मेरठ (Meerut): पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अपराध डायरी में 'कपसाड़ कांड' (Kapsad Kand) के नाम से दर्ज हुआ खौफनाक अध्याय अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ पुलिस की पूरी जांच और धाराएं बदल सकती हैं। सरधना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में एक दलित महिला की निर्मम हत्या और उसकी बेटी के अपहरण ने पूरे जिले को हिला कर रख दिया था। पुलिस ने जिस आरोपी पारस सोम को एक शातिर अपराधी मानते हुए गिरफ्तार किया और जेल भेजा, अब उसी पारस सोम के बालिग (Adult) होने पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।READ ALSO:-गाजियाबाद की सड़कों पर 'रक्तचरित': मूंगफली खरीद रहे व्यापारी को कार से रौंदा, 10 फीट घसीटा और फिर तमंचे की बट से तोड़ डालीं दोनों टांगें
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बुधवार को मेरठ की अदालत में जो हुआ, उसने इस केस की दिशा बदल दी है। आरोपी पक्ष ने दावा किया है कि पारस सोम बालिग नहीं, बल्कि नाबालिग (Minor) है। इस दावे को हवा में नहीं, बल्कि दस्तावेजों (Documents) के साथ पेश किया गया है। अगर यह दावा कोर्ट स्वीकार कर लेती है, तो हत्या और अपहरण का यह हाई-प्रोफाइल केस सामान्य अदालत से निकलकर किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) में चला जाएगा, जहाँ सजा के प्रावधान और सुनवाई का तरीका बिल्कुल अलग होता है।
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आइए, इस पूरे मामले की परत-दर-परत पड़ताल करते हैं और जानते हैं कि आखिर वकीलों के पैनल ने कोर्ट में क्या सबूत रखे और पुलिस की कहानी में कहाँ पेंच फंसा है।
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वह दस्तावेज जिसने बदल दी केस की फिजा (The Age Proof)

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इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बिंदु है—पारस सोम की उम्र। गिरफ्तारी के समय से ही दबी जुबान में यह चर्चा थी कि पारस की उम्र कम है, लेकिन पुलिस ने उसे बालिग मानकर ही कार्रवाई की थी।
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हाईस्कूल की मार्कशीट बनी ब्रह्मास्त्र बुधवार को आरोपी पारस सोम के बचाव में तीन वरिष्ठ अधिवक्ताओं का एक पैनल सामने आया। इस पैनल ने मीडिया और कोर्ट के सामने जो दस्तावेज रखे, वे चौंकाने वाले थे।
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    दस्तावेज: वर्ष 2024 में जारी हुआ हाईस्कूल (10th Class) परीक्षा का अंक पत्र (Marksheet)।
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    जन्म तिथि: मार्कशीट में पारस सोम की जन्म तिथि 11 मई, 2008 दर्ज है।
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    उम्र की गणना: घटना की तारीख तक पारस की उम्र लगभग 17 वर्ष, 7 माह और 28 दिन बैठती है।
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    दूसरा सबूत: इसके अलावा बचाव पक्ष ने वर्ष 2022 का 'जनता आदर्श इंटर कॉलेज, कपसाड़' द्वारा जारी किया गया 9वीं कक्षा का प्रवेश पत्र (Admit Card) भी पेश किया है। इस पर लगा फोटो कॉलेज द्वारा सत्यापित (Attested) है।
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कानून की नजर में, 18 साल से एक दिन भी कम उम्र का व्यक्ति 'किशोर' (Juvenile) माना जाता है। वकीलों का तर्क है कि पारस अभी 18 साल का नहीं हुआ है, इसलिए उसे सामान्य जेल में अपराधियों के साथ नहीं रखा जा सकता और न ही उस पर सामान्य कोर्ट में मुकदमा चलाया जा सकता है।
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वकीलों का 'चक्रव्यूह' और पुलिस की थ्योरी पर सवाल

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सिर्फ उम्र ही नहीं, पारस सोम के वकीलों ने पुलिस द्वारा बनाई गई 'अपहरण' (Kidnapping) की पूरी कहानी पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं। बचाव पक्ष के वकीलों—एडवोकेट बलराम सोम, एडवोकेट संजीव राणा और एडवोकेट विजय शर्मा—ने एक नई थ्योरी पेश की है जो 'प्रेम प्रसंग' (Love Affair) की ओर इशारा करती है।
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वकीलों की तीन बड़ी दलीलें:

