उत्तर प्रदेश के किसानों और आम जनता के लिए मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ओर से एक बेहद महत्वपूर्ण और थोड़ी चिंताजनक खबर सामने आई है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़े सहने के बाद हर कोई बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहा है, लेकिन इस साल यूपी में मानसून (UP Monsoon) सामान्य से कमजोर रहने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। मौसम विशेषज्ञों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि दक्षिण-पश्चिम मानसून इस वर्ष राज्य में अपनी पूरी क्षमता के साथ नहीं बरसेगा, जिससे सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अगर आप भी खेती-किसानी से जुड़े हैं या राज्य के मौसम के मिजाज को समझना चाहते हैं, तो यह रिपोर्ट आपके लिए बेहद जरूरी है।READ ALSO:-यूपी STF का बड़ा एक्शन: रात में कच्छा-बनियान पहनकर डकैती और हत्याएं करने वाले 'छैमार गैंग' का सरगना आसिफ एनकाउंटर में ढेर
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यूपी में मानसून कमजोर रहने के पीछे अल नीनो का साया
\r\n\r\nइस साल मानसून के कमजोर रहने के कारणों पर मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्रा (Dr. M. Mohapatra) ने विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि मौसम के इस बदलाव के पीछे प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में हो रही बड़ी हलचल मुख्य रूप से जिम्मेदार है। पिछले कुछ वर्षों से प्रशांत महासागर में 'ला नीना' (La Niña) की स्थिति बनी हुई थी, जो भारतीय मानसून के लिए काफी अनुकूल मानी जाती है। लेकिन अब यह स्थिति खत्म हो रही है।
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डॉ. महापात्रा के अनुसार, ला नीना के खत्म होने के साथ ही प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' (El Niño) की ओर बढ़ने के साफ संकेत मिल रहे हैं। अल नीनो एक ऐसी मौसमी घटना है जिसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। जब भी अल नीनो सक्रिय होता है, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर भारतीय उपमहाद्वीप की बारिश पर पड़ता है। इसी अल नीनो के कारण इस बार यूपी में मानसून की चाल धीमी और वर्षा का स्तर सामान्य से कम रहने का अनुमान लगाया गया है।
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क्या है अल नीनो और ला नीना का चक्र?
\r\n\r\nअल नीनो (El Niño) और ला नीना (La Niña) प्रशांत महासागर में होने वाले जलवायु परिवर्तन के दो विपरीत चरण हैं।
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- \r\n ला नीना: इसमें समुद्र का तापमान ठंडा होता है, जिससे हवाएं मजबूत होती हैं और भारत में अच्छी बारिश होती है।\r\n \r\n
- \r\n अल नीनो: इसमें समुद्र का तापमान गर्म हो जाता है, जिससे मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बारिश कम होती है। इतिहास गवाह है कि जिन वर्षों में अल नीनो का प्रभाव रहा है, उन वर्षों में भारत और विशेषकर उत्तर प्रदेश में सूखे की स्थिति देखने को मिली है। (External link: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की अल नीनो पर विस्तृत रिपोर्ट पढ़ें)\r\n \r\n
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उत्तरी गोलार्ध में कम बर्फबारी भी है एक बड़ी वजह
\r\n\r\nअल नीनो के अलावा एक और भौगोलिक कारण है जो इस साल मानसून की रफ्तार पर ब्रेक लगा रहा है। मौसम विभाग के अनुसार, इस साल जनवरी से मार्च के बीच उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में सामान्य से काफी कम बर्फबारी दर्ज की गई है।
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जलवायु विज्ञान के नियमों के अनुसार, यूरेशिया और उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों के दौरान पड़ने वाली बर्फ भारतीय मानसून को गहराई से प्रभावित करती है। अगर बर्फबारी कम होती है, तो गर्मियों में जमीन का तापमान उस अनुपात में नहीं बढ़ पाता है जो मानसूनी हवाओं को समुद्र से जमीन की तरफ खींचने के लिए जरूरी होता है। तापमान में इस असंतुलन के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। यही कारण है कि उत्तरी गोलार्ध की कम बर्फबारी का खामियाजा इस बार उत्तर प्रदेश को कम बारिश के रूप में भुगतना पड़ सकता है।
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यूपी के किसानों पर क्या होगा इसका सीधा असर?
