नई दिल्ली: भारत दुनिया के उन देशों में शुमार है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों (पेट्रोल, डीजल और एलपीजी) का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात (Import) करते हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें बढ़ती हैं या वैश्विक सप्लाई चेन में कोई रुकावट आती है, तो भारत में सीधा असर आम आदमी की रसोई और उसके सफर पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल के मामले में सरकार ने विदेशी निर्भरता कम करने के लिए 'इथेनॉल ब्लेंडिंग' (Ethanol Blending) का सफल प्रयोग किया है। अब इसी तर्ज पर सरकार रसोई गैस (LPG) के लिए एक नया 'गेमचेंजर' रोडमैप तैयार कर रही है।READ ALSO:-महंगाई का 'ट्रिपल अटैक'! दिल्ली-एनसीआर में सीएनजी की कीमतों में लगी आग, नोएडा में ₹90 के करीब पहुंचे दाम
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
आने वाले समय में आपके घर पहुंचने वाले लाल रंग के एलपीजी सिलेंडर में सिर्फ 100% एलपीजी नहीं होगी, बल्कि इसमें एक खास तरह का सिंथेटिक फ्यूल मिलाया जाएगा, जिसे डाईमिथाइल ईथर (Dimethyl Ether या DME) कहा जाता है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) ने हाल ही में एलपीजी और डाईमिथाइल ईथर की ब्लेंडिंग (मिश्रण) को लेकर स्टैंडर्ड जारी कर दिए हैं। माना जा रहा है कि यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और आम जनता को किफायती ईंधन मुहैया कराने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आखिर क्या है Dimethyl Ether (DME)?

\r\n\r\n
डाईमिथाइल ईथर (DME) एक रंगहीन गैस है, जिसे एक बेहतरीन 'सिंथेटिक फ्यूल' (Synthetic Fuel) माना जाता है। रसायन विज्ञान की भाषा में इसका फॉर्मूला CH3OCH3 होता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
सबसे खास बात यह है कि DME की विशेषताएं काफी हद तक एलपीजी (LPG) जैसी ही होती हैं। इसे आसानी से लिक्विड (तरल) रूप में बदला जा सकता है और इसे एलपीजी के साथ मिलाना तकनीकी रूप से संभव है।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    कैसे बनता है DME? इसे कोयला (Coal), प्राकृतिक गैस (Natural Gas) या बायोमास (Biomass) से कृत्रिम रूप से (Synthetically) तैयार किया जा सकता है। भारत के पास कोयले और बायोमास का विशाल भंडार है, इसलिए देश में ही इसका उत्पादन भारी मात्रा में किया जा सकता है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    पर्यावरण के अनुकूल: यह एलपीजी के मुकाबले ज्यादा साफ जलता है और इससे हानिकारक गैसों (Emissions) का उत्सर्जन भी कम होता है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

क्या है सरकार का 'DME ब्लेंडिंग' रोडमैप?

\r\n\r\n
जिस तरह से भारत सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा है, ठीक उसी तरह एलपीजी में भी डाईमिथाइल ईथर मिलाने का रोडमैप तैयार किया जा रहा है।
\r\n\r\n
 
\r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n
\r\n
ब्लेंडिंग का पैमाना
\r\n
\r\n
विवरण (Details)
\r\n
\r\n
प्रस्तावित मिश्रण दर
\r\n
\r\n
भविष्य में एलपीजी में 10% से 20% तक DME मिलाया जा सकता है।
\r\n
\r\n
मानक (Standards)
\r\n
\r\n
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) ने ब्लेंडिंग के सेफ्टी और क्वालिटी स्टैंडर्ड जारी कर दिए हैं।
\r\n
\r\n
उद्देश्य
\r\n
\r\n
एलपीजी की कुल लागत (Cost) कम करना और निर्बाध घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना।
\r\n
\r\n
कच्चा माल
\r\n
\r\n
इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से घरेलू कोयले और बायोमास का इस्तेमाल किया जाएगा।
\r\n
\r\n\r\n
 
\r\n\r\n

भारत को इस नई नीति की सख्त जरूरत क्यों पड़ी?

\r\n\r\n
इस ब्लेंडिंग योजना के पीछे सबसे बड़ा कारण अर्थशास्त्र (Economics) और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) है:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

1. कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता (Import Dependency):

\r\n\r\n
एलपीजी (Liquefied Petroleum Gas) सीधे तौर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की रिफाइनिंग से प्राप्त होती है। जब-जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड आयात में रुकावट आती है (जैसे मिडिल-ईस्ट में तनाव या रूस-यूक्रेन युद्ध), तो एलपीजी की घरेलू आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित होती है और इसके दाम आसमान छूने लगते हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

2. विदेशी मुद्रा की भारी बचत:

