नई दिल्ली/बिजनेस डेस्क: आजकल पेट्रोल पंपों पर E-20 (यानी 20% इथेनॉल मिक्स पेट्रोल) को लेकर काफी चर्चा है। कुछ लोग माइलेज और इंजन को लेकर शिकायतें कर रहे हैं, तो वहीं विपक्ष भी इसे लेकर सरकार को घेर रहा है। लेकिन, इन विवादों से इतर भारत सरकार ने एक ऐसा बड़ा कदम उठाया है, जो सीधे तौर पर देश की करोड़ों महिलाओं और आम आदमी की जेब को बड़ी राहत देने वाला है।READ ALSO:-फैक्ट चेक: क्या नए नियमों से बंद हो जाएंगे 11 करोड़ टीवी और 6 गुना महंगा होगा केबल-DTH? जानें सोशल मीडिया पर वायरल दावे का पूरा सच
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पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय अब महंगे एलपीजी (LPG) गैस सिलेंडरों पर देश की निर्भरता कम करने के लिए 'इथेनॉल' (Ethanol) को सीधा आपकी किचन तक पहुंचाने की योजना पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने 25 मई 2026 को नागपुर में देश के पहले स्वदेशी 'हाइड्रो-इथेनॉल कुकिंग स्टोव' (Hydro-Ethanol Cooking Stove) का अनावरण किया है।
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आइए विस्तार से समझते हैं कि यह स्टोव क्या है, कैसे काम करता है और यह LPG सिलेंडर के मुकाबले आपके लिए कितना फायदेमंद साबित होगा।
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क्या है 'हाइड्रो-इथेनॉल कुकिंग स्टोव' और कैसे करता है काम?

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यह कोई आम चूल्हा नहीं है, बल्कि एक क्रांतिकारी स्वदेशी तकनीक है। सबसे खास बात यह है कि यह स्टोव सीधे लिक्विड इथेनॉल और पानी (Water) के मिश्रण से जलता है।
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    मिक्सिंग फॉर्मूला: इस स्टोव में ईंधन के रूप में पानी के साथ केवल 7% इथेनॉल मिक्स करके इस्तेमाल किया जाएगा।
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    कैसी होगी आंच? यह इथेनॉल और पानी का मिश्रण स्टोव में एलपीजी की ही तरह बिल्कुल 'नीली और तेज आंच' (Blue Flame) पैदा करता है, जिससे खाना बहुत तेजी से पकता है।
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हाइड्रो-इथेनॉल कुकिंग स्टोव के 5 बड़े फायदे (Benefits of Ethanol Stove)

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अगर यह स्टोव बाजार में आम लोगों के लिए उपलब्ध हो जाता है, तो इसके कई चौंकाने वाले फायदे होंगे:
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    रसोई का खर्च होगा आधा (Highly Cost-Effective): वर्तमान में रसोई गैस (LPG) का सिलेंडर काफी महंगा है। लेकिन, हाइड्रो-इथेनॉल स्टोव की रनिंग कॉस्ट (Running Cost) सामान्य LPG सिलेंडर से काफी कम होने का अनुमान है। इससे हर महीने मिडिल क्लास परिवारों के बजट में भारी बचत होगी।
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    ब्लास्ट होने का कोई खतरा नहीं (100% Safe): एलपीजी एक हाई-प्रेशर गैस है, जिसके सिलेंडर फटने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। लेकिन इथेनॉल एक लिक्विड (तरल) ईंधन है। इसलिए इस स्टोव में सिलेंडर फटने जैसा कोई डर नहीं रहता, जो इसे परिवारों और बच्चों के लिए बेहद सुरक्षित बनाता है।
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    महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए वरदान: लकड़ी या कोयले की तरह इथेनॉल से कोई धुआं या जहरीली गैस (Carbon Monoxide) नहीं निकलती। यह बिल्कुल साफ तरीके से जलता है। इससे महिलाओं का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है और घर का वातावरण भी शुद्ध बना रहता है।
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    बर्तन नहीं होंगे काले: इसकी शुद्ध नीली आंच के कारण बर्तनों की तली (Bottom) काली नहीं होती, जिससे महिलाओं को बर्तन मांजने और रसोई साफ रखने में काफी आसानी होगी।
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    किसानों की आय में बंपर इजाफा: इथेनॉल कोई फैक्ट्री का केमिकल नहीं है, बल्कि यह गन्ने, मक्के और सड़े हुए अनाज (Agricultural Products) से बनाया जाता है। अगर किचन में इथेनॉल की मांग बढ़ेगी, तो इसका सीधा फायदा देश के किसानों (Annadata) को होगा और उनकी आय बढ़ेगी।
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भारत में इथेनॉल का उत्पादन (Production) कितना है?

