क्या आपके घर का बिजली लोड भी बिना बताए बढ़ गया है? उत्तर प्रदेश के लाखों परिवारों पर बढ़ा फिक्स्ड चार्ज और ऊर्जा शुल्क का भारी आर्थिक बोझ; उपभोक्ता परिषद ने खोला मोर्चा।
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​लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के साथ एक ऐसा 'साइलेंट स्कैम' (Silent Scam) हुआ है, जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) ने बिना किसी पूर्व सूचना, बिना किसी चेतावनी और बिना किसी आधिकारिक नोटिस के राज्य के लगभग 46.79 लाख (करीब 47 लाख) उपभोक्ताओं का स्वीकृत विद्युत भार (Sanctioned Load) मनमाने ढंग से बढ़ा दिया है। इस प्रशासनिक तानाशाही का खामियाजा उन गरीब परिवारों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें सरकार की ओर से 'लाइफलाइन उपभोक्ता' के रूप में रियायती दर पर बिजली मिलती थी। अब यह सब्सिडी इन उपभोक्ताओं के हाथों से फिसल गई है।
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​सब्सिडी के दायरे से बाहर: गरीबों पर 'डबल मार'

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​उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस कार्रवाई को पूरी तरह से 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ लोड बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह गरीब उपभोक्ताओं के अधिकारों पर डाका डालने जैसा है।
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​परिषद के आंकड़ों के मुताबिक, जिन 47 लाख उपभोक्ताओं का लोड 1 kW से बढ़ाकर 2 kW किया गया है, उनमें से लगभग 25% उपभोक्ता वे गरीब परिवार हैं जो सरकार की सब्सिडी योजना का लाभ उठा रहे थे।
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    ​गरीबी पर प्रहार: जैसे ही सिस्टम में लोड 1 kW से 2 kW हुआ, ये उपभोक्ता सरकारी नियमों की तकनीकी खामियों के चलते 'सब्सिडी' के दायरे से बाहर हो गए।
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    ​आर्थिक क्षति: जो गरीब उपभोक्ता पहले बिजली बिल का भुगतान अपनी सीमित आय में कर पा रहे थे, अब उन पर प्रतिमाह भारी-भरकम बोझ बढ़ गया है।
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आपकी जेब पर कितना असर? (आंकड़ों का खेल)
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​उपभोक्ता परिषद ने इस मनमानी वृद्धि के बाद होने वाले आर्थिक नुकसान का विस्तृत विवरण दिया है:
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​1. ग्रामीण गरीब उपभोक्ताओं का हाल

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​जो ग्रामीण उपभोक्ता पहले 1 किलोवाट श्रेणी में थे, वे 50 रुपये फिक्स्ड चार्ज के साथ लगभग 300 रुपये का बिल भरते थे। अब 2 किलोवाट होने पर:
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    ​फिक्स्ड चार्ज: 50 रुपये से बढ़कर 180 रुपये हो गया।
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    ​अतिरिक्त भार: ऊर्जा शुल्क (Energy Charges) में वृद्धि और फिक्स्ड चार्ज के कारण औसतन 165 रुपये प्रतिमाह का अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
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​2. शहरी गरीब उपभोक्ताओं का हाल

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​शहरी इलाकों के गरीब उपभोक्ताओं के लिए स्थिति और भी भयावह है। यहाँ फिक्स्ड चार्ज के साथ-साथ ऊर्जा शुल्क की दरें भी अधिक हैं। परिषद के अनुसार:
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    ​लोड बढ़ने से फिक्स्ड चार्ज और ऊर्जा शुल्क दोनों में हुई वृद्धि के कारण अब इन परिवारों पर 435 रुपये प्रतिमाह का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
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कल्पना कीजिए, एक ऐसे परिवार के लिए जिसे मुश्किल से अपनी रोजी-रोटी चलानी है, उस पर साल में 5,000 रुपये से अधिक का फालतू बोझ डालना कितना बड़ा अन्याय है!
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​'प्राकृतिक न्याय' का मज़ाक और नियामकीय नियमों की अनदेखी

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​विद्युत नियामक आयोग के टैरिफ आदेश में साफ-साफ लिखा है कि यदि किसी उपभोक्ता का लोड लगातार अधिक पाया जाता है, तो उसे पूर्व सूचना (Prior Notice) देना अनिवार्य है। नियम कहता है:
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    ​3 माह की निगरानी: यदि तीन महीने तक लोड ज्यादा पाया गया, तो विभाग को उसे सूचित करना चाहिए।
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    ​सुनवाई का मौका: उपभोक्ता को अपना पक्ष रखने का अधिकार है।
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    ​अनिवार्य सूचना: बिना उपभोक्ता की सहमति या बिना किसी आधिकारिक नोटिस के लोड बढ़ाना टैरिफ आदेश की भावना के खिलाफ है।
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UPPCL ने इन नियमों को ताक पर रखकर यह कार्रवाई की है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मनमानी का शिकार होने वाले 47 लाख उपभोक्ताओं में 50% उपभोक्ता स्मार्ट मीटर वाले हैं। इसका मतलब यह है कि स्मार्ट मीटर को उपभोक्ता की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि उन पर अपनी मनमानी थोपने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
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उपभोक्ता परिषद की सरकार से दो-टूक मांगें

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​विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने उत्तर प्रदेश सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए चार प्रमुख बिंदु रखे हैं:
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    ​लोड की समीक्षा: बिना सूचना बढ़ाए गए सभी उपभोक्ताओं के लोड की तत्काल समीक्षा की जाए और उन्हें पुरानी श्रेणी में वापस लाया जाए।
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    ​सब्सिडी बहाली: जिन गरीबों की सब्सिडी छीनी गई है, उन्हें बिना किसी शर्त के सब्सिडी का लाभ दोबारा दिया जाए।
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    ​सुनवाई का अवसर: जिन उपभोक्ताओं का लोड बढ़ाना आवश्यक है, उन्हें पहले नोटिस दिया जाए और उन्हें अपना पक्ष रखने का समय मिले।
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    ​जवाबदेही तय हो: भविष्य में किसी भी टैरिफ बदलाव या लोड वृद्धि के मामले में नियामक आयोग के नियमों का पूरी तरह से पालन सुनिश्चित किया जाए।
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क्या यह 'डिजिटल लूट' है?

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​उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ बढ़ती महंगाई, तो दूसरी तरफ बिजली विभाग की यह मनमानी। यदि यह मामला जल्द नहीं सुलझाया गया, तो राज्य के लाखों गरीब परिवार अँधेरे में रहने को मजबूर हो जाएंगे, क्योंकि वे बढ़ा हुआ बिल भरने में सक्षम नहीं हैं।
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​यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि तकनीक (स्मार्ट मीटर) का उपयोग नागरिकों के हित में हो, न कि उनकी जेब काटने के लिए। क्या उत्तर प्रदेश सरकार इस 47 लाख परिवारों के 'आर्थिक शोषण' पर अपनी चुप्पी तोड़ेगी? यह आने वाला समय बताएगा।
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​उपभोक्ताओं के लिए सलाह: यदि आपके साथ भी ऐसा हुआ है, तो चुप न बैठें। अपने क्षेत्र के सब-स्टेशन पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज करें और इस अन्याय के खिलाफ उपभोक्ता परिषद के माध्यम से अपनी आवाज उठाएं। याद रखें, आपका बिजली लोड आपकी सहमति के बिना बदलना एक कानूनी अपराध है।
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