\r\n\r\n
अगर सरकार एलपीजी में 20 प्रतिशत तक घरेलू स्तर पर तैयार किया गया Dimethyl Ether मिलाने में सफल हो जाती है, तो इसका सीधा मतलब है कि भारत को 20 प्रतिशत कम एलपीजी विदेशों से खरीदनी पड़ेगी। इससे हर साल अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा बचेगी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

3. आम आदमी को मिलेगी 'किफायती गैस':

\r\n\r\n
चूंकि DME का उत्पादन घरेलू स्तर पर होगा और यह एलपीजी के मुकाबले सस्ता पड़ेगा, इसलिए ब्लेंडिंग के बाद एलपीजी सिलेंडर की कुल लागत (Production Cost) में कमी आएगी। उम्मीद है कि भविष्य में इसका सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं को सिलेंडर की घटी हुई कीमतों के रूप में मिलेगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

विशेषज्ञों की कड़ी चेतावनी: "जल्दबाजी नहीं, ठोस रिसर्च है जरूरी"

\r\n\r\n
हालांकि यह योजना कागजों पर बहुत शानदार और किफायती नजर आ रही है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के कई दिग्गज विशेषज्ञों ने इस नीति को लेकर सरकार को सावधान भी किया है। जाने-माने ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का मानना है कि Dimethyl Ether का इस्तेमाल अभी अपने बेहद प्रारंभिक चरण (Early Stage) में है। इसे लागू करने से पहले व्यापक तकनीकी और आर्थिक मूल्यांकन (Economic Evaluation) आवश्यक है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

विशेषज्ञों ने निम्नलिखित प्रमुख चुनौतियों की ओर इशारा किया है:

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    तकनीकी शोध की कमी (Lack of Technical Research):
    \r\n\r\n
    एलपीजी और Dimethyl Ether का एक साथ संचालन कैसे किया जाएगा, इस पर अभी ठोस तकनीकी शोध (Solid Technical Research) होना बाकी है। दोनों गैसों के मिश्रण का दबाव (Pressure) और तापमान (Temperature) अलग-अलग परिस्थितियों में कैसे काम करेगा, यह जाँचना बेहद जरूरी है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    सिलेंडर और वाल्व की सुरक्षा (Cylinder Safety):
    \r\n\r\n
    DME की रासायनिक प्रकृति (Chemical Nature) एलपीजी से थोड़ी अलग होती है। विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या मौजूदा एलपीजी सिलेंडरों के रबर सील, वाल्व और गैस पाइप DME के संपर्क में आने पर सुरक्षित रहेंगे? कहीं यह केमिकल सिलेंडरों को अंदर से नुकसान (Corrosion) तो नहीं पहुंचाएगा?
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    उपभोक्ताओं के चूल्हे (Gas Stoves) पर असर:
    \r\n\r\n
    क्या एलपीजी में 20 प्रतिशत DME मिलाने के बाद लोगों को अपने घरों के गैस चूल्हे के बर्नर बदलने पड़ेंगे? अगर ऐसा होता है, तो पूरे देश में करोड़ों गैस चूल्हों को अपग्रेड करने का खर्च कौन उठाएगा?
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability):
    \r\n\r\n
    DME का उत्पादन प्लांट लगाने और ब्लेंडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में भारी निवेश की जरूरत होगी। सरकार को यह देखना होगा कि इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत कहीं DME से होने वाली बचत से ज्यादा न हो जाए।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
\r\n
"यह नीति निश्चित रूप से ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा और सकारात्मक कदम है। लेकिन कई सवाल ऐसे हैं जिनका समाधान होना अत्यंत आवश्यक है। जब तक इसके हर तकनीकी और आर्थिक पहलू पर गहराई से रिसर्च नहीं हो जाती, तब तक इसे आम जनता के लिए लागू करना सुरक्षित साबित नहीं होगा।" - ऊर्जा विशेषज्ञ
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आगे की राह क्या है?

\r\n\r\n
एलपीजी में Dimethyl Ether (DME) मिलाने की यह योजना निश्चित रूप से भारत के एनर्जी सेक्टर के लिए एक बड़ी क्रांति साबित हो सकती है। अगर यह रोडमैप सफल रहता है, तो पेट्रोल-डीजल की तरह ही रसोई गैस के मामले में भी भारत 'आत्मनिर्भरता' की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाएगा। हालांकि, ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) द्वारा स्टैंडर्ड जारी कर देना केवल इस लंबी यात्रा का पहला कदम है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अब तेल विपणन कंपनियों (Oil Marketing Companies) और पेट्रोलियम मंत्रालय को मिलकर इसके पायलट प्रोजेक्ट्स (Pilot Projects) शुरू करने होंगे। प्रयोगशालाओं में गहन परीक्षण और फील्ड ट्रायल के बाद ही यह सुनिश्चित हो सकेगा कि ब्लेंडिंग की यह नीति कितनी प्रभावी और सुरक्षित है। फिलहाल, आम आदमी को इस 'सिंथेटिक फ्यूल' वाले सस्ते सिलेंडर के लिए अभी कुछ सालों का और इंतजार करना पड़ सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें