थानाभवन (विशेष संवाददाता): आध्यात्म, शांति और धर्म की नगरी थानाभवन एक बार फिर भक्ति के रंगों में सराबोर नजर आई। कस्बे के प्रतिष्ठित और आस्था के प्रमुख केंद्र 'दयाल आश्रम' में परम पूज्य संत बाबा बोधराज जी महाराज की 48वीं पुण्यतिथि के पावन अवसर पर एक भव्य 'संत समागम' और भजन-कीर्तन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस वृहद आध्यात्मिक आयोजन में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से आए संतों, महात्माओं और सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।READ ALSO:-मेरठ हत्याकांड: प्यार में अंधी मां ने प्रेमी संग मिलकर 7 साल के बेटे अंगदवीर की गला रेतकर की हत्या, रोंगटे खड़े कर देगा सच
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पूरा आश्रम परिसर बाबा बोधराज जी के जयकारों, शंखनाद और भजनों की मधुर धुनों से गूंजायमान हो उठा। यह आयोजन न केवल बाबा जी को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि था, बल्कि समाज को धर्म, सदाचार और परोपकार के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने वाला एक महान मंच भी साबित हुआ।
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भजन-कीर्तन से हुई शुरुआत, भक्तिमय हुआ माहौल

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कार्यक्रम का शुभारंभ सुबह की पवित्र बेला में वैदिक मंत्रोच्चारण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात, प्रख्यात भजन गायकों और संतों की मंडलियों ने ईश्वर की महिमा और बाबा बोधराज जी महाराज के जीवन पर आधारित एक से बढ़कर एक सुमधुर भजन प्रस्तुत किए।
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भजनों की स्वर-लहरियों ने वहां उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु को मंत्रमुग्ध कर दिया। "राम नाम रस पीजै..." और "गुरु की महिमा अपरंपार..." जैसे भजनों पर श्रद्धालु झूमते और तालियां बजाते नजर आए। भजन-कीर्तन के इस दौर ने आश्रम के वातावरण को पूरी तरह से शिवमय और राममय कर दिया। श्रद्धालुओं ने इस दौरान महसूस किया कि संगीत और भक्ति का यह संगम आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सबसे सुलभ और सुंदर मार्ग है।
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बाबा बोधराज जी: त्याग, तपस्या और मानव सेवा की प्रतिमूर्ति

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मंच पर विराजमान विभिन्न संत-महात्माओं ने अपने प्रवचनों के माध्यम से बाबा बोधराज जी महाराज के गौरवशाली और प्रेरणादायक जीवन चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने उनके जीवन को याद करते हुए समाज को उनके द्वारा दिखाए गए सत्य के मार्ग से अवगत कराया।
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संतों ने अपने संबोधन में मुख्य रूप से इन बातों पर जोर दिया:

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    विरले होते हैं ऐसे संत: वक्ताओं ने कहा कि इस घोर कलियुग में ऐसे संत विरले ही इस धरती पर जन्म लेते हैं, जो अपने निजी स्वार्थ और सांसारिक मोह-माया का पूरी तरह से त्याग कर देते हैं।
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    संपूर्ण जीवन समाज को समर्पित: बाबा बोधराज जी महाराज ने अपना पूरा जीवन केवल ईश्वरीय आराधना में ही नहीं, बल्कि दुखी और पीड़ित मानवता की सेवा में भी खपा दिया।
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    आदर्शों पर चलने का आह्वान: संतों ने उपस्थित अपार जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि हम बाबा जी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी दे सकते हैं, जब हम उनके द्वारा बताए गए आदर्शों— दया, क्षमा, करुणा और निस्वार्थ सेवा— को अपने व्यक्तिगत जीवन में आत्मसात करें।
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सनातन धर्म पर संतों का ओजस्वी प्रवचन: "जिसका अंत नहीं, वही सनातन है"

