भारतीय कानूनी व्यवस्था और वैवाहिक अधिकारों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर किसी व्यक्ति की पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में है, तो दूसरी महिला बिना किसी ठोस सबूत के भरण-पोषण (Maintenance) का दावा नहीं कर सकती। यह फैसला उन मामलों के लिए एक नजीर बन गया है, जहां बिना विवाह पंजीकरण, बिना रीति-रिवाजों के साक्ष्य या बिना स्पष्ट 'लिव-इन रिलेशनशिप' (Live-in Relationship) के भरण-पोषण की मांग की जाती है।READ ALSO:-यूपी में बरपा मानसून का कहर: 75 जिलों में हाई अलर्ट, बलिया में 3 सेकंड में नदी में समाया स्कूल, जानें अपने शहर का हाल
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न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला की एकलपीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज करते हुए कानूनी स्थिति को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है। आइए, इस पूरे मामले, कानूनी दांव-पेंच और अदालत की अहम टिप्पणियों को विस्तार से समझते हैं।
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क्या है पूरा मामला और कहां से शुरू हुआ विवाद?

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यह पूरा कानूनी विवाद उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले से जुड़ा है। मामले की शुरुआत तब हुई जब याचिकाकर्ता मंजू सोनकर ने कौशांबी के पारिवारिक न्यायालय (Family Court) का दरवाजा खटखटाया। मंजू सोनकर ने ओम प्रकाश नाम के व्यक्ति के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था।
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महिला का दावा था कि वह ओम प्रकाश के साथ पति-पत्नी की तरह रह रही थी और उनका एक बच्चा भी है। इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद, 15 जुलाई 2022 को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट कौशांबी ने अपना अहम फैसला सुनाया।
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पारिवारिक न्यायालय ने मामले के दो अलग-अलग पहलू देखे:

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    बच्चे के लिए भरण-पोषण: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता और विपक्षी का एक जैविक नाबालिग बच्चा है। कानून की नजर में बच्चे का अधिकार सुरक्षित है, इसलिए अदालत ने ओम प्रकाश को बच्चे के भरण-पोषण का खर्च उठाने का आदेश दिया और इस दावे को स्वीकार कर लिया।
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    महिला का दावा खारिज: वहीं दूसरी ओर, फैमिली कोर्ट ने मंजू सोनकर के गुजारे भत्ते के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ओम प्रकाश की पहली शादी पहले से ही अस्तित्व में है। हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत, पहली पत्नी के जीवित रहते हुए और बिना तलाक लिए, दूसरी शादी को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता। इसलिए, महिला कानूनी रूप से विवाहित पत्नी की श्रेणी में नहीं आती।
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हाईकोर्ट पहुंची याचिकाकर्ता: क्या थीं प्रमुख दलीलें?

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पारिवारिक न्यायालय के इस फैसले से असंतुष्ट होकर मंजू सोनकर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने कई मजबूत तर्क पेश करने की कोशिश की, जो इस प्रकार थे:
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    पहली शादी की जानकारी न होना: महिला के वकील की सबसे बड़ी दलील यह थी कि उनकी मुवक्किल (मंजू सोनकर) को ओम प्रकाश की पहली शादी और उसकी पहली पत्नी के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी। उसे अंधेरे में रखा गया था।
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    पति-पत्नी की तरह रहना: यह तर्क दिया गया कि दोनों समाज की नजरों में लंबे समय तक एक साथ पति-पत्नी की तरह रह रहे थे, इसलिए उसे कानूनी पत्नी के समान ही भरण-पोषण का अधिकार मिलना चाहिए।
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    पुराने फैसलों का हवाला: अपने दावों को कानूनी वजन देने के लिए याचिकाकर्ता की ओर से दो बड़े फैसलों का हवाला दिया गया। पहला, उड़ीसा हाईकोर्ट का 'अनुपमा प्रधान बनाम सुल्तान प्रधान' केस और दूसरा, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक 'चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा' केस। इन फैसलों में कुछ विशेष परिस्थितियों में महिलाओं को राहत दी गई थी।
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हाईकोर्ट ने क्यों खारिज किए पुराने फैसलों के तर्क?

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न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला की अदालत ने साक्ष्यों, गवाहियों और याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए पुराने फैसलों का बहुत ही बारीकी से कानूनी विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि जिन पुराने मुकदमों का हवाला दिया जा रहा है, उनकी परिस्थितियां इस वर्तमान मामले से बिल्कुल अलग हैं।
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अदालत ने स्पष्ट किया:

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    अनुपमा प्रधान मामले का सच: हाईकोर्ट ने कहा कि उड़ीसा हाईकोर्ट के 'अनुपमा प्रधान' मामले में शामिल पक्षकार अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe - ST) समुदाय से आते थे। भारतीय कानून के अनुसार, अनुसूचित जनजातियों पर हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के नियम सीधे तौर पर लागू नहीं होते हैं। लेकिन कौशांबी वाले इस वर्तमान मामले में ऐसा कोई अपवाद नहीं है, यहां हिंदू कानून पूरी तरह से लागू होता है।
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    चनमुनिया मामले का अंतर: सुप्रीम कोर्ट के 'चनमुनिया' मामले में पक्षकारों के बीच विवाह के तथ्य पर कोई विवाद नहीं था। वहां शादी होने की बात स्वीकारी गई थी। इसके उलट, वर्तमान मामले में विपक्षी पक्ष (ओम प्रकाश) ने याचिकाकर्ता मंजू सोनकर के साथ किसी भी तरह के संबंध, विवाह या लिव-इन में रहने की बात से पूरी तरह से इनकार किया है।
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सबूतों के अभाव में नहीं मिल सकता धारा 125 का लाभ

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हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 मुख्य रूप से निराश्रित महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को भुखमरी से बचाने के लिए बनाई गई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी बिना सबूत के इसका लाभ उठा सकता है।
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न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला ने अपने आदेश में बेहद सख्त और स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा:

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"जहां रिकॉर्ड पर न तो शादी के अनुष्ठान (Rituals of Marriage) संपन्न होने का कोई भी ठोस सबूत मौजूद है और न ही लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) से जुड़ी कोई सामग्री या पुख्ता साक्ष्य अदालत के सामने पेश किए गए हैं, वहां महज आरोपों के आधार पर धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।"
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फैसले का समाज और कानून पर प्रभाव (Impact of the Verdict)

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी और सामाजिक दोनों ही दृष्टिकोण से बेहद मायने रखता है:
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    ठोस सबूतों की अनिवार्यता: यह फैसला साफ करता है कि अदालतों में केवल दावे करना काफी नहीं है। अगर कोई महिला लिव-इन रिलेशनशिप या बिना पंजीकरण वाली शादी के आधार पर मेंटेनेंस मांगती है, तो उसे साझा गृहस्थी (Shared Household), समाज में पति-पत्नी की तरह रहने के सबूत या शादी के रीति-रिवाजों की तस्वीरें/गवाह पेश करने होंगे।
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    हिंदू विवाह अधिनियम की पवित्रता: यह फैसला धारा 5 (विवाह की शर्तें) को मजबूती देता है कि पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी शून्य (Void) है।
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    निचली अदालत के फैसले पर मुहर: हाईकोर्ट ने कौशांबी की फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह से न्यायसंगत, तर्कपूर्ण और कानून के अनुकूल माना। इसके साथ ही, आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को महत्वहीन मानते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया।
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यह मामला इस बात का भी एक बड़ा उदाहरण है कि कानूनी रिश्तों में पारदर्शिता और दस्तावेजीकरण कितना जरूरी है। अदालतें भावनाओं पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों और स्थापित कानूनों के आधार पर ही न्याय करती हैं।
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