विद्युत नियामक आयोग ने बिजली कंपनियों की मनमानी पर लगाई लगाम, यूपी बना ऐसा फैसला सुनाने वाला देश का पहला राज्य:
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद राहत भरी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। राज्य में स्मार्ट मीटर लगाए जाने को लेकर लंबे समय से चल रही खींचतान और विवाद पर अब पूर्ण रूप से विराम लग गया है। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक कड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है। इस फैसले के अनुसार, अब राज्य के बिजली उपभोक्ता अपनी स्वेच्छा और सुविधा के अनुसार प्रीपेड (Prepaid) या पोस्टपेड (Postpaid) स्मार्ट मीटर का चयन कर सकेंगे।
\r\n\r\nअब कोई भी बिजली वितरण कंपनी (Discom) या उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) किसी भी उपभोक्ता पर जबरन प्रीपेड स्मार्ट मीटर थोपने का दबाव नहीं बना सकेगी। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि इस फैसले का आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
\r\n\r\nक्या था पूरा विवाद और क्यों पड़ी इस फैसले की जरूरत?
\r\n\r\nपिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में बिजली कंपनियों द्वारा स्मार्ट मीटर लगाने का अभियान तेजी से चलाया जा रहा था। इस अभियान के तहत, कई जगहों से ऐसी शिकायतें आ रही थीं कि बिजली विभाग के अधिकारी और कंपनियां उपभोक्ताओं के पुराने मीटर हटाकर जबरन प्रीपेड स्मार्ट मीटर (Prepaid Smart Meter) लगा रही हैं।
\r\n\r\nप्रीपेड मीटर का मतलब है कि उपभोक्ताओं को मोबाइल फोन की तरह पहले रिचार्ज करना होगा, और बैलेंस खत्म होते ही उनके घर की बत्ती गुल हो जाएगी। कई निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह व्यवस्था परेशानी का सबब बन रही थी, क्योंकि हर किसी के पास एकमुश्त रिचार्ज करने के पैसे हमेशा उपलब्ध नहीं होते। इसके अलावा, नए कनेक्शन लेने वाले उपभोक्ताओं को भी केवल प्रीपेड मीटर का ही विकल्प दिया जा रहा था।
\r\n\r\nबिजली कंपनियों की इस मनमानी के खिलाफ राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने मोर्चा खोला। परिषद ने 16 अप्रैल को नियामक आयोग (UPERC) में एक लोक महत्व (Public Interest) का प्रस्ताव दाखिल किया, जिसमें स्मार्ट प्रीपेड मीटर से ही नए कनेक्शन दिए जाने तथा पुराने मीटर हटाकर जबरन प्रीपेड मीटर लगाए जाने के निर्णय को चुनौती दी गई थी।
\r\n\r\nनियामक आयोग (UPERC) की सख्त कार्रवाई और ऐतिहासिक फैसला
\r\n\r\nउपभोक्ता परिषद की याचिका पर संज्ञान लेते हुए, विद्युत नियामक आयोग ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष और सभी विद्युत वितरण कंपनियों के प्रबंध निदेशकों (MDs) से जवाब तलब किया। आयोग ने पूछा कि किस नियम के तहत उपभोक्ताओं को केवल प्रीपेड मीटर के लिए बाध्य किया जा रहा है।
\r\n\r\nजब बिजली कंपनियों की तरफ से कोई भी संतोषजनक और विधि सम्मत (Legal) जवाब नहीं मिला, तो आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार और सदस्य संजय कुमार सिंह ने उपभोक्ताओं के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
\r\n\r\nशुक्रवार को जारी किए गए आधिकारिक आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया कि:
\r\n\r\n"विद्युत अधिनियम-2003 के तहत उपभोक्ताओं के पास अपने विद्युत कनेक्शन पर पोस्टपेड अथवा प्रीपेड मीटर में से किसी एक को चुनने का पूरा अधिकार रहेगा। बिजली कंपनियां अपने मनमाने तरीके से उपभोक्ताओं के पोस्टपेड कनेक्शन को प्रीपेड में परिवर्तित नहीं कर सकेंगी।"
\r\n\r\nविद्युत अधिनियम-2003 की धारा 47(5) का महत्व
\r\n\r\nइस पूरे फैसले का आधार विद्युत अधिनियम-2003 की धारा 47(5) है। यह धारा उपभोक्ताओं को सुरक्षा और अधिकार प्रदान करती है कि उन्हें किस प्रकार की बिलिंग प्रणाली का हिस्सा बनना है।
