नई दिल्ली (एस्ट्रो/साइंस डेस्क): ब्रह्मांड रहस्यों और अद्भुत खगोलीय घटनाओं से भरा पड़ा है। इनमें से सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली घटना 'ग्रहण' (Eclipse) होती है। चाहे वह चंद्र ग्रहण हो या सूर्य ग्रहण, दुनिया भर के वैज्ञानिकों से लेकर आम इंसान तक, हर कोई इस दुर्लभ नजारे को देखने के लिए उत्सुक रहता है। साल 2026 में आसमान एक बार फिर से इस बड़ी खगोलीय घटना का गवाह बनने जा रहा है।READ ALSO:-मिडिल क्लास और जनरल कैटेगरी के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी: बिना आरक्षण सीधे खाते में आएंगे ₹80,000, बस करना होगा ये छोटा सा काम!
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
कैलेंडर के पन्नों पर 12 अगस्त 2026 की तारीख दर्ज कर लीजिए, क्योंकि इस दिन साल का दूसरा और आखिरी सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse 2026) लगने जा रहा है। यह ग्रहण न केवल वैज्ञानिकों के लिए शोध का एक नया विषय लेकर आएगा, बल्कि ज्योतिषीय गणनाओं (Astrological Calculations) के लिहाज से भी इसका गहरा प्रभाव माना जा रहा है। हालांकि, भारतीय जनमानस के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह भारत में दिखाई देगा और क्या यहां 'सूतक काल' (Sutak Kaal) के कड़े नियमों का पालन करना होगा? आइए इस विस्तृत रिपोर्ट में हर एक पहलू पर विस्तार से चर्चा करते हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

क्या है सूर्य ग्रहण और यह क्यों खास है? (वैज्ञानिक दृष्टिकोण)

\r\n\r\n
विज्ञान की भाषा में बात करें तो सूर्य ग्रहण पूरी तरह से एक प्राकृतिक और खगोलीय प्रक्रिया है। हमारा सौरमंडल (Solar System) एक निश्चित गति और नियम पर काम करता है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है और चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस परिक्रमा के दौरान एक क्षण ऐसा आता है जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी तीनों एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। इस स्थिति में चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के ठीक बीच में आ जाता है, जिससे सूर्य की रोशनी सीधे पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाती और चंद्रमा की परछाई पृथ्वी पर पड़ने लगती है। इसी खगोलीय छाया को 'सूर्य ग्रहण' कहा जाता है।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n
12 अगस्त 2026 को लगने वाला यह सूर्य ग्रहण इसलिए भी खास है क्योंकि यह साल का आखिरी सूर्य ग्रहण होगा। दुनिया के कई हिस्सों (विशेषकर उत्तरी गोलार्ध के कुछ देशों जैसे ग्रीनलैंड, आइसलैंड, स्पेन और आर्कटिक क्षेत्रों) में दिन के उजाले में अचानक गोधूलि या शाम जैसा अंधेरा छा जाएगा, जो प्रकृति के सबसे मंत्रमुग्ध कर देने वाले दृश्यों में से एक होता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

क्या भारत में दिखेगा 12 अगस्त का सूर्य ग्रहण? (Visibility in India)

\r\n\r\n
जब भी ग्रहण की खबर आती है, तो भारतीय लोगों के जहन में सबसे पहला सवाल इसकी 'दृश्यता' (Visibility) को लेकर होता है। तो आपको बता दें कि 12 अगस्त 2026 को लगने वाला यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
भौगोलिक स्थिति और समय के अंतर के कारण, जब दुनिया के जिन हिस्सों में यह ग्रहण अपने चरम पर होगा, उस वक्त भारत में सूर्यास्त हो चुका होगा या भौगोलिक कोण ऐसा होगा कि भारतीय भूभाग पर चंद्रमा की कोई छाया नहीं पड़ेगी। चूंकि यह भारत के आसमान में नजर नहीं आएगा, इसलिए यहां के जनजीवन पर इसका कोई भौतिक या दृश्य प्रभाव नहीं पड़ेगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

सूतक काल और उसके नियम: क्या भारत में मान्य होगा? 

\r\n\r\n
भारतीय सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष में 'सूतक काल' (Sutak Kaal) को विशेष महत्व दिया गया है। सूतक काल उस समय अवधि को कहते हैं जिसे किसी भी शुभ कार्य या पूजा-पाठ के लिए अशुभ (Inauspicious) माना जाता है। सूर्य ग्रहण के मामले में सूतक काल ग्रहण शुरू होने से ठीक 12 घंटे पहले लग जाता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
सूतक काल के दौरान कई कड़े नियमों का पालन किया जाता है:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    मंदिरों के कपाट: सभी छोटे-बड़े मंदिरों के कपाट (दरवाजे) बंद कर दिए जाते हैं और मूर्तियों को स्पर्श करने की मनाही होती है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    भोजन पकाना और खाना: इस दौरान भोजन पकाना या खाना वर्जित माना जाता है। जो खाना पहले से पका होता है, उसमें तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) डाल दिए जाते हैं ताकि नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव उस पर न पड़े।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    गर्भवती महिलाओं के लिए नियम: विशेष तौर पर गर्भवती महिलाओं को घर से बाहर न निकलने, नुकीली चीजों (जैसे चाकू, कैंची, सुई) का इस्तेमाल न करने की सलाह दी जाती है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
क्या 12 अगस्त को सूतक लगेगा? ज्योतिष शास्त्र का एक बेहद स्पष्ट और सर्वमान्य नियम है— "यत्र दृश्यते तत्र फलम्" (अर्थात, जहां ग्रहण दिखाई देता है, वहीं उसका सूतक और प्रभाव मान्य होता है)। चूंकि 12 अगस्त 2026 का यह सूर्य ग्रहण भारत की सीमा में बिल्कुल भी दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहां सूतक काल मान्य नहीं होगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
देश के सभी मंदिर खुले रहेंगे, पूजा-पाठ अपने निर्धारित समय पर होगी और आम जनजीवन से लेकर खान-पान तक की कोई पाबंदी (Restrictions) लागू नहीं होगी। गर्भवती महिलाओं को भी इस ग्रहण को लेकर किसी तरह के भ्रम या भय में रहने की कोई आवश्यकता नहीं है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

पौराणिक मान्यता: राहु-केतु और समुद्र मंथन की कथा

\r\n\r\n
भले ही विज्ञान इसे सिर्फ छाया का खेल मानता हो, लेकिन भारतीय पौराणिक कथाओं में ग्रहण की एक बहुत ही रोचक और गहरी कहानी है। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, ग्रहण का सीधा संबंध 'समुद्र मंथन' (Samudra Manthan) से है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तो उसमें से 'अमृत कलश' निकला था। अमृत बांटने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया था। लेकिन 'स्वर्भानु' नाम का एक चालाक असुर देवताओं की पंक्ति में वेश बदलकर बैठ गया और उसने धोखे से अमृत पी लिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
सूर्य देव (Surya) और चंद्र देव (Chandra) ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया और भगवान विष्णु को बता दिया। क्रोधित होकर विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन अमृत पीने के कारण वह मरा नहीं। उसका सिर वाला हिस्सा 'राहु' (Rahu) और धड़ वाला हिस्सा 'केतु' (Ketu) कहलाया। मान्यता है कि सूर्य और चंद्रमा की इसी मुखबिरी का बदला लेने के लिए राहु और केतु समय-समय पर उन पर हमला करते हैं, उन्हें ग्रस लेते हैं, जिसे हम ग्रहण कहते हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

फ्लैशबैक: कैसा था साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण?

\r\n\r\n
12 अगस्त की घटना को समझने के साथ-साथ यह जानना भी दिलचस्प है कि साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण कैसा था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    तारीख: इस वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी 2026 को लगा था।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    रिंग ऑफ फायर (Ring of Fire): यह एक 'वलयाकार' (Annular) सूर्य ग्रहण था। वलयाकार ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी से अपनी अधिकतम दूरी (Apogee) पर होता है और वह सूर्य की पूरी डिस्क को नहीं ढक पाता। इस कारण सूर्य के किनारे एक चमकती हुई अंगूठी की तरह नजर आते हैं, जिसे दुनिया 'रिंग ऑफ फायर' के नाम से जानती है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    समय और दृश्यता: भारतीय समयानुसार यह 17 फरवरी को दोपहर 3:26 बजे से शुरू होकर शाम 7:57 बजे तक चला था। लेकिन 12 अगस्त के ग्रहण की तरह ही, 17 फरवरी का वह अद्भुत 'रिंग ऑफ फायर' वाला ग्रहण भी भारत के लोगों की नजरों से दूर ही रहा था (यानी भारत में दिखाई नहीं दिया था)।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

वैज्ञानिकों की चेतावनी: सूर्य ग्रहण देखने के 'डूज़ एंड डोन्ट्स' (Do's and Don'ts)

\r\n\r\n
भले ही यह ग्रहण भारत में न दिखे, लेकिन जो लोग इसे लाइव स्ट्रीमिंग (Live Streaming) या उन देशों में जाकर देखने की योजना बना रहे हैं जहां यह दिखाई देगा, उनके लिए वैज्ञानिकों और नासा (NASA) ने कड़ी चेतावनियां जारी की हैं:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    नंगी आंखों से न देखें: सूर्य ग्रहण को कभी भी नंगी आंखों (Naked Eyes) से देखने की गलती न करें। सूर्य की अल्ट्रावॉयलेट (UV) किरणें आपकी आंखों के रेटिना को हमेशा के लिए जला सकती हैं, जिससे स्थायी अंधापन (Solar Retinopathy) हो सकता है।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    प्रमाणित चश्मे का इस्तेमाल: इसे देखने के लिए हमेशा "ISO 12312-2" प्रमाणित सोलर फिल्टर वाले विशेष चश्मे (Solar Eclipse Glasses) का ही उपयोग करें।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    एक्स-रे या काले चश्मे से बचें: साधारण सनग्लासेस (कितने भी डार्क क्यों न हों), पुरानी एक्स-रे फिल्म, या पानी में सूर्य का अक्स (प्रतिबिंब) देखना भी सुरक्षित नहीं है।
    \r\n
  6. \r\n
  7. \r\n
    दूरबीन और कैमरे के लिए विशेष फिल्टर: दूरबीन (Binoculars) या कैमरे के लेंस से ग्रहण की तस्वीरें खींचने से पहले उन पर भी 'सोलर फिल्टर' लगाना अनिवार्य है, अन्यथा लेंस से छनकर आने वाली किरणें एक सेकंड के भीतर आंखों की रोशनी छीन सकती हैं।
    \r\n
  8. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

खगोल विज्ञान (Astronomy) के लिए सूर्य ग्रहण का महत्व

\r\n\r\n
वैज्ञानिक समुदाय के लिए पूर्ण या आंशिक सूर्य ग्रहण महज एक रोमांचक घटना नहीं, बल्कि एक 'प्राकृतिक प्रयोगशाला' (Natural Laboratory) के खुलने जैसा है। आम दिनों में सूर्य की अत्यधिक चमक के कारण उसकी बाहरी परत जिसे 'कोरोना' (Corona) कहा जाता है, का अध्ययन करना लगभग असंभव होता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
लेकिन सूर्य ग्रहण के दौरान, जब चंद्रमा सूर्य की तेज रोशनी को पूरी तरह ढक लेता है, तब सूर्य का यह छिपा हुआ वायुमंडल (कोरोना) स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। वैज्ञानिक इसी कीमती समय का उपयोग सूर्य की चुंबकीय ऊर्जा (Magnetic Fields), सौर हवाओं (Solar Winds) और अंतरिक्ष के मौसम (Space Weather) को बेहतर ढंग से समझने के लिए करते हैं, जिसका सीधा असर पृथ्वी की सैटेलाइट्स (Satellites) और संचार प्रणालियों पर पड़ता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
12 अगस्त 2026 का सूर्य ग्रहण ब्रह्मांड की अनंत सुंदरता और खगोलीय संतुलन का एक शानदार उदाहरण पेश करेगा। भारतवासियों के लिए यह राहत की बात है कि सूतक काल के किसी भी नियम या पाबंदी का पालन नहीं करना पड़ेगा। आप चाहें तो इंटरनेट या नासा के लाइव ब्रॉडकास्ट के माध्यम से दुनिया के दूसरे हिस्सों में घटित हो रहे इस अद्भुत 'कॉस्मिक शो' का आनंद अपने घर बैठे सुरक्षित रूप से ले सकते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें