नई दिल्ली: आज की डिजिटल दुनिया में जहां हमारे हाथ में मौजूद स्मार्टफोन ही दुनिया भर की खबरें और मनोरंजन का साधन बन गया है, वहीं एक दौर ऐसा भी था जब लकड़ी के डिब्बे में कैद 'आवाज के जादूगर' यानी रेडियो का राज हुआ करता था। आज World Radio Day 2026 (विश्व रेडियो दिवस) के मौके पर हम आपको इतिहास के उन पन्नों में ले चलते हैं, जब रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि रईसी की पहचान हुआ करता था।READ ALSO:-RBI का 'नोट' और जनता की 'वोट': क्या आपकी जेब में रखा 500 का नोट बदलने वाला है? जानिए रिजर्व बैंक के नए 'सिक्योरिटी चक्रव्यूह' की पूरी कहानी
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क्या आप यकीन करेंगे कि 1970 और 80 के दशक तक भारत में रेडियो रखने के लिए भी ठीक वैसे ही लाइसेंस (Radio License) लेना पड़ता था, जैसे आज गाड़ी चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस या बंदूक रखने के लिए आर्म्स लाइसेंस की जरूरत होती है? जी हां, यह सच है। पोस्ट ऑफिस के चक्कर काटने से लेकर भारी-भरकम वॉल्व सेट तक, रेडियो का इतिहास बेहद रोमांचक रहा है।
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World Radio Day 2026: रेडियो का आविष्कार और असली नायक

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रेडियो का इतिहास किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। यह किसी एक व्यक्ति के दिमाग की उपज नहीं थी, बल्कि कई महान वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत का नतीजा था। हालांकि, जब भी दुनिया के पहले रेडियो की बात होती है, तो इटली के महान आविष्कारक गुग्लिएल्मो मार्कोनी (Guglielmo Marconi) का नाम सबसे ऊपर आता है।
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इतिहास के पन्नों को पलटें तो साल 1895 वह क्रांतिकारी वर्ष था जब मार्कोनी ने पहली बार रेडियो तरंगों (Radio Waves) के जरिए सिग्नल भेजने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी। मार्कोनी ने साबित कर दिया कि तारों (Wires) के बिना भी संदेश एक जगह से दूसरी जगह भेजे जा सकते हैं। यही वजह है कि उन्हें दुनिया के पहले सफल वायरलेस टेलीग्राफ और व्यावहारिक रेडियो का जनक माना जाता है।
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(Internal link to related article: जगदीश चंद्र बसु और उनका वायरलेस विज्ञान में योगदान)
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हालांकि, विज्ञान की दुनिया में यह बहस हमेशा रही है कि रेडियो का असली आविष्कारक कौन है? मार्कोनी से पहले निकोला टेस्ला (Nikola Tesla), हेनरिक हर्ट्ज (Heinrich Hertz) और भारत के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु (J.C. Bose) ने भी रेडियो तरंगों पर महत्वपूर्ण और बुनियादी शोध किए थे। लेकिन मार्कोनी की खासियत यह थी कि उन्होंने इन सिद्धांतों को एक 'कमर्शियल प्रोडक्ट' और व्यावहारिक संचार उपकरण (Communication Device) में बदल दिया।
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वो पहली कंपनी जिसने दुनिया को रेडियो दिया

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रेडियो को प्रयोगशाला से निकालकर आम लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुंचाने का श्रेय भी मार्कोनी को ही जाता है। व्यावसायिक तौर पर रेडियो बनाने की शुरुआत खुद गुग्लिएल्मो मार्कोनी ने की थी। उन्होंने 1897 में ब्रिटेन में 'द मार्कोनी वायरलेस टेलीग्राफ एंड सिग्नल कंपनी' (The Marconi Wireless Telegraph & Signal Company) की स्थापना की। यह दुनिया की पहली ऐसी कंपनी थी जो रेडियो संचार पर केंद्रित थी।
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इसके बाद अमेरिका की कंपनी वेस्टिंगहाउस (Westinghouse) ने 1920 के दशक में एक बड़ी क्रांति की। वेस्टिंगहाउस वह पहली बड़ी कंपनी बनी जिसने बड़े पैमाने पर आम जनता के लिए 'घरेलू रेडियो सेट' (Home Radio Sets) का निर्माण शुरू किया। यहीं से रेडियो घर-घर पहुंचने लगा।
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आज के 3 लाख रुपये के बराबर थी पहले रेडियो की कीमत