\r\n\r\nउत्तर प्रदेश भारत का एक प्रमुख कृषि प्रधान राज्य है, जहां खेती का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी सीधे तौर पर मानसूनी बारिश पर निर्भर करता है। ऐसे में यूपी में मानसून के कमजोर पड़ने का सबसे बड़ा और सीधा असर खरीफ की फसलों पर पड़ेगा।
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- \r\n धान की खेती पर संकट: खरीफ सीजन में धान (चावल) यूपी की सबसे प्रमुख फसल है। धान की रोपाई और सिंचाई के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। बारिश कम होने से किसानों को धान की रोपाई में देरी का सामना करना पड़ सकता है।\r\n \r\n
- \r\n गन्ने की पैदावार: पश्चिमी यूपी में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है। कम बारिश से गन्ने की फसल की वृद्धि दर प्रभावित हो सकती है और मिठास में भी कमी आ सकती है।\r\n \r\n
- \r\n लागत में वृद्धि: जब आसमान से पानी नहीं बरसेगा, तो किसानों को सिंचाई के लिए ट्यूबवेल, पंपिंग सेट और नहरों पर निर्भर रहना पड़ेगा। डीजल और बिजली के इस्तेमाल से खेती की लागत में भारी इजाफा होने की आशंका है। (Internal link: कम बारिश में धान की खेती कैसे करें? कृषि विशेषज्ञों की राय जानें)\r\n \r\n
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सिंचाई के वैकल्पिक साधनों की पड़ेगी जरूरत
\r\n\r\nइस संभावित सूखे या कम बारिश की स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार और किसानों को अभी से रणनीति बनानी होगी। किसानों को ऐसी फसलों या बीजों का चयन करना चाहिए जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, जैसे बाजरा, मक्का, और मोटे अनाज। इसके अलावा, ड्रिप इरिगेशन (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर (Sprinkler) जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपनाकर पानी की हर एक बूंद का सही इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को सिंचाई के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति मिलती रहे ताकि फसलें न सूखें।
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मौसम विभाग की आगे की चेतावनी
\r\n\r\nमौसम विभाग लगातार सैटेलाइट और मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों के जरिए अल नीनो के विकास पर नजर बनाए हुए है। आईएमडी (IMD) का कहना है कि मानसून के दौरान बारिश का वितरण भी असमान रह सकता है। यानी कुछ जिलों में थोड़ी बहुत बारिश हो सकती है, जबकि कई जिले पूरी तरह से सूखे की चपेट में आ सकते हैं। मौसम विभाग ने राज्य प्रशासन को सलाह दी है कि वह जल संरक्षण और आपातकालीन सिंचाई योजनाओं पर तेजी से काम शुरू कर दे।
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समग्र रूप से देखा जाए तो, अल नीनो का बढ़ता प्रभाव और उत्तरी गोलार्ध में कम बर्फबारी का सीधा असर इस साल के मानसून चक्र पर पड़ रहा है। मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के महानिदेशक डॉ. महापात्रा की चेतावनी इस बात का साफ संकेत है कि हमें पानी की कमी से जूझने के लिए तैयार रहना चाहिए। यूपी में मानसून का कमजोर रहना न केवल किसानों की परेशानी बढ़ाएगा, बल्कि यह भूजल स्तर और गर्मी के मौसम को भी प्रभावित करेगा। ऐसे में जल संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना और खेती में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना ही इस प्राकृतिक चुनौती से निपटने का एकमात्र रास्ता है।
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मौसम विभाग (IMD) के अनुसार इस साल प्रशांत महासागर में 'ला नीना' की स्थिति खत्म होकर 'अल नीनो' सक्रिय हो रहा है, जिससे दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने की आशंका है। इसके अलावा, जनवरी-मार्च में उत्तरी गोलार्ध में हुई कम बर्फबारी भी मानसूनी हवाओं को प्रभावित कर रही है। इन दोनों भौगोलिक कारणों से इस वर्ष यूपी में मानसून सामान्य से कम बरसेगा। इससे धान और गन्ने जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की सिंचाई पर बुरा असर पड़ सकता है, जिसके लिए किसानों को अभी से वैकल्पिक सिंचाई के उपाय तलाशने की सलाह दी गई है।
Sabse pehle comment karne wale banein.