उत्तर प्रदेश में किराए के मकान या दुकान में रहने वाले लाखों किराएदारों के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) से एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। अक्सर किराएदारों को मनमाने तरीके से किराया (Rent) बढ़ाए जाने या अचानक मकान खाली करने (Eviction) का डर सताता रहता है। इसी को लेकर हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी विनियमन अधिनियम, 2021 (UP Urban Premises Tenancy Regulation Act, 2021) की कई महत्वपूर्ण धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया है।READ ALSO:-क्या ‘स्वाइन फ्लू’ का नया ‘स्ट्रेन’ आ गया? दिल्ली-NCR में पिछले साल के मुकाबले 8 गुना बढ़े मरीज, जानें डॉक्टरों की अहम सलाह
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यह अहम फैसला 'इंदर भूषण साहनी बनाम कंचन कुमारी जैन (मृत) और 2 अन्य' मामले की सुनवाई करते हुए आया है। जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपामा चतुर्वेदी की खंडपीठ (Division Bench) ने 21 अगस्त को यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का यह कानून केंद्रीय कानूनों से टकरा रहा था और इसे लागू करने में संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
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आइए आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं कि कोर्ट ने किन धाराओं को रद्द किया है, इसका कारण क्या था, और अब मकान मालिक तथा किराएदार के अधिकारों पर इसका क्या सीधा असर पड़ेगा।
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कोर्ट ने किन धाराओं को किया रद्द? (एक नज़र में)
\r\n\r\nहाई कोर्ट की बेंच ने मुख्य रूप से 2021 के अधिनियम की 5 अहम धाराओं (Sections) पर रोक लगाई है। नीचे दी गई टेबल से समझें कि ये धाराएं किन विषयों से जुड़ी थीं:
\r\n\r\n| \r\n रद्द की गई धारा \r\n | \r\n \r\n विषय / प्रावधान (Subject) \r\n | \r\n
| \r\n धारा 8 \r\n | \r\n \r\n किराएदारी एग्रीमेंट से अलग जाकर तय दरों पर रेंट बढ़ाने की छूट। \r\n | \r\n
| \r\n धारा 9 \r\n | \r\n \r\n रेंट में संशोधन (Revision of Rent) से जुड़े नियम। \r\n | \r\n
| \r\n धारा 10 \r\n | \r\n \r\n मकान मालिक और किराएदार के बीच विवाद होने पर रेंट अथॉरिटी द्वारा नया रेंट तय करना। \r\n | \r\n
| \r\n धारा 38 \r\n | \r\n \r\n विवादों के निपटारे के लिए अलग से रेंट अथॉरिटी (Rent Authority) का गठन। \r\n | \r\n
| \r\n धारा 42 \r\n | \r\n \r\n रेंट ट्रिब्यूनल (Rent Tribunal) बनाकर सिविल कोर्ट की प्रक्रियाओं को बदलना। \r\n | \r\n
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क्यों रद्द हुए ये नियम? (संविधान का पेंच)
\r\n\r\nपूरा विवाद संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) की समवर्ती सूची (Concurrent List) से जुड़ा है। समवर्ती सूची में वे विषय आते हैं जिन पर केंद्र सरकार (संसद) और राज्य सरकार (विधानसभा) दोनों कानून बना सकते हैं।
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किराया और किराएदारी का विषय भी इसी सूची में आता है, जिस पर केंद्र सरकार ने पहले ही 'ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882' (Transfer of Property Act, 1882) बना रखा है।
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संविधान के अनुच्छेद 254(2) के अनुसार, यदि राज्य सरकार कोई ऐसा कानून बनाती है जो केंद्र के पुराने कानून से टकराता है, तो उसे लागू करने से पहले भारत के राष्ट्रपति की विशेष मंजूरी (Presidential Assent) लेनी अनिवार्य होती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पाया कि यूपी सरकार ने 2021 के इस कानून को लागू करने से पहले राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं ली थी। इसी संवैधानिक चूक के कारण इन धाराओं को असंवैधानिक (Unconstitutional) मानकर रद्द कर दिया गया।
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अब किराएदारों और मकान मालिकों पर क्या होगा असर?