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आज आप बाजार में कुछ सौ रुपये में रेडियो खरीद सकते हैं, लेकिन 1920 के दशक में यह एक 'लक्जरी आइटम' (Luxury Item) था। उस दौर में रेडियो खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं थी।
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आंकड़ों के मुताबिक, शुरुआती कमर्शियल रेडियो सेट, जैसे कि वेस्टिंगहाउस का प्रसिद्ध RA-DA मॉडल, उस समय लगभग $50 से $200 के बीच बिकता था। सुनने में यह रकम कम लग सकती है, लेकिन अगर हम 1920 के $200 की तुलना आज (2026) की मुद्रास्फीति (Inflation) से करें, तो यह रकम होश उड़ाने वाली है।
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आज के हिसाब से वह कीमत लगभग $3,000 से $3,500 डॉलर होती है। भारतीय मुद्रा में बदलें तो यह करीब 2.5 लाख से 3 लाख रुपये बैठती है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उस जमाने में रेडियो रखना कितना बड़ा स्टेटस सिंबल था। यह केवल अमीर घरों की शोभा बढ़ाता था और पूरा मोहल्ला एक रेडियो की आवाज सुनने के लिए इकट्ठा हो जाता था।
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भारत में रेडियो: लाइसेंस राज और जुर्माना

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World Radio Day 2026 पर भारत के रेडियो इतिहास का जिक्र करना सबसे दिलचस्प है। 1970 और 80 के दशक तक भारत में रेडियो रखना उतना आसान नहीं था जितना आज है। उस दौर में रेडियो एक नियंत्रित उपकरण था।
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लाइसेंस की अनिवार्यता: जैसे आज आप शोरूम से गाड़ी खरीदते हैं और RTO से लाइसेंस बनवाते हैं, वैसे ही उस जमाने में रेडियो खरीदने के बाद आपको पोस्ट ऑफिस (Post Office) जाना पड़ता था। वहां आपको अपने रेडियो सेट का रजिस्ट्रेशन करवाना होता था और एक 'रेडियो लाइसेंस' (Radio License) बनवाना पड़ता था।
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इतना ही नहीं, हर साल इस लाइसेंस को रिन्यू (Renew) करवाने के लिए सालाना फीस (Annual Fee) भी देनी पड़ती थी। यह एक छोटी पासबुक जैसा होता था जिसमें डाकघर की मुहर लगती थी।
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जुर्माने का डर: उस दौर में 'रेडियो इंस्पेक्टर' का भी डर होता था। अगर आप बिना लाइसेंस के रेडियो बजाते हुए पकड़े जाते थे, तो आप पर भारी जुर्माना लगाया जाता था और रेडियो जब्त भी हो सकता था। यह लाइसेंस राज 1980 के दशक के अंत में जाकर खत्म हुआ, जिसके बाद रेडियो पूरी तरह से मुक्त हुआ।
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भारत में आकाशवाणी और ब्रांड्स का उदय

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भारत में रेडियो की शुरुआत बहुत ही शाही अंदाज में हुई थी। आधिकारिक तौर पर ऑल इंडिया रेडियो आने से बहुत पहले, साल 1923 में 'रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे' ने भारत में पहला प्रसारण किया था। यह एक निजी पहल थी।
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बाद में सरकार ने इसकी ताकत को पहचाना और 1930 में 'इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस' (Indian State Broadcasting Service) की शुरुआत की। यही संस्था आगे चलकर 1936 में ऑल इंडिया रेडियो (AIR) बनी। आज़ादी के बाद 1957 में इसका नाम आधिकारिक रूप से 'आकाशवाणी' कर दिया गया, जो आज भी भारत की आवाज बना हुआ है।
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मर्फी और फिलिप्स का दौर: जब बात रेडियो सेट की आती है, तो पुराने लोगों के जेहन में सबसे पहला नाम 'मर्फी' (Murphy) का आता है। मर्फी रेडियो भारत में सबसे लोकप्रिय ब्रांड बना। आपको याद होगा, उस जमाने के विज्ञापनों में एक प्यारा सा बच्चा नजर आता था जिसे 'मर्फी बेबी' (Murphy Baby) कहा जाता था। वह विज्ञापन आज भी यादों में ताजा है।
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इसके अलावा, डच कंपनी फिलिप्स (Philips) ने 1930 के दशक में भारत में रेडियो सेट आयात करने की शुरुआत की और बाद में यहीं असेंबलिंग यूनिट लगाकर भारतीय बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत की।
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वॉल्व रेडियो: जब आवाज के लिए करना पड़ता था इंतजार

