उत्तर प्रदेश में इस समय मौसम का एक बेहद ही अजीबोगरीब और विरोधाभासी रूप देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां भारी बारिश और बैराजों से छोड़े गए पानी ने नदियों को उफान पर ला दिया है, वहीं दूसरी तरफ मौसम विभाग के आंकड़े बता रहे हैं कि प्रदेश के 80 प्रतिशत हिस्से से बारिश वाले बादल ही गायब हो गए हैं। पहाड़ी इलाकों में हो रही लगातार बारिश के कारण उत्तर प्रदेश की प्रमुख नदियां खतरे के निशान को छूने लगी हैं। कहीं जलभराव ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है, तो कहीं कटान के डर से लोग अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। आइए, विस्तार से समझते हैं पश्चिमी और पूर्वी यूपी के मौसम का पूरा हाल और मौसम विभाग (IMD) की ताजा भविष्यवाणियां।Read also:-FIFA World Cup 2026: स्पेन ने रचा इतिहास! फ्रांस को 2-0 से रौंदकर 16 साल बाद वर्ल्ड कप फाइनल में की धमाकेदार एंट्री
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पूर्वी और मध्य यूपी (East & Central UP) का हाल: बारिश, जलभराव और नदियों का कटान

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पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में मानसूनी गतिविधियों का मिलाजुला असर देखने को मिल रहा है। कहीं मूसलाधार बारिश ने शहरों की रफ्तार रोक दी है, तो कहीं नदियों के कटान ने खौफ पैदा कर दिया है।
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    अयोध्या में रामपथ और भक्ति पथ पर जलभराव: रामनगरी अयोध्या में मंगलवार तड़के तेज आंधी के साथ मूसलाधार बारिश हुई। बारिश का आलम यह था कि राम मंदिर जाने वाले प्रमुख 'भक्ति पथ' पर एक फीट तक पानी भर गया, जिससे श्रद्धालुओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
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    लखनऊ और देवरिया में झमाझम: राजधानी लखनऊ में देर शाम अचानक मौसम ने करवट ली और तेज बारिश के बाद रातभर रुक-रुककर फुहारें पड़ती रहीं। शहर के कई निचले इलाकों में पानी भर गया, जिससे नगर निगम के दावों की पोल खुल गई। वहीं, देवरिया में भी रात से ही रिमझिम बारिश का सिलसिला जारी है, जिससे मौसम खुशनुमा हो गया है। आगरा, संभल और हाथरस में भी कहीं तेज तो कहीं धीमी बारिश दर्ज की गई है।
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    प्रयागराज, कानपुर और वाराणसी में उफनती नदियां: गंगा और यमुना का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा है। प्रयागराज में पानी घाटों पर बनी दुकानों तक पहुंच गया है, जिससे दुकानदारों में हड़कंप है। कानपुर में गंगा का पानी आनंदेश्वर मंदिर घाट की सीढ़ियों तक पहुंच गया है, और वाराणसी के घाटों पर भी पानी का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है।
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    बलिया में हाहाकार, 150 परिवारों का पलायन: सबसे भयावह स्थिति बलिया में देखने को मिल रही है। यहां सरयू और घाघरा नदियों ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है। नदियों के किनारों पर तेजी से कटान हो रहा है। हालात इतने गंभीर हैं कि बांसडीह क्षेत्र के करीब 150 परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट होना पड़ा है। प्रशासन राहत कार्य में जुटा है, लेकिन लोगों की आंखों में खौफ साफ देखा जा सकता है।
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पश्चिमी यूपी (West UP) का हाल: बैराजों से छोड़े गए पानी ने बढ़ाई धड़कनें

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आसमान से ज्यादा पानी नदियों के रास्ते आ रहा है। हरियाणा के बैराजों से पानी छोड़े जाने के कारण ब्रज क्षेत्र और आसपास के इलाकों में बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है।
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    मथुरा-वृंदावन में यमुना का रौद्र रूप: पहाड़ी इलाकों की बारिश का सीधा असर मथुरा और वृंदावन में दिख रहा है। घाटों से दूर बहने वाली यमुना अब सीधे घाटों की सीढ़ियों से टकरा रही है। वृंदावन के प्रसिद्ध केशीघाट की 14 में से 7 सीढ़ियां पूरी तरह पानी में डूब चुकी हैं। इसके चलते केशीघाट पर चल रहे रिवर फ्रंट का निर्माण कार्य तुरंत प्रभाव से रोक दिया गया है।
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    चेतावनी निशान के करीब जलस्तर: पिछले 24 घंटों में ही यमुना का जलस्तर करीब दो फीट बढ़ गया है। इसका मुख्य कारण सोमवार को ओखला बैराज से 20 हजार क्यूसेक और हथिनी कुंड बैराज से 7 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जाना है। मथुरा में यमुना के लिए खतरे का निशान 166 मीटर और चेतावनी का निशान 165.20 मीटर तय है। फिलहाल नदी चेतावनी के निशान से महज 1.30 मीटर नीचे बह रही है। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
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    बरेली और बिजनौर में अलर्ट: बरेली में रामगंगा नदी और बिजनौर में मलान नदी में भी पानी का स्तर खतरे के निशान के बेहद करीब पहुंच गया है। प्रशासन ने तटीय इलाकों में अलर्ट जारी कर दिया है।
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मौसम का विरोधाभास: 80% हिस्से से बारिश वाले बादल क्यों हुए गायब?

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एक तरफ जहां यूपी की नदियां उफान पर हैं, वहीं मौसम विभाग (IMD) के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। पाकिस्तान की तरफ से आ रही सूखी और गर्म हवाओं ने प्रदेश के मौसम का मिजाज बिगाड़ दिया है। इन सूखी हवाओं के चलते यूपी के करीब 80% हिस्से से मानसूनी बादल पूरी तरह गायब हो गए हैं। यही कारण है कि आधे से ज्यादा प्रदेश में उमस और सूखापन बना हुआ है।
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बुधवार को 35 शहरों में बारिश दर्ज की गई, लेकिन यह उम्मीद से बहुत कम थी। जहां औसतन 10.6 मिमी बारिश का अनुमान था, वहां सिर्फ 2.4 मिमी ही पानी बरसा। 1 जून से 15 जुलाई तक के आंकड़ों पर गौर करें तो अब तक केवल 165.4 मिमी बारिश हुई है, जो कि सामान्य औसत से पूरे 25% कम है।
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आखिर क्या होता है 'मानसून ब्रेक' (Monsoon Break)?

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मौसम विज्ञान की भाषा में इस स्थिति को 'मानसून ब्रेक' कहा जाता है। जब लगातार 5 से 10 दिनों तक देश के किसी बड़े हिस्से में बारिश सामान्य से काफी कम हो जाती है, तो इसे मानसून ब्रेक माना जाता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मानसून खत्म हो गया है; बल्कि यह कुछ समय के लिए धीमा पड़ जाता है।
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इस दौरान उत्तर-पश्चिम, मध्य और दक्षिण भारत के इलाकों में बारिश नाममात्र की होती है, जबकि इसके विपरीत पूर्वोत्तर राज्यों, बिहार, पश्चिम बंगाल और हिमालय की तलहटी (तराई क्षेत्रों) में भारी बारिश का दौर जारी रहता है। यही कारण है कि पहाड़ों पर पानी बरस रहा है और नदियां उफान पर हैं, जबकि यूपी के मैदानी इलाके सूखे की मार झेल रहे हैं।
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आगे कैसा रहेगा मौसम? 17 जुलाई के बाद जगेगी उम्मीद

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लखनऊ मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह के मुताबिक, अगले 3-4 दिनों तक बारिश में यह ठहराव इसी तरह बना रहेगा। कुछ चुनिंदा स्थानों पर छिटपुट या हल्की से मध्यम बारिश जरूर हो सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर राहत की उम्मीद नहीं है। हालांकि, 17 जुलाई के बाद मौसम में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। हवाओं का रुख एक बार फिर से 'पुरवा' (पूर्वी हवाएं) होने की प्रबल संभावना है। पुरवा हवाओं के चलने से नमी वापस लौटेगी और मानसूनी गतिविधियां एक बार फिर से जोर पकड़ेंगी। आज (15 जुलाई) प्रदेश के 33 शहरों में बारिश का अलर्ट जारी किया गया है।
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अल नीनो (El Nino) का साया: इस साल यूपी में 8% कम बारिश का अनुमान

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इस साल मानसून के कमजोर रहने के पीछे एक बड़ा वैश्विक मौसमी कारण भी है। मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक डॉ. एम महापात्रा ने स्पष्ट किया है कि इस वर्ष प्रशांत महासागर में 'ला नीना' (La Nina - जो अच्छी बारिश लाता है) जैसी स्थितियां खत्म हो गई हैं। अब धीरे-धीरे 'अल नीनो' (El Nino - जो सूखे का कारण बनता है) की ओर बढ़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।
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इसके साथ ही, इस साल जनवरी से मार्च के बीच उत्तरी गोलार्ध में बर्फबारी भी कम हुई है, जिसका सीधा असर भारतीय मानसून पर पड़ता है।
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पिछले साल से तुलना: सीनियर साइंटिस्ट अतुल सिंह बताते हैं कि आमतौर पर उत्तर प्रदेश में जून से सितंबर (मानसून सीजन) के बीच 820 से 840 मिलीमीटर बारिश होती है। लेकिन अल नीनो के प्रभाव के कारण इस साल पूरे देश और यूपी में सामान्य से 8% कम बारिश होने का अनुमान है। यानी इस वर्ष केवल 754 से 773 मिलीमीटर तक ही पानी बरसने की संभावना है।
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अगर हम पिछले साल (2025) की बात करें, तो यूपी में मानसून बेहद मेहरबान था। पिछले साल इसी सीजन (जून-सितंबर) में औसतन 870 से 900 मिमी बारिश दर्ज की गई थी, जो सामान्य औसत से 10 से 15 प्रतिशत अधिक थी।
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उत्तर प्रदेश इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ पहाड़ी बारिश से उफनाई नदियां तबाही मचाने को आतुर हैं, तो दूसरी तरफ मानसूनी बादलों की बेरुखी किसानों और आम जनता को उमस भरी गर्मी से बेहाल कर रही है। 17 जुलाई के बाद हवाओं का रुख बदलने से कुछ राहत की उम्मीद जरूर है, लेकिन नदी किनारे रहने वाले लोगों को अगले कुछ दिनों तक विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
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