरीके खोज रही हैं कंपनियां (Alternative Revenue Streams)

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चूंकि यूपीआई पर सीधे तौर पर कोई चार्ज लगाना (Direct Charge) अभी संभव नहीं है और सर्वे भी बताता है कि ऐसा करना आत्मघाती कदम होगा, इसलिए बैंक और पेमेंट ऐप्स अब लागत वसूलने के 'दूसरे तरीकों' (Alternative Revenue Models) पर तेजी से काम कर रहे हैं:
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    यूपीआई पर क्रेडिट कार्ड (Credit Card on UPI): अब ग्राहकों को यूपीआई ऐप से अपने 'रुपे क्रेडिट कार्ड' (RuPay Credit Card) को लिंक करने की सुविधा दी गई है। इस ट्रांजैक्शन पर कंपनियों को मर्चेंट से MDR मिलता है, जिससे उनकी कमाई होती है।
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    छोटे लोन की सुविधा (Credit Line on UPI): पेमेंट ऐप्स अब ग्राहकों के लेनदेन के इतिहास (Transaction History) का आकलन करके उन्हें तुरंत 'स्मॉल-टिकट पर्सनल लोन' (Small Ticket Personal Loans) या 'बाय नाउ, पे लेटर' (BNPL) की सुविधा दे रहे हैं। इन लोन्स पर लगने वाला ब्याज उनकी कमाई का एक बड़ा जरिया बन रहा है।
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    क्रॉस सेलिंग (Cross-Selling): अपने प्लेटफॉर्म पर आने वाले करोड़ों यूजर्स को ये ऐप्स अब इंश्योरेंस पॉलिसी (Insurance), म्यूचुअल फंड (Mutual Funds), डिजिटल गोल्ड (Digital Gold) और अन्य इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट बेच रहे हैं। इन उत्पादों की बिक्री से मिलने वाला कमीशन (Commission) अब उनकी आय का मुख्य स्रोत बनता जा रहा है।
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आगे का रास्ता क्या है?

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लोकलसर्कल्स का यह सर्वे इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय उपभोक्ता अभी भी मूल्य (Value) को लेकर बेहद संवेदनशील है। यूपीआई ने पिछले 10 सालों में भारत को वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के जिस मुकाम पर पहुंचाया है, वह पूरी दुनिया के लिए एक केस स्टडी है। यदि सिस्टम को बनाए रखने के लिए इस पर फीस का बोझ डाला गया, तो 75% यूजर्स का पीछे हटना पूरी अर्थव्यवस्था के डिजिटलाइजेशन (Digitalization) के सपने को एक बड़ा झटका दे सकता है।
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भविष्य में सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), NPCI और बैंकों को मिलकर एक ऐसा 'मध्य मार्ग' निकालना होगा, जिससे ग्राहकों की जेब पर भी सीधा बोझ न पड़े और बैंकों को भी इस विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने की उचित लागत मिल सके। फिलहाल, जनता के लिए राहत की बात यही है कि यूपीआई का सफर मुफ्त और निर्बाध रूप से जारी है।
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