\r\n\r\nइस फैसले ने किराएदारी के नियमों को वापस केंद्रीय कानूनों (मुख्य रूप से ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट) के दायरे में ला खड़ा किया है। इसके प्रमुख प्रभाव इस प्रकार होंगे:
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1. मनमाने तरीके से रेंट बढ़ाने पर रोक
\r\n\r\nपहले, रद्द की गई धारा 8, 9 और 10 के तहत मकान मालिकों को यह छूट मिल रही थी कि वे एग्रीमेंट (Lease Deed) की शर्तों से अलग जाकर भी रेंट अथॉरिटी के माध्यम से किराया बढ़ा सकते थे। कोर्ट ने इसे केंद्रीय कानून की भावना के खिलाफ माना। अब मकान मालिक अपनी मर्जी से मनमाना किराया नहीं बढ़ा पाएंगे। किराया वृद्धि केवल उसी आधार पर होगी जो किराएदार और मकान मालिक के बीच हुए मूल रेंट एग्रीमेंट (Rent Agreement) में तय की गई होगी।
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2. बेदखली (Eviction) के नियमों में बदलाव
\r\n\r\nयूपी के 2021 वाले कानून में मकान मालिकों को कई ऐसे आधारों पर भी किराएदार को निकालने (Evict) की शक्ति दे दी गई थी, जिनका जिक्र रेंट एग्रीमेंट में होता ही नहीं था।
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- \r\n जैसे: समय पर रेंट न देना, मकान में मरम्मत (Renovation) की जरूरत, मृत मकान मालिक के कानूनी वारिसों को अपनी जरूरत के लिए मकान खाली करवाना, या बिना अनुमति के मकान में बदलाव करना।\r\n \r\n
- \r\n मकान खाली न करने पर जुर्माने के रूप में बहुत अधिक रेंट वसूलने का भी नियम था।\r\n \r\n
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हाई कोर्ट ने इन सभी प्रावधानों पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि ये ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के चैप्टर V के तहत दिए गए अधिकारों का हनन करते हैं। अब बिना ठोस और एग्रीमेंट में दर्ज कानूनी आधार के, किराएदार को रातों-रात बेदखल नहीं किया जा सकेगा।
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3. ट्रिब्यूनल की जगह सिविल कोर्ट की वापसी
\r\n\r\nअधिनियम की धारा 38 और 42 के तहत राज्य सरकार ने किराए के विवाद निपटाने के लिए अलग से 'रेंट अथॉरिटी' और 'रेंट ट्रिब्यूनल' बनाने का प्रावधान किया था। कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम (SCC Act) और यूपी सिविल कानून (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ है। इसका मतलब है कि अब किराए के विवादों की सुनवाई पुराने तरीके से ही अधिकृत सिविल कोर्ट (Civil Courts) में होगी।
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क्या पुराने और चल रहे मामलों पर पड़ेगा इस फैसले का असर?
\r\n\r\nइस पूरे फैसले में सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि हाई कोर्ट ने अपने इस आदेश को पिछली तारीख (Retrospective Effect) से लागू नहीं किया है।
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- \r\n निपट चुके मामले: जिन मामलों में 2021 के कानून के तहत कार्रवाई पूरी हो चुकी है और आदेश आ चुके हैं (जहां इन धाराओं को चुनौती नहीं दी गई थी), वे मामले दोबारा नहीं खोले जाएंगे।\r\n \r\n
- \r\n पुराने एग्रीमेंट: इस कानून के तहत जो रेंट एग्रीमेंट पहले ही बन चुके हैं और जिनमें रेंट बदला जा चुका है, वे वैध रहेंगे।\r\n \r\n
- \r\n आगे का असर: यह फैसला मुख्य रूप से भविष्य की कार्रवाइयों और वर्तमान में लंबित उन मामलों पर असर डालेगा जहां इन धाराओं के तहत नई अपील या विवाद खड़ा किया जा रहा है।\r\n \r\n
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किसने रखा अदालत में पक्ष?
\r\n\r\nइस महत्वपूर्ण मामले में कानूनी लड़ाई भी बेहद दिलचस्प रही।
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- \r\n याचिकाकर्ताओं की ओर से: सीनियर एडवोकेट शशि नंदन ने मजबूती से किराएदारों के हक और संवैधानिक टकराव की दलीलें कोर्ट के सामने रखीं।\r\n \r\n
- \r\n राज्य सरकार की ओर से: यूपी सरकार का बचाव एडिशनल एडवोकेट जनरल राहुल अग्रवाल ने किया।\r\n \r\n
- \r\n अन्य वकील: मामले में सीनियर एडवोकेट आशीष कुमार सिंह और एडवोकेट सुदीप हरकौली ने भी महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु अदालत के सामने पेश किए।\r\n \r\n
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किराएदारों के लिए सुकून की सांस
\r\n\r\nइलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश के उन लाखों किराएदारों के लिए एक 'सुरक्षा कवच' की तरह है, जो अक्सर मकान मालिकों की मनमानी, अचानक किराया वृद्धि और बेदखली के दबाव में रहते थे। इस फैसले ने यह स्थापित कर दिया है कि रेंट एग्रीमेंट ही सर्वोपरि है और किसी भी राज्य कानून को लागू करने से पहले संवैधानिक मर्यादाओं (विशेषकर राष्ट्रपति की मंजूरी) का पालन करना अनिवार्य है। अब किराएदारी के मामलों में एक बार फिर केंद्रीय कानून 'ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट' का दबदबा कायम हो गया है।
Sabse pehle comment karne wale banein.