लगातार महंगी होती बिजली और हर महीने आने वाले भारी-भरकम बिलों से निजात पाने के लिए आजकल आम जनता तेजी से सोलर ऊर्जा (Solar Energy) की तरफ रुख कर रही है। सरकार भी सब्सिडी देकर लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित कर रही है। जिन लोगों ने अपनी छतों पर सोलर पैनल (Solar Panel) लगवा लिए हैं, उनके लिए बिजली का बिल तो कम हो गया है, लेकिन अब उनके सामने एक बिल्कुल नए तरह का सिरदर्द पैदा हो गया है।READ ALSO:-मेरठ: भीषण गर्मी में बेगमपुल व्यापार संघ बना मसीहा, 3 घंटे तक चला मीठे जल और दूध का महा-वितरण, उमड़ा पूरा शहर
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उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम (Purvanchal Vidyut Vitran Nigam) के अंतर्गत आने वाले इलाकों में सोलर उपभोक्ताओं की एक बड़ी शिकायत सामने आई है। उपभोक्ताओं का कहना है कि उनके सोलर पैनल से पैदा होने वाली अतिरिक्त (सरप्लस) बिजली को बिजली विभाग द्वारा ले तो लिया जा रहा है, लेकिन इसका कोई मैसेज (SMS) या व्हाट्सएप नोटिफिकेशन उन्हें नहीं भेजा जाता। बिजली के सामान्य बिल का मैसेज तो फोन पर तुरंत आ जाता है, लेकिन आपकी अपनी छत पर पैदा हुई बिजली का हिसाब-किताब पूरी तरह से अंधेरे में रखा जा रहा है।
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क्या है ऑन-ग्रिड सिस्टम और सरप्लस बिजली का पूरा गणित?

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इस पूरे मामले को समझने के लिए पहले सोलर सिस्टम के काम करने के तरीके को समझना जरूरी है। आजकल ज्यादातर घरों में 'ऑन-ग्रिड' (On-Grid) सोलर सिस्टम लगाए जा रहे हैं। इसका मतलब है कि आपके घर का सोलर सिस्टम सीधे बिजली विभाग के खंभे (ग्रिड) से जुड़ा होता है। दिन के समय जब तेज धूप होती है, तो सोलर पैनल आपके घर की जरूरत से कहीं ज्यादा बिजली पैदा करते हैं। इस अतिरिक्त (सरप्लस) बिजली को नेट मीटरिंग (Net Metering) के जरिए वापस बिजली विभाग के ग्रिड में भेज दिया जाता है। रात के समय, जब सोलर पैनल काम नहीं करते, तब आप ग्रिड से वापस बिजली लेते हैं। महीने के अंत में, आपने जितनी बिजली ग्रिड को दी और जितनी ग्रिड से ली, उसका हिसाब (एडजस्टमेंट) करके फाइनल बिल बनाया जाता है।
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विवाद इसी एडजस्टमेंट को लेकर है। ग्रिड को दी गई बिजली और उसके बदले मिलने वाले पैसे या यूनिट्स का कोई भी पारदर्शी अपडेट उपभोक्ताओं के मोबाइल पर नहीं आ रहा है।
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2 रुपये में खरीद, 5.50 रुपये में बिक्री: उपभोक्ताओं में भारी आक्रोश

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मैसेज न आने के अलावा एक और बड़ा मुद्दा रेट (Tariff) का है। नियमों के अनुसार, हर साल वित्तीय वर्ष के अंत में (मार्च के महीने में) अगर किसी उपभोक्ता के अकाउंट में सरप्लस (बची हुई अतिरिक्त) यूनिट्स होती हैं, तो बिजली विभाग उसे खरीद लेता है। लेकिन, हैरानी की बात यह है कि विभाग उपभोक्ताओं से यह सरप्लस बिजली मात्र 2 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीद रहा है। वहीं, जब विभाग आम घरेलू उपभोक्ताओं को बिजली सप्लाई करता है, तो उनसे औसतन 5.50 रुपये से 7.00 रुपये प्रति यूनिट तक वसूला जाता है। उपभोक्ताओं का साफ कहना है कि जब वे लाखों रुपये का लोन लेकर और अपनी छत की जगह घेरकर बिजली का उत्पादन कर रहे हैं, तो विभाग उसे कौड़ियों के दाम क्यों खरीद रहा है?
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बिजली विभाग की सफाई: 'सब कुछ नियमों के तहत, लेकिन मैसेज का सिस्टम नहीं'

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इस पूरे विवाद पर पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के मुख्य अभियंता (Chief Engineer) राकेश कुमार ने विभाग का पक्ष रखा है। उनके बयान के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
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    नियमों का पालन: विभाग का कहना है कि सरप्लस यूनिट को मर्ज करने और उसके बदले भुगतान करने की पूरी प्रक्रिया तय नियमों के तहत ही की जा रही है। इसमें कोई हेराफेरी नहीं है।
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    टेक्नोलॉजी का अभाव: मुख्य अभियंता ने यह बात स्वीकार की है कि निगम के अधिकृत पोर्टल या सिस्टम में ऐसा कोई फीचर मौजूद नहीं है, जिससे सरप्लस बिजली के एडजस्टमेंट का मैसेज (SMS) सीधा उपभोक्ता के मोबाइल पर भेजा जा सके।
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    बिल में दी जाती है जानकारी: विभाग का तर्क है कि भले ही मैसेज न जाता हो, लेकिन जब उपभोक्ता अपना पूरा बिल जनरेट करवाता है या पीडीएफ डाउनलोड करता है, तो बिल के निचले हिस्से में सरप्लस यूनिट और उसके पैसे क्रेडिट होने की पूरी जानकारी छपी होती है।
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    बढ़ता दायरा: अकेले उनके जिले में 7 लाख से अधिक बिजली उपभोक्ता हैं, जिनमें से 50,000 से ज्यादा लोगों ने अब तक सोलर कनेक्शन ले लिया है। ऐसे में सिस्टम को अपग्रेड करने में समय लग रहा है।
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राज्य उपभोक्ता परिषद ने खोला मोर्चा, नियामक आयोग जाने की तैयारी

