कहावत है कि "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।" जब रास्ते बंद होने लगते हैं, तो इंसान नए रास्ते खोज ही लेता है। भारत के रणनीतिक खनिज क्षेत्र (Strategic Minerals Sector) में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। जिस कचरे को हम और आप बेकार समझकर फेंक देते हैं, भारत अब उसी कचरे के ढेर से अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा का 'भविष्य' तलाश रहा है。READ ALSO:-दिल्ली-मेरठ कनेक्टिविटी का 'महा-विस्फोट': रीयल एस्टेट में आया भूचाल, नौकरियों की लगी कतार; एनसीआर का नया 'ग्रोथ इंजन' बनकर उभरा मेरठ
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भारत बढ़ते “ई-वेस्ट” (Electronic Waste) सेक्टर से न केवल पैसा कमा रहा है, बल्कि वह हासिल कर रहा है जो आज के दौर में 'सोने' से भी ज्यादा कीमती है—लिथियम, कोबाल्ट और निकल। ये वे महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) हैं, जिनके बिना आधुनिक दुनिया की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आपकी जेब में रखे स्मार्टफ़ोन से लेकर सीमा पर तैनात फाइटर जेट (Ladaaku Jet) और सड़कों पर दौड़ती इलेक्ट्रिक कारों (Electric Cars) तक—सब कुछ इन्ही मिनरल्स पर निर्भर है。
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एएफपी (AFP) की एक विस्तृत रिपोर्ट और उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अब जमीन के नीचे की खदानों के बजाय, जमीन के ऊपर जमा हो रहे ई-वेस्ट के पहाड़ों को खोदना शुरू कर दिया है। इसे नाम दिया गया है—'अर्बन माइनिंग' (Urban Mining)。
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इस विस्तृत रिपोर्ट में, हम समझेंगे कि कैसे भारत बेकार बैटरीज और पुराने हार्ड डिस्क से 'सफेद सोना' निकाल रहा है, सरकार की नीतियां इसमें कैसे मदद कर रही हैं, और सीलमपुरी की तंग गलियों से लेकर हरियाणा की हाई-टेक लैब तक यह सफर कैसे तय हो रहा है।
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'सफेद सोने' की खोज - हरियाणा की लैब से आंखों देखा हाल

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इस क्रांति को समझने के लिए हमें हरियाणा राज्य में स्थित एक्सिगो रीसाइक्लिंग (Exigo Recycling) के विशाल प्लांट का रुख करना होगा। यहाँ जो हो रहा है, वह किसी विज्ञान की किताब के जादू से कम नहीं है。
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काले पाउडर से सफेद सोने तक का सफर

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उत्तर भारत के इस प्लांट में सैकड़ों बेकार और खराब हो चुकी बैटरीज लाई जाती हैं। ये वो बैटरीज हैं जो अब ई-स्कूटर या लैपटॉप चलाने लायक नहीं रहीं।
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    क्रशिंग (Crushing): सबसे पहले एक विशाल मशीन इन ई-स्कूटर की बैटरीज को क्रश करती है और उन्हें एक 'काले पाउडर' (Black Powder) में बदल देती है। देखने में यह केवल राख लगती है, लेकिन इसमें भविष्य का ईंधन छिपा है。
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    केमिकल प्रोसेस: इसके बाद, इस मटीरियल को विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है। इसे एक वाइन-रेड लिक्विड (Wine-red liquid) में बदला जाता है。
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    फिल्टरेशन और इवैपोरेशन: इस लिक्विड को फिल्टर किया जाता है और फिर इवैपोरेट (वाष्पीकृत) किया जाता है。
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    अंतिम उत्पाद: अंत में जो बचता है, वह है एक महीन 'सफेद पाउडर'।
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फैसिलिटी के लीड साइंटिस्ट जब ट्रे में इस फाइनल प्रोडक्ट को इकट्ठा होते हुए देखते हैं, तो उनकी आँखों में चमक आ जाती है। वे इसे "व्हाइट गोल्ड" (सफेद सोना) कहते हैं। तकनीकी भाषा में यह लिथियम (Lithium) है—वह तत्व जिस पर आज पूरी दुनिया की ऑटोमोबाइल और टेक इंडस्ट्री टिकी हुई है。
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भारत को ई-वेस्ट की जरूरत क्यों पड़ी? (द स्ट्रेटेजिक शिफ्ट)

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सवाल यह उठता है कि भारत अचानक कचरे से मिनरल्स निकालने पर इतना जोर क्यों दे रहा है? इसके पीछे दो बड़े कारण हैं: मांग में विस्फोट और संसाधनों की कमी।
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1. 100% आयात निर्भरता (Import Dependency)