\r\n\r\nराज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि, "उत्तर प्रदेश अब देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां विद्युत नियामक आयोग ने विद्युत अधिनियम-2003 की धारा 47(5) पर उपभोक्ताओं के अधिकारों को स्पष्ट करते हुए एक अलग और विशेष आदेश जारी किया है।"
\r\n\r\nयह फैसला न केवल यूपी के लिए नजीर बनेगा, बल्कि भविष्य में अन्य राज्यों के उपभोक्ता भी अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए इस फैसले का हवाला दे सकेंगे।
\r\n\r\nइस फैसले से आम उपभोक्ताओं को होने वाले 5 बड़े फायदे
\r\n\r\nयह फैसला केवल एक कागजी आदेश नहीं है, बल्कि ग्राउंड लेवल पर इसका सीधा असर प्रदेश के करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ेगा:
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- चुनाव की पूर्ण स्वतंत्रता: अब उपभोक्ता अपनी आर्थिक स्थिति और सुविधा के अनुसार यह तय कर सकेंगे कि उन्हें महीने के अंत में बिल भरना है (पोस्टपेड) या पहले से रिचार्ज करवाना है (प्रीपेड)। \r\n
- दबाव की राजनीति का अंत: बिजली विभाग के कर्मचारी अब किसी भी उपभोक्ता को डरा-धमका कर या कनेक्शन काटने की धमकी देकर प्रीपेड मीटर लगाने के लिए मजबूर नहीं कर पाएंगे। \r\n
- नए और पुराने दोनों कनेक्शनों पर लागू: यह आदेश सिर्फ भविष्य में लगने वाले नए कनेक्शनों के लिए नहीं है, बल्कि मौजूदा उपभोक्ताओं पर भी समान रूप से लागू होगा। जिनके घर पुराने मीटर लगे हैं, उनके मीटर बदलते समय भी उनसे विकल्प पूछा जाएगा। \r\n
- पारदर्शिता में वृद्धि: बिजली कंपनियों को अब 'कास्ट डाटा बुक' और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा। वे अपने स्तर पर कोई मनमाना नियम नहीं थोप सकेंगी। \r\n
- आर्थिक सुरक्षा: उन परिवारों को बड़ी राहत मिली है, जिन्हें डर था कि प्रीपेड मीटर में बैलेंस खत्म होने पर रात-बिरात उनके घर की बिजली काट दी जाएगी। अब वे सुरक्षित रूप से पोस्टपेड का विकल्प चुनकर महीने भर निर्बाध बिजली पा सकते हैं और तय समय पर बिल का भुगतान कर सकते हैं। \r\n
बिजली कंपनियों के लिए सख्त निर्देश
\r\n\r\nआयोग ने अपने आदेश में बिजली वितरण कंपनियों (Discoms) के लिए भी स्पष्ट लकीर खींच दी है।
\r\n\r\nनियमों से खिलवाड़ नहीं: प्रदेश की कोई भी बिजली कंपनी इस आदेश में अपने स्तर से कोई बदलाव नहीं कर सकेगी।
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- दिशा-निर्देशों का पालन: कास्ट डाटा बुक (Cost Data Book) की जो भी व्यवस्थाएं हैं, वे केवल और केवल विद्युत अधिनियम और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority) द्वारा समय-समय पर जारी किए गए दिशा-निर्देशों के मुताबिक ही लागू की जाएंगी। \r\n
- सहमति अनिवार्य: यदि कोई उपभोक्ता स्वेच्छा से प्रीपेड मीटर लेना चाहता है, तो ही कंपनी उसे वह मीटर उपलब्ध कराएगी। बिना उपभोक्ता की लिखित या आधिकारिक सहमति के मीटर का प्रकार नहीं बदला जाएगा। \r\n
उपभोक्ता सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) का यह फैसला उपभोक्ता सशक्तिकरण (Consumer Empowerment) की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है। यह साबित करता है कि जब उपभोक्ता संगठित होकर अपने हकों के लिए आवाज उठाते हैं, तो व्यवस्था को झुकना पड़ता है।
\r\n\r\nस्मार्ट मीटर योजना मूल रूप से बिजली चोरी रोकने और बिलिंग को पारदर्शी बनाने के लिए लाई गई थी, लेकिन कंपनियों ने इसे अपनी सुविधानुसार लागू करने का प्रयास किया। अब इस फैसले के बाद, योजना का लाभ तो मिलेगा ही, साथ ही जनता को असुविधाओं का सामना भी नहीं करना पड़ेगा। यूपी का यह मॉडल पूरे देश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आया है। अब देखना यह है कि बिजली कंपनियां इस आदेश को जमीन पर कितनी तत्परता और ईमानदारी के साथ लागू करती हैं।
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Sabse pehle comment karne wale banein.