बिजनौर (विशेष संवाददाता): जो हाथ दिन-रात शहर की गंदगी साफ करते हैं, चिलचिलाती धूप हो या कड़ाके की ठंड, जो बिना रुके हमारी सड़कों और मोहल्लों को स्वच्छ रखते हैं, आज वही हाथ अपने हक की लड़ाई के लिए तख्तियां उठाने को मजबूर हो गए हैं। बिजनौर जनपद में सफाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सफाई कर्मचारियों का गुस्सा आज फूट पड़ा। अपनी वर्षों पुरानी मांगों की लगातार हो रही अनदेखी से नाराज होकर सैकड़ों सफाई कर्मचारियों ने शहर की सड़कों पर एक विशाल और उग्र विरोध प्रदर्शन किया।READ ALSO:-मेरठ नर्स हत्याकांड: स्कूटी पर लाश ले गए सूफियान और साजिदा, खुद परिजनों ने खोजा CCTV, एप्रन वाली महिला कौन?
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इंदिरा बाल भवन से शुरू हुआ यह जनसैलाब नारेबाजी करता हुआ बिजनौर कलेक्ट्रेट पहुंचा, जहाँ उन्होंने प्रदेश सरकार की नीतियों और विशेष रूप से 'ठेका प्रथा' (Contract System) के खिलाफ जमकर हुंकार भरी।
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इंदिरा बाल भवन से कलेक्ट्रेट तक का मार्च: सड़कों पर उतरा आक्रोश
\r\n\r\nसोमवार की सुबह बिजनौर का इंदिरा बाल भवन परिसर गहमागहमी का केंद्र बन गया। जिले भर से आए सैकड़ों महिला और पुरुष सफाई कर्मचारी यहाँ एकत्रित हुए। हाथों में लाल और काले झंडे, अपनी मांगों से लिखी तख्तियां और बैनर लिए इन कर्मचारियों के चेहरों पर सालों का असंतोष साफ झलक रहा था।
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n@Shakeel57767846 बिजनौर में सफाई कर्मचारियों ने ठेका प्रथा खत्म करने, स्थायी नौकरी और पुरानी पेंशन की मांग को लेकर इंदिरा बाल भवन से कलेक्ट्रेट तक विशाल प्रदर्शन किया। डीएम को ज्ञापन सौंपकर सरकार को दी बड़े आंदोलन की चेतावनी। pic.twitter.com/QTzPSgzPCv
\r\n— MK Vashisth (@vadhisth) May 25, 2026
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जैसे ही यह विशाल जुलूस इंदिरा बाल भवन से कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ा, पूरे शहर का ध्यान इनकी ओर खिंच गया। 'ठेका प्रथा बंद करो', 'हमारी मांगे पूरी करो', 'सफाई कर्मचारियों का शोषण बंद करो' जैसे गगनभेदी नारों से बिजनौर की सड़कें गूंज उठीं। मार्च के दौरान शहर की यातायात व्यवस्था भी कुछ देर के लिए प्रभावित रही, लेकिन कर्मचारियों का अनुशासन ऐसा था कि आम जनता को कोई विशेष परेशानी नहीं हुई।
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कलेक्ट्रेट पहुंचकर इस शांतिपूर्ण मार्च ने एक उग्र प्रदर्शन का रूप ले लिया। कलेक्ट्रेट के गेट पर घंटों तक सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की गई। कर्मचारियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे अब झूठे आश्वासनों से मानने वाले नहीं हैं।
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सफाई कर्मचारियों की प्रमुख मांगें: आखिर क्यों आक्रोशित हैं शहर के रक्षक?
\r\n\r\nप्रदर्शन के दौरान सफाई कर्मचारी संघ के नेताओं ने मंच से अपनी पीड़ा और मांगों को विस्तार से रखा। उनकी मुख्य मांगें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ी हैं:
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1. ठेका प्रथा (आउटसोर्सिंग) को तत्काल समाप्त किया जाए: सबसे बड़ा विरोध ठेका प्रथा को लेकर है। कर्मचारियों का आरोप है कि ठेकेदार उनका जमकर आर्थिक और मानसिक शोषण करते हैं। ठेकेदारी व्यवस्था में कर्मचारियों को न तो न्यूनतम वेतन मिलता है और न ही समय पर वेतन दिया जाता है। ठेकेदार अपनी मनमर्जी से उन्हें काम से निकाल देते हैं। कर्मचारियों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि बीच से ठेकेदारों को हटाकर सरकार सीधे कर्मचारियों को अपने अधीन करे।
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2. वर्षों से कार्यरत संविदा कर्मियों को स्थायी (Permanent) किया जाए: सफाई कर्मचारियों का कहना है कि वे पिछले 10-15 सालों से संविदा या दैनिक वेतन भोगी के रूप में काम कर रहे हैं। इतने साल सेवा देने के बावजूद उनकी नौकरी पर हमेशा तलवार लटकी रहती है। उन्होंने मांग की है कि एक निश्चित समय सीमा से काम कर रहे सभी अस्थायी कर्मचारियों को तुरंत प्रभाव से स्थायी (Regularize) किया जाए, ताकि उनके परिवारों को एक सुरक्षित भविष्य मिल सके।
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3. पुरानी पेंशन योजना और अन्य भत्ते: बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए सफाई कर्मचारियों ने पेंशन लागू करने की जोरदार वकालत की। उनका तर्क है कि एक सफाई कर्मचारी अपना पूरा जीवन गंदगी और बीमारियों के बीच गुजारता है। रिटायरमेंट के बाद उसके पास इलाज तक के पैसे नहीं होते। इसलिए, उन्हें सम्मानजनक पेंशन, पीएफ (PF), ईएसआई (ESI) और स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए।
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शोषण की दास्तां: कोरोना के 'योद्धा' आज बन गए हैं 'लाचार'
\r\n\r\nप्रदर्शन के दौरान कई भावुक दृश्य भी देखने को मिले। कुछ बुजुर्ग सफाई कर्मचारियों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा,
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\r\n\r\n\r\n"जब कोरोना काल में सब लोग अपने घरों में बंद थे, तब हम अपनी जान हथेली पर रखकर शहर को सैनिटाइज कर रहे थे। उस समय सरकार ने हम पर फूल बरसाए और हमें 'कोरोना वारियर्स' का नाम दिया। लेकिन आज जब हम अपने हकों की बात कर रहे हैं, तो हमारी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। फूल बरसाने वाली सरकार आज हमारे पेट पर लात मार रही है।"\r\n
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महिलाओं ने बताया कि ठेका प्रथा के कारण उन्हें मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) जैसी जरूरी सुविधाएं तक नहीं मिलती हैं। अगर कोई कर्मचारी बीमार पड़ जाए तो उसकी उस दिन की दिहाड़ी काट ली जाती है। यह एक प्रकार की आधुनिक बंधुआ मजदूरी है, जिसे लोकतंत्र में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
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जिलाधिकारी को सौंपा मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन
\r\n\r\nकलेक्ट्रेट परिसर में काफी देर तक चले धरने और प्रदर्शन के बाद, प्रशासन हरकत में आया। सफाई कर्मचारी यूनियन के एक प्रतिनिधिमंडल ने बिजनौर के जिलाधिकारी (DM) से उनके कार्यालय में जाकर मुलाकात की और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।
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ज्ञापन में सभी मांगों को बिंदुवार तरीके से लिखा गया है। जिलाधिकारी ने कर्मचारियों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी मांगों और भावनाओं को एक आधिकारिक रिपोर्ट के माध्यम से जल्द ही शासन तक पहुँचा दिया जाएगा। प्रशासन ने कर्मचारियों से शहर की सफाई व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने की अपील भी की।
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आगे क्या? बड़े आंदोलन और हड़ताल की चेतावनी
\r\n\r\nज्ञापन सौंपने के बाद यूनियन के नेताओं ने मीडिया से बात करते हुए सरकार को खुला अल्टीमेटम दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शन केवल एक 'ट्रेलर' था। यदि प्रदेश सरकार ने अगले कुछ हफ्तों के भीतर उनकी मांगों (विशेषकर ठेका प्रथा खत्म करने और स्थायीकरण) पर कोई सकारात्मक शासनादेश (Government Order) जारी नहीं किया, तो मजबूर होकर पूरे बिजनौर जिले के सफाई कर्मचारी 'काम बंद हड़ताल' (Strike) पर चले जाएंगे।
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नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर हड़ताल हुई, तो शहर में चारों तरफ कूड़े के ढेर लग जाएंगे और महामारी फैलने का खतरा पैदा हो जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार की होगी।
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बिजनौर में हुआ यह प्रदर्शन कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा के खिलाफ सुलग रही आग का एक हिस्सा है। स्वच्छ भारत अभियान का सपना तब तक पूरी तरह साकार नहीं हो सकता, जब तक इस अभियान को धरातल पर उतारने वाले इन असली नायकों (सफाई कर्मचारियों) को उनका वाजिब हक, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल जाती। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन कर्मचारियों के अल्टीमेटम पर क्या कदम उठाती है।
Sabse pehle comment karne wale banein.