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शायद आपके मन में सवाल हो कि क्या हमारे पास इतना इथेनॉल है कि हम इसे रसोई में इस्तेमाल कर सकें? इसका जवाब है— हाँ!
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    'CareEdge' की मई की रिपोर्ट के अनुसार, देश का सालाना इथेनॉल प्रोडक्शन 20 बिलियन लीटर के पार पहुंच गया है। इस साल 4 बिलियन लीटर की अतिरिक्त क्षमता और जुड़ने वाली है।
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    खपत कहां-कहां है? सरकार के E20 (पेट्रोल ब्लेंडिंग) प्रोग्राम में करीब 11 बिलियन लीटर इथेनॉल खर्च होता है। दवा, शराब और केमिकल कंपनियों को करीब 3.5 बिलियन लीटर की जरूरत होती है।
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    रसोई के लिए रिजर्व: इन सबके बाद भी देश के पास हर साल करीब 7 बिलियन लीटर (700 करोड़ लीटर) इथेनॉल अतिरिक्त बच जाता है। सरकार इसी बचे हुए इथेनॉल का उपयोग किचन फ्यूल (Kitchen Fuel) के रूप में करना चाहती है। भारत नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों को इथेनॉल एक्सपोर्ट करने पर भी विचार कर रहा है।
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क्यों एलपीजी (LPG) छोड़ना चाहता है भारत?

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भारत को एलपीजी का विकल्प तलाशने की सख्त जरूरत इसलिए है क्योंकि यह हमारी अर्थव्यवस्था पर एक बहुत बड़ा बोझ है:
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    आयात पर भारी निर्भरता: भारत अपनी कुल एलपीजी खपत (सालाना 3.3 करोड़ टन) का लगभग 60 से 65% हिस्सा विदेश से आयात (Import) करता है।
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    खाड़ी देशों पर निर्भरता: हम अपनी जरूरत का 90% हिस्सा सऊदी अरब, UAE, कतर और ओमान से मंगाते हैं।
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    संकट का डर: हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्ष के कारण मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) से गैस की सप्लाई में बाधा आ गई थी, जिससे भारत में एलपीजी का संकट (LPG Crisis) खड़ा हो गया था। मजबूरी में भारत को अमेरिका से 10 लाख मीट्रिक टन का रिकॉर्ड एलपीजी आयात करना पड़ा।
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24 अरब डॉलर (2 लाख करोड़ रुपये) की होगी महा-बचत

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इथेनॉल के प्रयोग से भारत ऊर्जा के क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर' (Atmanirbhar) बन सकता है और विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) की भारी बचत कर सकता है। फरवरी में 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' द्वारा जारी एक रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यदि भारत ई-कुकिंग, बायोगैस और इथेनॉल स्टोव का प्रयोग तेजी से बढ़ाता है, तो वह साल 2050 तक एलपीजी पर दी जाने वाली सब्सिडी के 2 लाख करोड़ रुपये (लगभग 24 अरब डॉलर) से ज्यादा बचा सकता है। यह पैसा देश के बुनियादी ढांचे के विकास में काम आएगा।
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नितिन गडकरी द्वारा पेश किया गया यह 'हाइड्रो-इथेनॉल कुकिंग स्टोव' केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का एक मजबूत हथियार है। हालांकि, इसे हर घर तक पहुंचाने के लिए सरकार को इथेनॉल की आसान रिटेल सप्लाई चेन (सप्लाई नेटवर्क) तैयार करनी होगी। अगर यह योजना सफल होती है, तो यह देश की इकॉनमी और आम आदमी की रसोई, दोनों के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।
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