चिकित्सा जगत में अक्सर ऐसे चमत्कार देखने को मिलते हैं, जो आम इंसान को पूरी तरह से हैरान कर देते हैं। हाल ही में नवी मुंबई में डॉक्टरों का कमाल सामने आया है, जिसने मौत को मात देकर एक नई मिसाल पेश की है। अपोलो अस्पताल में 50 डॉक्टरों की एक बड़ी टीम ने 37 वर्षीय मर्चेंट नेवी अधिकारी को नई जिंदगी दी है। फटी हुई एओर्टा और शरीर में दर्जनों फ्रैक्चर जैसी जानलेवा चोटों के बावजूद इस मरीज की जान बचाना भारत में एक बहुत बड़ी मेडिकल उपलब्धि है।
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सड़क दुर्घटना में हुआ था गंभीर पॉलीट्रॉमा का शिकार

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मरीज एक भयानक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया था। इस भयंकर हादसे में उसके शरीर को भारी नुकसान पहुंचा था। जब उसे अस्पताल लाया गया, तब उसकी स्थिति बेहद नाजुक और गंभीर थी।
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डॉक्टरों की शुरुआती जांच में पता चला कि मरीज के शरीर में दर्जनों फ्रैक्चर आ चुके हैं। उसका एक हाथ पूरी तरह से कुचल गया था और शरीर के निचले अंगों में पल्स (नब्ज) भी नहीं मिल रही थी।
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सबसे बड़ी और जानलेवा चुनौती शरीर की मुख्य रक्त वाहिका, यानी एओर्टा का फटना था। यह एक बेहद जानलेवा स्थिति होती है, जिसमें मरीज की जान चंद मिनटों में जा सकती है। नवी मुंबई में डॉक्टरों का कमाल ही था कि उन्होंने सही समय पर स्थिति को भांप लिया।
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क्या होती है एओर्टा और इसका फटना कितना खतरनाक है?

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एओर्टा (महाधमनी) मानव शरीर की सबसे बड़ी और मुख्य धमनी होती है। इसका काम हृदय से ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त को शरीर के बाकी हिस्सों तक पहुंचाना होता है।
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जब किसी भयानक दुर्घटना में सीने पर गहरा आघात लगता है, तो भारी दबाव के कारण यह धमनी फट सकती है। ऐसे मामलों में अत्यधिक आंतरिक रक्तस्राव (Internal Bleeding) होता है और मरीज के बचने की संभावना न के बराबर रह जाती है।
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45 मिनट के भीतर शुरू हुआ जटिल ऑपरेशन

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मरीज के अस्पताल पहुंचते ही मेडिकल टीम ने तुरंत एक्शन लिया। आपातकालीन चिकित्सा में इसे 'गोल्डन आवर' (Golden Hour) का सही उपयोग कहा जाता है। समय की बर्बादी किए बिना इलाज शुरू किया गया।
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ट्रॉमा, ऑर्थोपेडिक, कार्डियोलॉजी, प्लास्टिक सर्जरी और क्रिटिकल केयर विभाग के विशेषज्ञ तुरंत एक साथ सक्रिय हो गए। मेडिकल टीम ने बिना कोई समय गंवाए महज 45 मिनट के भीतर ही ऑपरेशन शुरू कर दिया।
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घंटों तक चली जटिल सर्जरियों के जरिए शरीर के फटे अंगों और फ्रैक्चर को स्थिर किया गया। खून के अत्यधिक बहाव को रोककर मरीज को सुरक्षित स्थिति में लाया गया, जो एक बेहद मुश्किल काम था।
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50 डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ का बेहतरीन समन्वय

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इस पूरे इलाज और ऑपरेशन में 50 डॉक्टरों और सहयोगी स्टाफ की टीम ने एक साथ मिलकर काम किया। डॉ. समीर चौधरी ने बताया कि यह उनके द्वारा संभाले गए सबसे चुनौतीपूर्ण पॉलीट्रॉमा मामलों में से एक था।
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डॉक्टरों की अलग-अलग टीमों ने अपने-अपने क्षेत्र का काम पूरी सटीकता और धैर्य के साथ किया। कार्डियोलॉजिस्ट ने एओर्टा को संभाला, तो वहीं ऑर्थोपेडिक टीम ने टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने का काम किया।
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समय पर लिए गए सही फैसलों और विभिन्न विभागों के सटीक समन्वय ने ही इस मर्चेंट नेवी अधिकारी की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। इस सफलता से नवी मुंबई में डॉक्टरों का कमाल पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।
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एक सप्ताह तक वेंटिलेटर पर रहा मरीज

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ऑपरेशन खत्म होने के बाद भी खतरा पूरी तरह से टला नहीं था। मरीज की हालत इतनी ज्यादा नाजुक थी कि उसे अगले रिकवरी फेज के लिए करीब एक सप्ताह तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया।
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इस दौरान क्रिटिकल केयर टीम ने मरीज के सभी महत्वपूर्ण अंगों की लगातार निगरानी की। कई अन्य जटिल उपचार प्रक्रियाओं के माध्यम से शरीर के अंगों की कार्यक्षमता को वापस लाने का गंभीर प्रयास किया गया।
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धीरे-धीरे मरीज के शरीर ने दी जा रही दवाओं और आधुनिक इलाज पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी। वेंटिलेटर सपोर्ट से सफलतापूर्वक बाहर आने के बाद उसे आईसीयू से सामान्य वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।
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अब खड़े होने और चलने की कर रहा है कोशिश

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आईसीयू से वार्ड तक का सफर तय करने के बाद अब मरीज की सघन फिजियोथेरेपी (Physiotherapy) चल रही है। उसकी अस्पताल से पुनर्वास की यह यात्रा काफी प्रेरणादायक और सकारात्मक रही है।
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आज वह मर्चेंट नेवी अधिकारी खुद से खड़े होने और चलने की दिशा में लगातार प्रगति कर रहा है। अपोलो हॉस्पिटल्स के सीओओ और यूनिट हेड डॉ. किरण शिंगोटे ने कहा कि यह टीमवर्क की एक बड़ी जीत है।
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उन्होंने स्पष्ट किया कि 50 से अधिक डॉक्टरों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ के सामूहिक प्रयास ने एक जानलेवा ट्रॉमा को रिकवरी की इस शानदार कहानी में बदल दिया।
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अंततः, नवी मुंबई में डॉक्टरों का कमाल यह साबित करता है कि अगर सही समय पर आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं, विशेषज्ञता और एक मजबूत टीमवर्क मिल जाए, तो इंसान मौत के मुंह से भी वापस आ सकता है। मर्चेंट नेवी अधिकारी की यह शानदार रिकवरी आज हर उस मरीज के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद है, जो किसी गंभीर ट्रॉमा से जूझ रहा है।
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