मुंबई (Social Impact & Local Desk): कहते हैं कि अगर इंसान के हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक कमियां कभी भी उसके सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकतीं। इसी जज्बे और मानवता की एक बेहद भावुक कर देने वाली तस्वीर शनिवार को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में देखने को मिली। यहां एक ही छत के नीचे 104 दिव्यांगजनों (Divyangjan) ने दशकों पुरानी अपनी लाचारी को पीछे छोड़ते हुए, आत्मनिर्भरता और सम्मान के साथ अपने जीवन की एक बिल्कुल नई शुरुआत की।READ ALSO:-थानाभवन में गूंजी दिव्यांगजनों की बुलंद आवाज: अधिकार, सम्मान और हक के लिए महा बैठक में उमड़े कई जिलों के लोग; उठी एकजुट हुंकार
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अवसर था— प्रसिद्ध गैर-सरकारी संगठन 'नारायण सेवा संस्थान' (Narayan Seva Sansthan) द्वारा वडाला स्थित निको हॉल में आयोजित निःशुल्क कृत्रिम अंग एवं कैलीपर्स (Artificial Limbs and Calipers) वितरण शिविर का। यह शिविर केवल कुछ उपकरणों के वितरण का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन दर्जनों चेहरों पर खोई हुई मुस्कान लौटाने का एक महायज्ञ था, जो वर्षों से शारीरिक चुनौतियों और समाज की उपेक्षा का दर्द झेल रहे थे।
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104 लाभार्थियों को मिले 154 अत्याधुनिक अंग

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कार्यक्रम के दौरान मुंबई और आसपास के इलाकों से आए 104 दिव्यांगजनों को कुल 154 अत्याधुनिक कृत्रिम अंग निःशुल्क (Free of Cost) प्रदान किए गए। इनमें हाथ और पैर के वे प्रोस्थेटिक (Prosthetic) समाधान शामिल थे, जो व्यक्ति की शारीरिक बनावट के अनुसार विशेष रूप से डिजाइन किए गए थे।
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जब इन लाभार्थियों को कृत्रिम पैर पहनाए गए और उन्होंने बिना किसी सहारे के अपने पैरों पर खड़े होकर पहला कदम बढ़ाया, तो पूरे निको हॉल का माहौल बेहद भावुक हो गया। कई लाभार्थियों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। किसी ने सालों बाद खुद चलकर अपने परिजनों को गले लगाया, तो किसी ने अपनी व्हीलचेयर और बैसाखी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
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जापानी और जर्मन 3D प्रिंटिंग तकनीक का कमाल

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नारायण सेवा संस्थान द्वारा वितरित किए गए ये कृत्रिम अंग कोई साधारण अंग नहीं थे। विज्ञान और चिकित्सा के बेहतरीन तालमेल का उपयोग करते हुए, इन्हें जापानी और जर्मन तकनीक (Japanese and German Technology) पर आधारित 3D प्रिंटिंग प्रोस्थेटिक समाधानों से तैयार किया गया था।
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इस तकनीक की खासियतें:

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    सटीक फिटिंग (Precision Fit): 3D स्कैनिंग के जरिए लाभार्थी के कटे हुए अंग की सटीक माप ली जाती है, जिससे सॉकेट बिल्कुल फिट बैठता है और दर्द या घाव होने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
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    बेहद हल्का और मजबूत: जर्मन और जापानी मैटेरियल से बने होने के कारण ये अंग वजन में बेहद हल्के होते हैं, जिससे चलने-फिरने में थकान नहीं होती।
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    प्राकृतिक गतिशीलता (Natural Mobility): इनमें लगे अत्याधुनिक जॉइंट्स (Joints) प्राकृतिक घुटनों और टखनों की तरह काम करते हैं, जिससे दिव्यांगजन आसानी से सीढ़ियां चढ़ सकते हैं, दौड़ सकते हैं और अपने दैनिक कार्य बिना किसी बाधा के कर सकते हैं।
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मुख्य अतिथि मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने बढ़ाया हौसला

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इस प्रेरणादायक कार्यक्रम में महाराष्ट्र सरकार के कौशल विकास, रोजगार और उद्यमिता मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा (Mangal Prabhat Lodha) ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से कई लाभार्थियों को कृत्रिम अंग पहनाए और उनका उत्साहवर्धन किया।
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मंत्री लोढ़ा ने इस पुनीत कार्य की सराहना करते हुए कहा, "आज यहां इन लाभार्थियों को बिना किसी बैसाखी के, आत्मनिर्भरता की ओर अपना पहला कदम बढ़ाते देखना हम सभी के लिए एक गहरा प्रेरणादायक क्षण है। नारायण सेवा संस्थान जैसे संगठन सरकार के साथ मिलकर समाज में जो सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं, वह वंदनीय है। जब एक दिव्यांग व्यक्ति खड़ा होता है, तो वह केवल चलता नहीं है, बल्कि वह रोजगार से जुड़कर देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान देने के लिए तैयार होता है।"
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कृत्रिम अंग केवल शरीर का सहारा नहीं, सपनों का आधार हैं: प्रशांत अग्रवाल

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नारायण सेवा संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल (Prashant Agarwal) ने इस मौके पर दिव्यांगों के सशक्तिकरण को लेकर संस्था के विजन को साझा किया। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य केवल उपकरण बांटना नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता को बदलना है।
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प्रशांत अग्रवाल ने भावुक होते हुए कहा, "एक कृत्रिम अंग केवल शरीर के एक हिस्से की कमी को पूरा नहीं करता, बल्कि यह उस व्यक्ति के आत्मविश्वास, उसके खोए हुए सम्मान और उसके नए सपनों का सबसे बड़ा आधार होता है। एक दिव्यांग जब खुद चलकर अपने काम पर जाता है, तो उसके पूरे परिवार का जीवन स्तर सुधर जाता है। हमारा एकमात्र लक्ष्य देश के हर दिव्यांगजन को समाज की मुख्यधारा (Mainstream) में मजबूती और सशक्त रूप से स्थापित करना है, ताकि कोई उन्हें बेचारा न समझे।"
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नारायण सेवा संस्थान: 39 हजार से ज्यादा को दिए अंग, 4.5 लाख की चिकित्सा

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राजस्थान के उदयपुर से शुरू हुआ नारायण सेवा संस्थान आज पूरी दुनिया में मानवता की सेवा का एक बहुत बड़ा वटवृक्ष बन चुका है। मुंबई के इस शिविर में संस्थान के अब तक के शानदार सफर के आंकड़े भी साझा किए गए, जो किसी को भी हैरान कर सकते हैं:
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    कृत्रिम अंगों का वितरण: संस्थान अब तक पूरे भारत में 39,591 से अधिक दिव्यांगजनों को निःशुल्क कृत्रिम अंग (Artificial Limbs) उपलब्ध करा चुका है।
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    चिकित्सा सेवाएं और ऑपरेशन: पोलियो, सेरेब्रल पाल्सी और जन्मजात विकृतियों से जूझ रहे 4.52 लाख (4,52,000) से अधिक लोगों को संस्थान द्वारा निःशुल्क चिकित्सा सेवाएं और जटिल सर्जरी प्रदान की जा चुकी हैं।
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    पुनर्वास (Rehabilitation): चिकित्सा के अलावा, संस्थान दिव्यांगों को सिलाई, मोबाइल रिपेयरिंग और कंप्यूटर जैसे कौशल (Skills) भी सिखाता है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
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सेवा और संवेदना का एक नया अध्याय

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मुंबई के वडाला में आयोजित हुआ यह शिविर महज एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह समाज के लिए एक बड़ा संदेश था। यह इस बात का प्रमाण था कि जब तकनीक (Technology) का इस्तेमाल संवेदना (Empathy) और सेवा भाव के साथ किया जाता है, तो चमत्कार होते हैं। जिन 104 लोगों ने आज अपने नए पैरों के साथ निको हॉल से बाहर कदम रखा, वे अब लाचार नहीं, बल्कि अपनी किस्मत खुद लिखने वाले सशक्त नागरिक बन चुके हैं। मुंबई शहर ने आज सामाजिक सशक्तिकरण (Social Empowerment) और मानवता की सेवा का एक बेहद प्रेरक और सुनहरा अध्याय अपनी आंखों से देखा है। उम्मीद है कि भविष्य में ऐसी और भी संस्थाएं आगे आएंगी और भारत को पूरी तरह से 'सुगम्य और समावेशी' (Accessible and Inclusive) बनाने में अपना योगदान देंगी।
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