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    अपहरण या रजामंदी? वकीलों का कहना है कि पुलिस का दावा है कि पारस ने रूबी को अगवा किया। लेकिन घटनाक्रम कुछ और ही इशारा कर रहा है। वकीलों ने तर्क दिया: “रेलवे स्टेशन जैसी भीड़भाड़ वाली जगह से क्या किसी लड़की का जबरन अपहरण किया जा सकता है? वहां तो सैकड़ों लोग होते हैं, सीसीटीवी कैमरे होते हैं। अगर अपहरण होता, तो शोर मचता।”
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    घायल मां और 'बेपरवाह' बेटी यह इस केस का सबसे भावनात्मक और पेचीदा पहलू है। वकीलों ने तर्क रखा कि जब पारस ने रूबी की मां सुनीता पर बलकटी (धारदार हथियार) से हमला किया, तो मां खून से लथपथ तड़प रही थी। वकीलों का सवाल है: "कोई भी बेटी अपनी मरती हुई मां को छोड़कर किडनैपर के साथ कैसे जा सकती है? अगर वह जबरदस्ती ले जाई जाती, तो वह चीखती-चिल्लाती या भागने की कोशिश करती। लेकिन वह पारस के साथ गई, जो उसकी रजामंदी (Consent) को दर्शाता है।"
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    पुलिस की कहानी में झोल बचाव पक्ष का आरोप है कि पुलिस ने दबाव में आकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। उनका कहना है कि यह मामला 'Onor Killing' या 'Love Affair gone wrong' का हो सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह से एकतरफा अपहरण का रूप दे दिया गया।
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क्या है 'कपसाड़ कांड'? (The Flashback)

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जो पाठक इस मामले से अनजान हैं, उनके लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर कपसाड़ गांव में उस रात हुआ क्या था, जिसने मेरठ पुलिस की रातों की नींद उड़ा दी थी।
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खूनी रात की कहानी मेरठ के सरधना थाना क्षेत्र का कपसाड़ गांव। एक दलित परिवार और गांव का ही एक दबंग युवक पारस सोम। आरोपों के मुताबिक, पारस सोम की नजर गांव की युवती रूबी (काल्पनिक नाम/पहचान सुरक्षित) पर थी। घटना वाली रात पारस सोम युवती के घर पहुंचा।
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जब वह युवती को अपने साथ ले जाने लगा, तो युवती की मां सुनीता ने इसका विरोध किया। मां अपनी बेटी को बचाने के लिए दीवार बनकर खड़ी हो गई। आरोप है कि इसी दौरान पारस ने अपने पास मौजूद धारदार हथियार 'बलकटी' से सुनीता पर ताबड़तोड़ वार कर दिए।
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माँ की मौत, बेटी गायब सुनीता खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़ी और मौके पर ही या अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई। इसके बाद पारस, रूबी को लेकर मौके से फरार हो गया। इस घटना ने गांव में जातीय तनाव (Caste Tension) का रूप ले लिया। वाल्मीकि समाज और दलित संगठनों ने थाने का घेराव किया और पुलिस पर भारी दबाव बनाया।
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10 टीमों का गठन और सहारनपुर कनेक्शन मेरठ पुलिस के लिए यह साख का सवाल बन गया था।
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    एसएसपी ने आरोपी की गिरफ्तारी के लिए 10 विशेष टीमें गठित की थीं।
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    सर्विलांस, एसओजी (SOG) और मुखबिर तंत्र को सक्रिय किया गया।
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    करीब 3 दिन की मशक्कत के बाद, 10 जनवरी की रात पुलिस को लोकेशन मिली।
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    पुलिस ने सहारनपुर (Saharanpur) से आरोपी पारस सोम को गिरफ्तार किया और उसके कब्जे से युवती को भी बरामद (Recover) कर लिया।
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गिरफ्तारी, जेल और अब 'मुलाहिजा बैरक'

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गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने पारस को कोर्ट में पेश किया। पुलिस ने अपनी एफआईआर में पारस पर धारा 302 (हत्या), 364 (अपहरण) और SC/ST एक्ट की गंभीर धाराएं लगाईं। कोर्ट ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में जेल भेज दिया।
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बैरक नंबर 19 का सच फिलहाल पारस मेरठ की चौधरी चरण सिंह जिला कारागार में बंद है। जेल सूत्रों के अनुसार, उसे सामान्य कैदियों के साथ नहीं, बल्कि बैरक नंबर 19 में रखा गया है। जेल की भाषा में इसे 'मुलाहिजा बैरक' (Quarantine/Observation Barrack) कहा जाता है, जहाँ नए आए कैदियों को रखा जाता है ताकि उनकी मेडिकल जांच और व्यवहार पर नजर रखी जा सके। अब अगर कोर्ट उसे नाबालिग घोषित करती है, तो उसे यहाँ से निकालकर 'बाल सुधार गृह' (Observation Home) भेजना पड़ेगा।
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कानूनी पेंच - जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJ Board) का गणित