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डिजिटल इंडिया के इस दौर में जब छोटी से छोटी बात का मैसेज फोन पर आ जाता है, तब बिजली विभाग का यह तर्क कि 'हमारे पास मैसेज भेजने का सिस्टम नहीं है', किसी के गले नहीं उतर रहा है।
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राज्य उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने इसे उपभोक्ता अधिकारों का खुला उल्लंघन माना है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि:
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"उपभोक्ताओं से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी—चाहे वह बिल कटने की हो, पेमेंट जमा होने की हो, या सरप्लस यूनिट एडजस्टमेंट की हो—मैसेज या व्हाट्सएप के जरिए देना विभाग की अनिवार्य जिम्मेदारी है। अगर विभाग ऐसा नहीं कर रहा है, तो वह पारदर्शिता के नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है।"
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अवधेश वर्मा ने ऐलान किया है कि उपभोक्ता परिषद इस पूरे प्रकरण को नियामक आयोग (Regulatory Commission) के सामने मजबूती से रखेगा। उनकी मांग है कि विभाग जल्द से जल्द ऐसी तकनीक विकसित करे, जिससे उपभोक्ता को हर महीने यह पता चल सके कि उसने कितनी यूनिट बिजली बनाई, कितनी खुद इस्तेमाल की, और कितनी विभाग को बेची।
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जमीनी हकीकत: ठगा सा महसूस कर रहे हैं उपभोक्ता

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कागजी दावों और बयानों से इतर, जमीनी स्तर पर उपभोक्ताओं की परेशानी बिल्कुल असली है। वाराणसी और आसपास के इलाकों से कई मामले सामने आए हैं:
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मामला 1: प्रवीण कुमार, शिव नगर कॉलोनी (सारनाथ) प्रवीण कुमार ने अपने घर पर 4 किलोवाट (4 KW) का सोलर पैनल लगवाया था। उनका कहना है कि मार्च महीने तक उनके बिजली अकाउंट में 1200 यूनिट सरप्लस (बचत) दिख रही थी। उन्हें लगा कि आगे गर्मियों में जब एसी चलेगा, तो यह यूनिट्स उनके काम आएंगी। लेकिन जब उन्होंने अप्रैल का बिल डाउनलोड किया, तो पता चला कि वह सारी सरप्लस यूनिट्स गायब हो गई हैं और उनके बिल में मात्र 2400 रुपये (टैक्स और चार्ज काटकर 2160 रुपये) क्रेडिट कर दिए गए हैं। यह सब बिना किसी पूर्व सूचना या मैसेज के हुआ, जिससे प्रवीण खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
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मामला 2: दिनेश पाठक, महमूरगंज दिनेश पाठक ने अपने घर पर 3 किलोवाट (3 KW) का सोलर यूनिट लगाया है। जब उन्होंने अपने अप्रैल महीने का बिल ऑनलाइन डाउनलोड किया, तो उसमें मार्च तक की करीब 900 सरप्लस यूनिट को विभाग द्वारा मर्ज (समायोजित) कर लिया गया था। दिनेश का कहना है कि, "अगर मैं खुद इंटरनेट पर जाकर अपना बिल डाउनलोड न करता, तो मुझे यह भनक भी नहीं लगती कि मेरी 900 यूनिट्स का क्या हुआ। जब आम बिल का मैसेज आ सकता है, तो मेरी अपनी बनाई गई बिजली का मैसेज क्यों नहीं आ सकता? यह जानकारी हमें हर महीने मिलनी चाहिए, न कि साल के अंत में एक छुपे हुए बिल के रूप में।"
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आगे की राह

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सरकार का लक्ष्य है कि ज्यादा से ज्यादा लोग ग्रीन एनर्जी (Green Energy) अपनाएं, लेकिन बिजली वितरण कंपनियों की ऐसी लचर कार्यप्रणाली इस लक्ष्य में बहुत बड़ी बाधा बन सकती है। अगर कोई व्यक्ति पर्यावरण को बचाने और अपने पैसे बचाने के लिए 2-3 लाख रुपये का निवेश करके सोलर पैनल लगवाता है, तो उसे एक पारदर्शी और जवाबदेह सिस्टम मिलना ही चाहिए।
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बिजली विभाग को अपनी तकनीकी खामियों को दूर करते हुए जल्द से जल्द एक ऐसा अलर्ट सिस्टम (SMS/App Notification) लागू करना चाहिए, जिससे सोलर उपभोक्ताओं का विभाग पर भरोसा बना रहे। नियामक आयोग का इस मामले में क्या फैसला आता है, यह देखना भी दिलचस्प होगा।
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