रिपोर्टर: शकील अहमद | बिजनौर (Bijnor News Today): उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की अदालत ने न्याय की उम्मीद में 14 साल से भटक रहे एक परिवार को आखिरकार वह सुकून दे दिया है, जिसका उन्हें सालों से इंतजार था। साल 2012 के बहुचर्चित 'प्रबल हत्याकांड' (Prabal Murder Case) में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ Second) शहजाद अली की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 7 दोषियों को उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा सुनाई है।READ ALSO:-मुजफ्फरनगर के हृदय शिव चौक में अग्नि का तांडव: संजय गिफ्ट सेंटर के गोदाम में लगी भयानक आग, बाल-बाल बचा शहर
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अदालत ने केवल दोषियों को ही सलाखों के पीछे नहीं भेजा, बल्कि उन तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी जांच के आदेश दिए हैं, जिन्होंने इस हाई-प्रोफाइल मामले में लापरवाही बरती थी और पीड़ित परिवार का साथ देने के बजाय मामले को दबाने की कोशिश की थी। दोषियों पर सवा लाख रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया गया है। आइए तफ्सील से जानते हैं कि 14 साल पहले बिजनौर की सड़कों पर आखिर ऐसा क्या हुआ था, जिसने एक 19 साल के युवा की जिंदगी छीन ली।
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19 दिसंबर 2012 की वो मनहूस रात: बैंक्वेट हॉल और साजिश का जाल

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यह खौफनाक दास्तान 19 दिसंबर 2012 से शुरू होती है। बिजनौर का रहने वाला 19 वर्षीय प्रबल एक आम युवा था। आरोप था कि उसने शहर के एक बेहद रसूखदार और वरिष्ठ वकील संजय गुप्ता की बेटी पर कोई कमेंट कर दिया था। यह बात इतनी बढ़ गई कि इसे सुलझाने के नाम पर एक खौफनाक साजिश रची गई।
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19 दिसंबर 2012 को प्रबल को बातचीत के बहाने शहर के एक बैंक्वेट हॉल (Banquet Hall) में बुलाया गया। प्रबल को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह अपने पैरों पर चलकर अपनी मौत के कुएं में जा रहा है। बैंक्वेट हॉल में पहले से घात लगाए बैठे आरोपियों ने प्रबल की बेरहमी से हत्या कर दी। हत्यारों ने वारदात को इस सफाई से अंजाम दिया कि किसी को कानों-कान खबर तक नहीं हुई और साक्ष्यों को मिटाने के लिए प्रबल की लाश को वहां से रातों-रात गायब कर दिया गया।
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दर-दर की ठोकरें और 25 दिन का वो अंतहीन इंतजार

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प्रबल जब रात को घर नहीं लौटा, तो उसके परिवार वालों की सांसें अटक गईं। अगले ही दिन से परिवार ने उसे पागलों की तरह तलाशना शुरू कर दिया। बिजनौर का हर कोना, हर अस्पताल, रिश्तेदारों के घर... कोई ऐसी जगह नहीं बची जहां प्रबल के परिवार ने दस्तक न दी हो।
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यह वह दौर था जब पीड़ित परिवार को सबसे ज्यादा पुलिस की मदद की जरूरत थी, लेकिन रसूखदारों के दबाव के चलते बिजनौर की तत्कालीन पुलिस ने परिवार का बिल्कुल भी साथ नहीं दिया। पुलिस का रवैया पूरी तरह से टालमटोल वाला रहा। प्रबल के परिवार वाले थानों के चक्कर काटते रहे, मिन्नतें करते रहे, लेकिन पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई या तलाश अभियान शुरू नहीं किया गया। 25 दिन तक एक मां और बहन के लिए हर बीतता पल किसी सदी से कम नहीं था।
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गंगा की लहरों और एक मोबाइल सिम ने खोला कत्ल का राज

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कहते हैं कि 'अपराधी चाहे कितने भी शातिर क्यों न हों, कुदरत कभी न कभी इंसाफ का रास्ता निकाल ही लेती है।' प्रबल की हत्या के 25 दिन बीत चुके थे। इसी बीच एक अन्य परिवार अपनी लापता बेटी की तलाश में बिजनौर के पास गंगा नदी के खादर इलाके में भटक रहा था।
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लड़की की तलाश कर रहे इन लोगों की नजर गंगा किनारे तैरती एक अज्ञात लाश पर पड़ी। जब उन्होंने लाश को बाहर निकाला, तो वह बुरी तरह सड़-गल चुकी थी। लेकिन उस लाश के कपड़ों की तलाशी के दौरान चमत्कारिक रूप से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ। 25 दिन पानी में रहने के बावजूद मोबाइल के अंदर मौजूद सिम कार्ड (SIM Card) सुरक्षित था। उन अनजान लोगों ने इंसानियत दिखाते हुए उस सिम कार्ड को निकाला, उसे दूसरे फोन में डालकर चालू किया और उसमें मौजूद नंबरों पर संपर्क किया। यह कॉल प्रबल के परिवार को लगी और इस तरह 25 दिन बाद परिवार को पता चला कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा।
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मुकदमा, रसूखदारों का दबाव और 14 साल की कानूनी जंग

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शव मिलने के बाद बिजनौर में भारी हंगामा हुआ। साक्ष्यों और लाश के सामने आने के बाद पुलिस को मजबूरन हत्या (Murder - Section 302) और सबूत मिटाने का मामला दर्ज कर जांच शुरू करनी पड़ी। लेकिन चूंकि मामला वरिष्ठ वकील के परिवार से जुड़ा था, इसलिए इस कानूनी लड़ाई की राह कतई आसान नहीं थी।
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पीड़ित परिवार की ओर से अदालत में मोर्चा संभाला एडवोकेट अहमद जकावत ने। कोर्ट में गवाहों को मुकरना, तारीखों का लंबा खिंचना और पुलिस की ढीली चार्जशीट जैसी तमाम बाधाएं आईं। लेकिन पीड़ित परिवार और उनके वकील अहमद जकावत ने हार नहीं मानी। उन्होंने 14 सालों तक एक-एक सबूत अदालत के सामने रखा।
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एडीजे कोर्ट का कड़क फैसला: दोषियों को उम्रकैद और अधिकारियों पर गिरेगी गाज

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मंगलवार को इस ऐतिहासिक मामले में अपर सत्र न्यायाधीश (ADJ Second) शहजाद अली ने अपना फाइनल जजमेंट सुनाया। अदालत ने अभियोजन पक्ष की दलीलों, गवाहियों और पारिस्थितिक साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) को पुख्ता मानते हुए सभी 7 आरोपियों को प्रबल की हत्या का दोषी करार दिया।
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जज शहजाद अली ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सातों दोषियों को उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई है। इसके साथ ही प्रत्येक दोषी पर आर्थिक दंड लगाते हुए कुल सवा लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
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इस फैसले का सबसे अहम और साहसिक हिस्सा यह रहा कि अदालत ने घटना के वक्त (2012 में) तैनात उन पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं, जिन्होंने जानबूझकर जांच भटकाई थी और पीड़ित परिवार की मदद नहीं की थी। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि उन तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ भी विभागीय और कानूनी जांच शुरू की जाए ताकि भविष्य में कोई पुलिसकर्मी वर्दी का ऐसा दुरुपयोग न कर सके।
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"आज मेरे भाई की आत्मा को शांति मिली है" - मृतक की बहन

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कोर्ट रूम के बाहर फैसले के बाद का माहौल बेहद भावुक था। 14 साल तक अपने भाई के लिए दर-दर की ठोकरें खाने वाली प्रबल की बहन प्राची अग्रवाल (Prachi Agarwal) के चेहरे पर आंसुओं के साथ न्याय मिलने का एक गहरा सुकून था।
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मीडिया और रिपोर्टर शकील अहमद से बात करते हुए बहन प्राची अग्रवाल ने कहा, "आज 14 साल बाद मेरे भाई को इंसाफ मिला है। दोषियों ने बड़ी बेरहमी से मेरे निर्दोष भाई की हत्या की थी और हमें महीनों तक गुमराह किया गया। आज अदालत के इस फैसले से हमारे पूरे परिवार को तसल्ली मिली है। हम जज साहब और अपने वकील अहमद जकावत के बेहद आभारी हैं जिन्होंने इस मुश्किल लड़ाई में हमारा साथ नहीं छोड़ा।"
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वहीं, पीड़ित पक्ष के वकील अहमद जकावत (Advocate Ahmed Zakawat) ने अपनी बाइट में कहा, "यह न्याय की एक बड़ी जीत है। बचाव पक्ष ने रसूख और पैसे के दम पर केस को भटकाने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन अदालत ने सिर्फ और सिर्फ सबूतों को देखा। 7 लोगों को उम्रकैद की सजा और लापरवाह अधिकारियों पर जांच का आदेश समाज में एक कड़ा संदेश देगा कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।"
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बिजनौर का यह प्रबल हत्याकांड भारतीय न्याय व्यवस्था की उस पुरानी कहावत को चरितार्थ करता है कि "कानून की चक्की पीसती जरूर थोड़ा धीमा है, लेकिन पीसती बहुत बारीक है।" 14 साल का यह सफर एक परिवार के लिए बेहद दर्दनाक रहा, लेकिन आज मिली इस सजा ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता, रसूख और खाकी का गठजोड़ भी अंततः न्याय के कटघरे में झुकने को मजबूर होता है।
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