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आज के डिजिटल रेडियो या मोबाइल एप पर बटन दबाते ही आवाज आने लगती है, लेकिन पुराने जमाने के रेडियो में ऐसा नहीं था। वे वॉल्व रेडियो (Valve Radios) कहलाते थे।
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कैसे काम करते थे वॉल्व रेडियो? पुराने रेडियो वैक्यूम ट्यूब्स (Vacuum Tubes) या वॉल्व पर चलते थे। जैसे ही आप रेडियो का स्विच ऑन करते थे, वह तुरंत नहीं बजता था। उसके अंदर लगे कांच के वॉल्व धीरे-धीरे गर्म (Heat up) होते थे। जब वे गर्म होकर नारंगी (Orange) रंग में जलने लगते थे, तब जाकर रेडियो से आवाज आनी शुरू होती थी। इसमें कभी-कभी 30 सेकंड से लेकर 1 मिनट तक का समय लग जाता था।
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ये रेडियो आज के छोटे पोर्टेबल सेट जैसे नहीं थे। ये लकड़ी के बने भारी-भरकम कैबिनेट (Wooden Cabinets) में आते थे। इनकी डिजाइनिंग इतनी शानदार होती थी कि लोग इन्हें अपने ड्राइंग रूम में सजाकर रखते थे, जैसे कि यह घर का सबसे कीमती फर्नीचर हो। संगीत प्रेमियों का मानना है कि वॉल्व रेडियो की आवाज (Sound Quality) में जो भारीपन और 'वॉर्मथ' (Warmth) थी, वह आज के डिजिटल रेडियो में कहीं खो गई है।
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पहला कमर्शियल स्टेशन

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रेडियो के प्रसार में अमेरिका का बड़ा हाथ रहा। अमेरिका का KDKA (पिट्सबर्ग) दुनिया का पहला कमर्शियल रेडियो स्टेशन था जिसने 1920 में अपना प्रसारण शुरू किया था। इसी के बाद दुनिया भर में रेडियो स्टेशनों की बाढ़ आ गई और यह सूचना का सबसे सशक्त माध्यम बन गया।
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World Radio Day 2026 पर हम उस सुनहरे दौर को याद कर रहे हैं जब रेडियो सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य हुआ करता था। मार्कोनी की 1895 की खोज से लेकर भारत के पोस्ट ऑफिस में लाइन लगाकर लाइसेंस बनवाने तक, रेडियो का सफर अद्भुत रहा है। आज भले ही तकनीक बदल गई हो, पॉडकास्ट और इंटरनेट रेडियो आ गए हों, लेकिन 'आकाशवाणी' की वह धुन और पुराने वॉल्व रेडियो की वह गर्माहट आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरी याद बनकर दर्ज है।
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World Radio Day 2026 के मौके पर रेडियो के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि 1895 में मार्कोनी ने इसे संभव बनाया। 1920 के दशक में पहले रेडियो की कीमत आज के 3 लाख रुपये के बराबर थी। भारत में रेडियो का इतिहास 1923 में शुरू हुआ और 1970-80 के दशक तक रेडियो रखने के लिए पोस्ट ऑफिस से लाइसेंस लेना अनिवार्य था। मर्फी और फिलिप्स जैसे ब्रांड्स ने भारत में अपनी पहचान बनाई, और वॉल्व रेडियो उस दौर की तकनीकी पहचान थे।
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