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इस संत समागम का सबसे प्रमुख और वैचारिक आकर्षण विभिन्न विद्वान संतों द्वारा 'सनातन धर्म' के गूढ़ रहस्यों पर दिए गए प्रवचन रहे। आज के भौतिकतावादी युग में सनातन धर्म की प्रासंगिकता को लेकर संतों ने बड़े ही तार्किक और आध्यात्मिक विचार प्रस्तुत किए।
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रामप्रताप कालिया जी के विचार: प्रवचन के दौरान प्रख्यात आध्यात्मिक वक्ता रामप्रताप कालिया जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, "सनातन धर्म विश्व का सर्वश्रेष्ठ और सबसे वैज्ञानिक धर्म है। प्रत्येक जीव, चाहे वह किसी भी योनि में हो, अपने मूल स्वरूप में सनातन ही है।" उन्होंने समझाया कि सनातन धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा स्थापित पंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक प्राकृतिक और शाश्वत कला है जो मनुष्य को सीधे प्रकृति और ईश्वर से जोड़ती है।
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स्वामी रामनरेश जी का संबोधन: वहीं, मंच से अपने ओजस्वी विचारों को रखते हुए स्वामी रामनरेश जी ने सनातन धर्म की प्राचीनता और उसकी विशालता पर बल दिया। उन्होंने कहा, "सनातन धर्म इस पूरे संसार का सबसे प्राचीन और आदि धर्म है। 'सनातन' शब्द का अर्थ ही यही है कि जिसका कोई आदि (शुरुआत) न हो और जिसका कोई अंत न हो। काल के चक्र में कई विचार आए और गए, लेकिन सनातन आज भी अटल है।"
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स्वामी जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं से भावुक अपील करते हुए कहा कि आज समाज में जो भटकाव आ गया है, उसका एकमात्र समाधान धर्म, सेवा और सदाचार के मार्ग पर वापस लौटना है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने कर्मों को शुद्ध रखे और हमेशा परोपकार के लिए तत्पर रहे।
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श्रद्धालुओं का उमड़ा जनसैलाब: संतों का लिया आशीर्वाद

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जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, दयाल आश्रम में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती ही गई। प्रवचन और भजन-कीर्तन के समापन के पश्चात, सभी श्रद्धालुओं ने एक-एक कर मंच पर आसीन संतों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान लोगों की आंखों में बाबा बोधराज जी के प्रति अपार श्रद्धा और प्रेम के आंसू साफ देखे जा सकते थे।
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कार्यक्रम के अंतिम चरण में बाबा बोधराज जी महाराज की आरती की गई और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसके बाद विशाल भंडारे (प्रसाद वितरण) का आयोजन किया गया, जिसमें अमीर-गरीब, ऊंच-नीच के सभी भेदों को मिटाकर सभी ने एक ही पंक्ति में बैठकर पंगत में प्रसाद ग्रहण किया। यह दृश्य अपने आप में सामाजिक समरसता का एक बहुत बड़ा उदाहरण था।
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इन गणमान्य लोगों की रही विशेष उपस्थिति

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इस भव्य और सफल आयोजन को संपन्न कराने में आश्रम प्रबंधन और स्थानीय समाजसेवियों का बहुत बड़ा योगदान रहा। कार्यक्रम के दौरान पूरे समय व्यवस्था संभालने और संतों की सेवा करने में सैकड़ों श्रद्धालु तत्पर रहे।
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इस अवसर पर मुख्य रूप से उपस्थित गणमान्य व्यक्ति:

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    संजीव चावला
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    महेश नारंग
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    अशोक चावला
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    सुभाष अरोरा
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    राजीव मेहता
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    मदन नारंग
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    सुभाष चंद
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    गुलशन नारंग
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    शिना नारंग
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    श्रवण नारंग
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    भरत नारंग
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    पंडित जी
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इन सभी प्रमुख लोगों के साथ-साथ क्षेत्र के सैकड़ों अन्य पुरुष, महिलाएं और युवा इस पुण्य कार्य के साक्षी बने। कार्यक्रम का समापन विश्व शांति की प्रार्थना और "धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो" के गगनभेदी जयकारों के साथ हुआ। दयाल आश्रम में आयोजित यह 48वां स्मृति समारोह स्थानीय लोगों के मन में भक्ति और ऊर्जा का एक नया संचार कर गया।
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