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अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर पारस नाबालिग साबित होता है, तो केस पर क्या असर पड़ेगा? भारतीय कानून, विशेषकर किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act, 2015) के तहत स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी।
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1. केस का ट्रांसफर: अभी यह केस विशेष एससी/एसटी कोर्ट (SC/ST Court) में चल रहा है। वकीलों ने याचिका दायर की है कि आरोपी 18 साल से कम का है, इसलिए इस कोर्ट को सुनवाई का अधिकार नहीं है। अगर सबूत सही पाए गए, तो फाइल जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को ट्रांसफर कर दी जाएगी।
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2. बालिग की तरह ट्रायल (Heinous Crime Concept): हालांकि, निर्भया कांड के बाद कानून में बदलाव हुआ था।
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    यदि आरोपी की उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच है (पारस की उम्र 17+ बताई जा रही है)।
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    और अपराध जघन्य (Heinous) श्रेणी का है (जैसे हत्या/302)।
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    तो जेजे बोर्ड पहले एक 'प्रारंभिक मूल्यांकन' (Preliminary Assessment) करेगा।
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    इसमें यह देखा जाएगा कि क्या आरोपी में अपराध करने की 'मानसिक और शारीरिक क्षमता' थी? क्या उसे अपने किए के अंजाम का पता था?
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    अगर बोर्ड को लगता है कि उसने बड़ों की तरह सोच-समझकर हत्या की है, तो उसका केस बालिग की तरह (As an Adult) चलाने के लिए सेशन कोर्ट भेजा जा सकता है। लेकिन अगर उसे 'बच्चा' माना गया, तो अधिकतम सजा 3 साल के लिए सुधार गृह में रहना होगी।
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3. बचाव पक्ष की रणनीति: वकीलों का पैनल इसी कानूनी प्रावधान का फायदा उठाना चाहता है। उनका पहला मकसद पारस को 'कड़े कारावास' (Rigorous Imprisonment) और 'फांसी/आजीवन कारावास' की संभावना से बचाना है। सुधार गृह की सजा जेल की सजा से बहुत अलग होती है।
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अब आगे क्या होगा? (Next Steps)

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यह मामला अब पूरी तरह से दस्तावेजी साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्ट पर टिक गया है।
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1. ओसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) की संभावना: अगर अभियोजन पक्ष (पुलिस/सरकारी वकील) मार्कशीट को चुनौती देता है या उसे फर्जी बताता है, तो कोर्ट पारस का 'ओसिफिकेशन टेस्ट' (हड्डी की जांच) कराने का आदेश दे सकती है। यह टेस्ट वैज्ञानिक रूप से उम्र का अनुमान लगाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के अनुसार, अगर मैट्रिकुलेशन (10वीं) का सर्टिफिकेट मौजूद है, तो उसे ही उम्र का प्राथमिक सबूत माना जाता है।
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2. वकीलों की जेल विजिट: पैनल ने घोषणा की है कि वे जल्द ही जेल जाकर पारस से मुलाकात करेंगे और 'वकालतनामा' साइन करवाकर कानूनी लड़ाई को धार देंगे।
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3. पुलिस की चुनौती: मेरठ पुलिस के लिए यह एक झटका हो सकता है। पुलिस को अब कोर्ट में यह साबित करना होगा कि आरोपी चाहे उम्र में कम हो, लेकिन उसका अपराध 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' (Rarest of Rare) की श्रेणी में आता है और उसने एक जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया है।
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न्याय की तराजू पर दो पक्ष

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कपसाड़ कांड अब सिर्फ एक अपराध की खबर नहीं रही, बल्कि यह एक कानूनी युद्धक्षेत्र (Legal Battleground) बन गया है।
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एक तरफ वह पीड़ित परिवार है, जिसने अपनी मां खो दी और जिसकी बेटी के जीवन पर गहरा आघात लगा है। वे आरोपी के लिए सख्त से सख्त सजा—फांसी की मांग कर रहे हैं। दलित समाज इसे अपनी अस्मिता पर हमला मान रहा है।
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दूसरी तरफ आरोपी पक्ष है, जो अब 'कानून की किताब' का सहारा लेकर 'नाबालिग' होने का कवच ओढ़ना चाहता है। वकीलों का तर्क है कि हर आरोपी को बचाव का अधिकार है और अगर वह बच्चा है, तो उसे बच्चे की तरह ट्रीट किया जाना चाहिए।
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आने वाले दिनों में एससी/एसटी कोर्ट का फैसला बेहद अहम होगा। क्या कोर्ट मार्कशीट को स्वीकार करेगा? क्या पारस का केस जेजे बोर्ड जाएगा? या फिर 'जघन्य अपराध' मानते हुए उसे बालिगों वाली अदालत में ही खड़ा रहना पड़ेगा? 'खबरीलाल' की नजर इस केस की हर तारीख और हर दलील पर बनी रहेगी।
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