खबरीलाल विशेष संवाददाता | बिजनौर
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर फैले घने जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग पूरी तरह से 'एक्शन मोड' में आ गया है। जंगल के शांत माहौल में उस वक्त हलचल मच गई, जब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड वन विभाग की संयुक्त टीमों ने भारी लाव-लश्कर के साथ एक विशाल 'फ्लैग मार्च' निकाला। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सीमावर्ती जंगलों में वन्यजीवों की तस्करी और अवैध शिकार का खतरा लगातार बना रहता है।
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n@Shakeel57767846 बिजनौर के बढ़ापुर वन रेंज (विजयपुर सिंह चौकी) में यूपी और उत्तराखंड वन विभाग ने वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए संयुक्त फ्लैग मार्च निकाला। गुर्जर बस्तियों और वन क्षेत्रों का बारीकी से निरीक्षण कर शिकारियों को सख्त चेतावनी दी गई। pic.twitter.com/CvSVkQZ32v
\r\n— MK Vashisth (@vadhisth) August 5, 2026 🏪 आपके शहर के ऑफर
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Khabreelal.com की इस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट में हम आपको बता रहे हैं कि आखिर क्यों दोनों राज्यों के वन विभागों को यह संयुक्त ऑपरेशन चलाना पड़ा और इसका मुख्य केंद्र बिजनौर का बढ़ापुर वन रेंज क्यों रहा।
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\r\n\r\nसीमावर्ती जंगलों में क्यों जरूरी हुआ यह संयुक्त फ्लैग मार्च?
\r\n\r\nबिजनौर जिले का वन क्षेत्र, विशेषकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा से सटा हुआ इलाका, जैव विविधता (Biodiversity) के लिहाज से बेहद समृद्ध और संवेदनशील माना जाता है। यह इलाका जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क (Uttarakhand) और अमानगढ़ टाइगर रिजर्व (UP) के बेहद करीब है, जिसके कारण यहां बाघ, गुलदार (तेंदुआ), हाथी, हिरण और अन्य दुर्लभ वन्यजीवों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।
\r\n\r\nअक्सर देखा गया है कि शिकारी और पशु तस्कर दो राज्यों की सीमा होने का फायदा उठाते हैं। वे एक राज्य में अपराध करते हैं और दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे कानूनी कार्रवाई में अड़चन आती है। इसी 'बॉर्डर लूपहोल' को खत्म करने और तस्करों के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए यूपी और उत्तराखंड वन विभाग ने आपसी समन्वय (Coordination) स्थापित करते हुए यह संयुक्त फ्लैग मार्च निकाला है।
\r\n\r\nऑपरेशन का केंद्र: बढ़ापुर वन रेंज और विजयपुर सिंह चौकी
\r\n\r\nइस पूरे संयुक्त अभियान का मुख्य केंद्र बिजनौर वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाला बढ़ापुर वन रेंज और उसकी अति-संवेदनशील 'विजयपुर सिंह चौकी' रहा। यह चौकी रणनीतिक रूप से ऐसी जगह स्थित है, जहां से जंगल के कई अहम रास्तों की निगरानी की जाती है।
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- \r\n गहन गश्त: दोनों राज्यों के रेंजरों, वन दरोगाओं और भारी संख्या में वन रक्षकों (Forest Guards) की टीम ने पैदल और विभागीय वाहनों के जरिए जंगल के दुर्गम रास्तों पर सघन गश्त की।\r\n \r\n
- \r\n संदिग्ध रास्तों की चेकिंग: जंगल के उन कच्चे रास्तों (पगडंडियों) का बारीकी से निरीक्षण किया गया, जिनका इस्तेमाल अक्सर तस्कर, लकड़ी माफिया और शिकारी करते हैं।\r\n \r\n
- \r\n पगमार्कों की जांच: टीम ने वन्यजीवों की मौजूदगी और किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश की पुष्टि के लिए जल स्रोतों के पास पगमार्क (पैरों के निशान) की भी जांच की।\r\n \r\n
\r\n\r\nगुर्जर बस्तियों (खत्तों) का किया गया बारीकी से निरीक्षण
\r\n\r\nजंगलों के भीतर सदियों से गुर्जर समुदाय के लोग अपनी बस्तियां बनाकर रहते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'खत्ता' कहा जाता है। वन विभाग की संयुक्त टीम ने इन गुर्जर बस्तियों का विशेष रूप से निरीक्षण किया।
\r\n\r\nनिरीक्षण के मुख्य कारण:
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- \r\n अवैध घुसपैठ की जांच: कई बार बाहरी शिकारी या तस्कर इन बस्तियों के आसपास या जंगल के भीतरी हिस्सों में छिपने का प्रयास करते हैं। टीम ने यह सुनिश्चित किया कि बस्तियों में कोई अनजान या संदिग्ध व्यक्ति तो नहीं रह रहा है।\r\n \r\n
- \r\n मुखबिर तंत्र को मजबूत करना: वन विभाग ने गुर्जर समुदाय के लोगों के साथ संवाद स्थापित किया। उन्हें समझाया गया कि वन्यजीवों और जंगल की सुरक्षा में वे वन विभाग की आंख और कान बनें। यदि कोई भी संदिग्ध गतिविधि या अनजान व्यक्ति जंगल में दिखाई दे, तो तुरंत वन विभाग को सूचित करें।\r\n \r\n
- \r\n चेतावनी और जागरूकता: बस्तियों में सख्त हिदायत दी गई कि कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार की अवैध वन उपज की कटाई या वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में संलिप्त न हो, अन्यथा उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।\r\n \r\n
\r\n\r\nपशु तस्करों व शिकारियों पर वन विभाग की 'तीसरी आंख'
\r\n\r\nइस फ्लैग मार्च के जरिए वन विभाग ने शिकारियों, लकड़ी माफियाओं और पशु तस्करों को एक बेहद सख्त और स्पष्ट संदेश दिया है। वन विभाग के अधिकारियों का साफ कहना है कि वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाएगा।
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- \r\n जीरो टॉलरेंस नीति: वन विभाग अब वन्यजीव अपराधों पर 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति अपना रहा है।\r\n \r\n
- \r\n मुखबिरों का जाल: जंगल के आसपास के गांवों और बस्तियों में मुखबिरों का जाल बिछा दिया गया है, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की भनक तुरंत टीम को लग सके।\r\n \r\n
- \r\n टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: सूत्रों के अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्रों में अब ड्रोन कैमरों और नाइट विजन उपकरणों के जरिए भी निगरानी बढ़ाने की तैयारी चल रही है, ताकि रात के अंधेरे में होने वाली तस्करी पर लगाम कसी जा सके।\r\n \r\n
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दो राज्यों का बेहतर समन्वय: एक सफल मॉडल
\r\n\r\nअक्सर अंतर्राज्यीय सीमाओं (Inter-state borders) पर अपराधियों को पकड़ना प्रशासन के लिए सिरदर्द साबित होता है। लेकिन यूपी और उत्तराखंड वन विभाग द्वारा उठाया गया यह कदम एक बेहतरीन मॉडल है। जब दोनों राज्यों की टीमें एक साथ जंगल में उतरती हैं, तो सूचनाओं का आदान-प्रदान (Information Sharing) तेजी से होता है।
\r\n\r\nयदि कोई तस्कर यूपी से भागकर उत्तराखंड की सीमा में घुसने का प्रयास करता है, तो सामने से आ रही उत्तराखंड की टीम उसे वहीं दबोच लेगी। यह संयुक्त फ्लैग मार्च इसी रणनीति का हिस्सा है।
\r\n\r\n'खबरीलाल' का नज़रिया (Khabreelal's Take)
\r\n\r\nबिजनौर का वन क्षेत्र न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश की प्राकृतिक धरोहर है। अमानगढ़ और कॉर्बेट का यह कॉरिडोर वन्यजीवों के लिए एक प्राकृतिक घर है। वन विभाग द्वारा समय-समय पर इस तरह के फ्लैग मार्च और कॉम्बिंग ऑपरेशन (Combing Operation) चलाना बेहद जरूरी है। इससे न केवल वनकर्मियों का मनोबल बढ़ता है, बल्कि जंगल को नुकसान पहुंचाने वालों के मन में कानून का खौफ भी पैदा होता है।
\r\n\r\nआम नागरिकों और जंगल किनारे बसे ग्रामीणों को भी यह समझना होगा कि वन्यजीव हमारी पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का अहम हिस्सा हैं। इनकी सुरक्षा केवल वन विभाग की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
\r\n\r\n\r\nखबरीलाल मीडिया नेटवर्क की अपील: यदि आपको अपने क्षेत्र या जंगल के आसपास किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि, वन्यजीवों के अंगों की तस्करी या अवैध कटाई की जानकारी मिलती है, तो तुरंत वन विभाग के टोल-फ्री नंबर या स्थानीय पुलिस को सूचित करें। आपकी एक सूचना किसी बेजुबान जानवर की जान बचा सकती है।\r\n
Sabse pehle comment karne wale banein.