नई दिल्ली (खबरीलाल विशेष रिपोर्ट):
\r\n\r\nभारत में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और उनके प्रति समाज व सरकारों की लगातार हो रही अनदेखी के बीच देश की सबसे बड़ी अदालत (Supreme Court) से एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। उम्र के आखिरी पड़ाव में अपनों के सताए और समाज के ठुकराए लाखों-करोड़ों बुजुर्गों के अधिकारों (Senior Citizens Rights) के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है।
\r\n\r\nअदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जीवन भर देश और समाज के लिए अपना योगदान देने वाले वरिष्ठ नागरिकों को उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने बुजुर्गों के लिए पेंशन, आश्रय (वृद्धाश्रम), जेरियाट्रिक देखभाल (Geriatric Care) और उन्नत चिकित्सा सुविधाओं से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र और सभी राज्य सरकारों से विस्तृत जवाब मांगा है।
\r\n\r\nसुप्रीम कोर्ट का कड़ा आदेश: 3 हफ्ते में चाहिए पूरी रिपोर्ट
\r\n\r\nसुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस संवेदनशील मामले पर केंद्र और राज्यों के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट के सख्त आदेश के मुताबिक, भारत के अटॉर्नी जनरल (Attorney General) को निर्देश दिया गया है कि वे सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) और स्टैंडिंग काउंसिल को तत्काल प्रभाव से पत्र लिखें।
\r\n\r\nइस पत्र के प्राप्त होने की तारीख से ठीक तीन सप्ताह के भीतर सभी राज्य सरकारों को एक हलफनामा (Status Report) दाखिल करना होगा। इस रिपोर्ट में राज्यों को निम्नलिखित बातों का स्पष्ट ब्यौरा देना होगा:
\r\n\r\n- \r\n
- \r\n राज्य में कुल कितने सरकारी और मान्यता प्राप्त वृद्धाश्रम (Old Age Homes) संचालित हो रहे हैं?\r\n \r\n
- \r\n इन वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों के लिए किस स्तर की बुनियादी और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं?\r\n \r\n
- \r\n राज्य में बुजुर्गों को कितनी मासिक पेंशन (Old Age Pension) दी जा रही है और इसका लाभ कितने लोगों को मिल रहा है?\r\n \r\n
- \r\n बुजुर्गों के लिए अस्पतालों में विशेष जेरियाट्रिक (Geriatric) केयर वार्ड की क्या स्थिति है?\r\n \r\n
7 साल से लंबित है करोड़ों लोगों से जुड़ा यह मामला
\r\n\r\nइस महत्वपूर्ण मामले को देश के पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अश्विनी कुमार ने जनहित याचिका के माध्यम से उठाया है। याचिकाकर्ता डॉ. अश्विनी कुमार स्वयं अदालत में पेश हुए और उन्होंने कोर्ट का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि यह कोई साधारण मामला नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों बेसहारा और जरूरतमंद बुजुर्गों के जीवन और सम्मान से जुड़ा हुआ है।
\r\n\r\nउन्होंने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार को देश भर के वृद्धाश्रमों और चिकित्सा सुविधाओं के संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी थी, लेकिन पिछले छह-सात सालों से इस मामले की ठीक से सुनवाई ही नहीं हो सकी है। साल 2022 के बाद से यह मामला सूचीबद्ध (Listed) ही नहीं हुआ था। डॉ. कुमार ने निराशा जताते हुए कहा कि उन्होंने खुद 2022 के बाद पांच बार इस मामले का अदालत के समक्ष उल्लेख किया, ताकि इसे प्राथमिकता दी जा सके।
\r\n\r\nकेंद्र सरकार के आधे-अधूरे जवाब पर उठे सवाल
\r\n\r\nसुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कोर्ट के बार-बार निर्देश देने के बावजूद सरकारों की तरफ से लापरवाही बरती जा रही है। अगस्त 2023 में केंद्र सरकार ने एक हलफनामा जरूर दाखिल किया था, लेकिन उसमें केवल 15 राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों का ही विवरण शामिल था। पूरे देश का प्रामाणिक डेटा अभी तक सर्वोच्च न्यायालय के पटल पर नहीं रखा गया है।
