उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर और फिरोजाबाद जिले में आज शाम एक अलग ही नजारा देखने को मिला। शाम के ठीक 6 बजते ही सायरन की आवाज गूंजी और देखते ही देखते कई इलाके अंधेरे में डूब गए। यह कोई बिजली कटौती नहीं, बल्कि प्रशासन द्वारा आयोजित Blackout Mock Drill थी। 23 जनवरी, यानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर हवाई हमले और आपदा जैसी स्थितियों से निपटने के लिए यह विशेष अभ्यास किया गया।READ ALSO:-देशभक्ति का डबल डोज: 'बॉर्डर 2' की रिलीज के दिन सलमान खान ने दिया सरप्राइज, 'बैटल ऑफ गलवान' के गाने 'मातृभूमि' का टीजर देख फैंस बोले- 'ब्लॉकबस्टर'
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अंबेडकरनगर और फिरोजाबाद में दिखा असर

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अंबेडकरनगर और फिरोजाबाद में प्रशासन ने इस मॉक ड्रिल को लेकर पुख्ता इंतजाम किए थे। शाम 6 बजे से 6 बजकर 10 मिनट तक चले इस अभ्यास में नागरिकों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
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    फिरोजाबाद: यहाँ के पीडी जैन इंटर कॉलेज (PD Jain Inter College) के खेल मैदान और आसपास के क्षेत्रों को इस ड्रिल का मुख्य केंद्र बनाया गया था। सिविल डिफेंस, पुलिस और फायर ब्रिगेड की गाड़ियों ने सायरन बजाकर लोगों को सतर्क किया।
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    अंबेडकरनगर: यहाँ भी सायरन बजते ही लोगों ने अपने घरों की लाइटें बंद कर दीं। सड़कों पर स्ट्रीट लाइट्स बुझा दी गईं। इसका उद्देश्य यह जांचना था कि आपात स्थिति में जिला प्रशासन और आम जनता कितनी जल्दी प्रतिक्रिया दे सकती है।
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क्या है ब्लैकआउट मॉक ड्रिल? (What is Blackout Mock Drill?)

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Blackout Mock Drill एक सुरक्षा अभ्यास है, जिसे युद्ध या हवाई हमले (Air Raid) की स्थिति के लिए तैयार रहने के लिए किया जाता है।
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    दुश्मन को भ्रमित करना: रात के समय दुश्मन के विमान या ड्रोन रोशनी को निशाना बनाकर हमला करते हैं। ब्लैकआउट का मुख्य उद्देश्य शहर की पहचान छिपाना और दुश्मन को भ्रमित करना होता है।
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    त्वरित प्रतिक्रिया: इस ड्रिल के जरिए यह परखा जाता है कि सायरन बजने के कितने समय के भीतर पूरा शहर अंधेरे (Blackout) में जा सकता है।
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    आपदा प्रबंधन: यह केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि किसी बड़ी तकनीकी खराबी या प्राकृतिक आपदा के समय भी राहत कार्य को सुचारू रूप से चलाने का एक अभ्यास है।
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इतिहास और आधुनिक प्रासंगिकता

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विशेषज्ञों के अनुसार, इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि ब्लैकआउट ने लाखों लोगों की जान बचाई है। द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के दौरान लंदन समेत कई शहरों में नियमित ब्लैकआउट किए जाते थे ताकि दुश्मन के बॉम्बर विमानों को शहर की लोकेशन न मिल सके। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी भारत में ऐसे ब्लैकआउट आम थे।
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आज के आधुनिक दौर में भले ही राडार और सैटेलाइट तकनीक आ गई है, लेकिन ड्रोन हमलों (Drone Attacks) के खतरे को देखते हुए Blackout Mock Drill की प्रासंगिकता फिर से बढ़ गई है। यह प्रशासन की तैयारियों का 'रियलिटी चेक' होता है।
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ड्रिल के दौरान क्या हुआ?

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इस 10 मिनट की ड्रिल के दौरान निम्नलिखित गतिविधियां देखी गईं:
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    सायरन: पहले 'हमला' दर्शाने वाला उतार-चढ़ाव वाला सायरन बजा, और ड्रिल खत्म होने पर 6:10 बजे एक लंबी 'ऑल क्लियर' बीप बजाई गई।
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    ब्लैकआउट: घरों, दुकानों और सरकारी इमारतों की लाइटें बंद कर दी गईं।
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    राहत बचाव: सिविल डिफेंस के वॉलंटियर्स ने 'घायलों' को निकालने और आग बुझाने का डेमो दिया।
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अंबेडकरनगर और फिरोजाबाद में संपन्न हुई यह Blackout Mock Drill सफल रही। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक अभ्यास था और नागरिकों को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस तरह के अभ्यास न केवल सुरक्षा एजेंसियों को चुस्त रखते हैं, बल्कि आम जनता को भी जागरूक करते हैं कि किसी भी आपात स्थिति में संयम और अनुशासन कैसे बनाए रखना है।
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अंबेडकरनगर और फिरोजाबाद में आज शाम 6 बजे से 6:10 बजे तक Blackout Mock Drill का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य हवाई हमलों और आपात स्थितियों के लिए प्रशासन और जनता की तैयारियों को परखना था। सायरन बजते ही इलाकों में अंधेरा कर दिया गया और सिविल डिफेंस ने राहत कार्यों का प्रदर्शन किया।
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