करवा चौथ भारतीय संस्कृति में विवाहित महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक त्योहारों में से एक है। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं।Read also:-मेरठ वालों सावधान! 5 से ज्यादा चालान पेंडिंग हैं तो रद्द होगा ड्राइविंग लाइसेंस, 83 हजार की 'ब्लैक लिस्ट' तैयार
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क्या है करवा चौथ का व्रत और इसका महत्व?
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करवा चौथ का व्रत पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते को समर्पित है। इसका पौराणिक महत्व रानी वीरवती की कथा से जुड़ा है, जिसने अपने पति के प्राण बचाने के लिए इस कठोर व्रत को सफलतापूर्वक पूरा किया था। यह व्रत एक पत्नी के अपने पति के प्रति निस्वार्थ प्रेम और त्याग का प्रतीक है। माना जाता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहता है।
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व्रत की शुरुआत 'सरगी' के साथ
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इस व्रत का आरंभ सूर्योदय से पहले 'सरगी' के साथ होता है। सास अपनी बहू को आशीर्वाद के रूप में एक थाली देती है जिसमें फल, मेवे, मिठाई और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ होते हैं। इसे खाकर महिलाएं दिन भर के लिए ऊर्जा प्राप्त करती हैं और इसके बाद से उनका निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, जो रात में चांद देखने तक चलता है।
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दिन भर का निर्जला उपवास और सोलह श्रृंगार
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सरगी के बाद महिलाएं पूरे दिन बिना कुछ खाए-पिए रहती हैं। यह दिन सिर्फ उपवास का नहीं, बल्कि उत्सव का भी होता है। महिलाएं दुल्हन की तरह सजती-संवरती हैं, जिसे 'सोलह श्रृंगार' कहा जाता है। नए वस्त्र, गहने, हाथों में मेहंदी और पैरों में आलता लगाकर वे इस दिन को खास बनाती हैं।
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शाम की पूजा और कथा का विधान
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शाम के समय सभी व्रत रखने वाली महिलाएं एक साथ इकट्ठा होकर पूजा करती हैं। वे एक घेरे में बैठती हैं, करवा माता (देवी पार्वती) की पूजा करती हैं और करवा चौथ की व्रत कथा सुनती हैं। इस दौरान वे अपनी पूजा की थाली को एक-दूसरे के साथ घुमाती हैं, जो आपसी एकता और सद्भावना का प्रतीक है।
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छलनी से चांद देखने की अनूठी परंपरा
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व्रत का सबसे प्रतीक्षित और सुंदर क्षण रात में चंद्रोदय का होता है। महिलाएं बेसब्री से चांद का इंतजार करती हैं और उसके दिखने पर पूजा करती हैं।
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    पूजा: वे एक चलनी (छलनी) के माध्यम से पहले चंद्रमा को देखती हैं और उसे अर्घ्य (जल) अर्पित करती हैं।
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    पति का दर्शन: इसके बाद, उसी छलनी से वे अपने पति का चेहरा देखती हैं।
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    प्रतीकात्मक अर्थ: छलनी का उपयोग प्रतीकात्मक है। ऐसा माना जाता है कि जैसे छलनी केवल सार को रखती है और बाकी चीजों को छान देती है, उसी तरह व्रती महिला चंद्रमा से केवल आशीर्वाद, शीतलता और सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करती है और अपने पति में भी केवल अच्छाइयों को देखती है।
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कैसे खोला जाता है व्रत?
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चंद्रमा की पूजा के बाद, पति अपनी पत्नी को अपने हाथों से पानी का पहला घूंट पिलाकर और मिठाई का पहला टुकड़ा खिलाकर उसका व्रत खोलता है। इसके बाद परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह पल पति-पत्नी के रिश्ते में एक नई ऊर्जा और प्रेम का संचार करता है।
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