\r\n\r\nडॉ. अश्विनी कुमार ने कोर्ट से आग्रह किया कि केंद्र को इस संपूर्ण जानकारी को अद्यतन (Update) कर पूर्ण हलफनामा दाखिल करने के लिए दो से तीन सप्ताह का अंतिम अवसर दिया जाना चाहिए।
\r\n\r\nअनुच्छेद 21 और MWP Act के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग
\r\n\r\nइस याचिका का मूल आधार भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 (Article 21) है, जो देश के हर नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने का मौलिक अधिकार देता है। याचिका में मांग की गई है कि:
\r\n\r\n- \r\n
- \r\n माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act - MWP Act) को पूरे देश में सख्ती से और प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।\r\n \r\n
- \r\n हर जिले में पर्याप्त संख्या में वृद्धाश्रम खोले जाएं और वहां गुणवत्तापूर्ण जीवन सुनिश्चित किया जाए।\r\n \r\n
- \r\n जेरियाट्रिक देखभाल (बुढ़ापे में होने वाली बीमारियों का विशेष इलाज) को सभी सरकारी अस्पतालों में अनिवार्य किया जाए।\r\n \r\n
\r\n\r\n
क्या यह मामला हाईकोर्ट को सौंप दिया जाए? (कोर्ट में बहस)
\r\n\r\nसुनवाई के दौरान एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने सुझाव दिया कि चूंकि यह मामला राज्यों से जुड़ा है, इसलिए इसे संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) के पास भेज दिया जाना चाहिए।
\r\n\r\nइस सुझाव पर याचिकाकर्ता डॉ. कुमार ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि यह किसी एक राज्य की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे भारत के बुजुर्गों के मौलिक अधिकारों का राष्ट्रीय मुद्दा है। इसके लिए पूरे देश में एक समान नीति और निर्णय की आवश्यकता है। इसे अलग-अलग हाईकोर्टों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि इससे फैसलों में विरोधाभास पैदा हो सकता है।
\r\n\r\nइस महत्वपूर्ण बहस पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का काम इस मामले में बुनियादी सिद्धांत और गाइडलाइंस (Principles) तय करना होना चाहिए था, जिसके बाद उन सिद्धांतों को जमीनी स्तर पर लागू कराने (Implementation) की जिम्मेदारी हाईकोर्टों पर छोड़ी जा सकती थी। हालांकि, फिलहाल कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सीधे राज्यों से स्टेटस रिपोर्ट मांग ली है।
\r\n\r\nआगे क्या होगा?
\r\n\r\nअब सभी की निगाहें आने वाले तीन हफ्तों पर टिकी हैं। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह बताना होगा कि उन्होंने अपने यहां के वरिष्ठ नागरिकों के लिए क्या जमीनी कदम उठाए हैं। यह जनहित याचिका इस बात का कड़ा संदेश है कि सरकारें बुजुर्गों के अधिकारों को नजरअंदाज कर केवल कागजी घोषणाओं से काम नहीं चला सकतीं। 'खबरीलाल' की टीम इस अहम मामले पर लगातार नजर बनाए रखेगी और अगली सुनवाई के सभी अपडेट्स आप तक पहुंचाती रहेगी।
\r\n\r\nअस्वीकरण (Disclaimer):
\r\n\r\nयह समाचार सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई और उसमें दी गई दलीलों पर आधारित है। खबर का उद्देश्य आम जनता और वरिष्ठ नागरिकों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। न्यायिक प्रक्रिया और कोर्ट के अंतरिम आदेशों में समय-समय पर बदलाव संभव है। किसी भी कानूनी जानकारी के लिए हमेशा न्यायालय के आधिकारिक आदेश (Official Supreme Court Order) की प्रति का ही संदर्भ लें।
🏪 आपके शहर के ऑफर
विज्ञापन · स्थानीय दुकानों की ताज़ा स्कीम · स्वाइप करें →
सभी ऑफर देखें →
Sabse pehle comment karne wale banein.