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इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (Institute for Energy Economics and Financial Analysis) की एक रिपोर्ट के अनुसार, लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे जरूरी मिनरल्स के लिए भारत की "100 परसेंट इम्पोर्ट डिपेंडेंसी" है。 यानी, अगर चीन या अन्य देश सप्लाई रोक दें, तो भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स और ईवी सेक्टर ठप पड़ सकता है।
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2. घरेलू माइनिंग में देरी

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विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही भारत में लिथियम के भंडार मिले हों, लेकिन घरेलू माइनिंग से "सार्थक उत्पादन" (Meaningful Production) शुरू होने में अभी कम से कम एक दशक (10 साल) का समय लगेगा। मांग में तेजी से बढ़ोतरी की उम्मीद और घरेलू खदानों से तत्काल राहत न मिलने की वजह से भारत ने ई-वेस्ट की ओर रुख किया。
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3. ई-वेस्ट का पहाड़

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दूसरी ओर, भारत में ई-वेस्ट के पहाड़ खड़े हो रहे हैं। इन पहाड़ों में पुराने लैपटॉप, फोन और हार्ड डिस्क (Hard Disks) दबे हैं। हार्ड डिस्क में 'रेयर अर्थ्स' (Rare Earths) काफी मात्रा में होते हैं। यही कारण है कि ई-वेस्ट को लंबे समय से जरूरी मिनरल्स के लिए "सोने की खान" कहा जाता रहा है。 भारत ने अब इसी खान को खोदने का फैसला किया है।
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आंकड़ों का खेल - कचरा या खजाना?

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भारत में ई-वेस्ट की स्थिति क्या है, इसे समझने के लिए हमें आधिकारिक और अनौपचारिक आंकड़ों दोनों पर नजर डालनी होगी।
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    1.5 मिलियन टन: ऑफिशियल डेटा के मुताबिक, पिछले साल भारत में लगभग 1.5 मिलियन टन ई-वेस्ट पैदा हुआ。
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    200,000 ट्रक: यह मात्रा इतनी अधिक है कि इससे 200,000 कचरा ट्रक भरे जा सकते हैं。
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    असली आंकड़ा: हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि असली आंकड़ा इससे दोगुना होने की संभावना है, क्योंकि बहुत सा कचरा रिकॉर्ड में ही नहीं आता。
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6 बिलियन डॉलर की इंडस्ट्री

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इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि "अर्बन माइनिंग"—यानी ई-वेस्ट से मिनरल्स की रिकवरी—की कीमत हर साल 6 बिलियन डॉलर तक हो सकती है。 हालांकि यह भारत की अनुमानित विशाल डिमांड को पूरा करने के लिए काफी नहीं है, लेकिन एनालिस्ट्स का कहना है कि यह एक महत्वपूर्ण 'बफर' का काम करेगा। यह इम्पोर्ट के झटकों को झेलने और देश की सप्लाई चेन को मजबूत करने में मदद कर सकता है。
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सरकार की 'EPR' नीति - गेम चेंजर

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इस क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। पिछले साल जरूरी मिनरल्स की फॉर्मल रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए 170 मिलियन डॉलर के प्रोग्राम को मंजूरी दी गई थी। इस प्रोग्राम की रीढ़ है—EPR (Extended Producer Responsibility)。
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क्या है EPR?

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EPR नियमों के तहत, इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने वाली कंपनियों (मैन्युफैक्चरर्स) की यह जिम्मेदारी तय की गई है कि वे अपने उत्पादों का कचरा (ई-वेस्ट) इकट्ठा करें और उसे सरकार में रजिस्टर्ड रीसाइकलर्स को दें। यानी, जिसने कचरा बनाया, वही उसे निपटाने की व्यवस्था भी करेगा。
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फॉर्मल सेक्टर पर प्रभाव

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एक्सिगो रीसाइक्लिंग के मैनेजिंग डायरेक्टर रमन सिंह का कहना है कि "EPR ने रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री को स्केल पर लाने में एक मुख्य कैटलिस्ट (उत्प्रेरक) का काम किया है।" एक्सिगो उन चुनिंदा भारतीय फैसिलिटीज़ में से एक है जो लिथियम निकालने में सक्षम है。
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एटेरो रीसाइक्लिंग (Attero Recycling), जो भारत की एक और प्रमुख कंपनी है, का दावा है कि वह ई-वेस्ट से कम से कम 22 ज़रूरी मिनरल्स को रिकवर कर सकती है。 कंपनी के नितिन गुप्ता ने एएफपी की रिपोर्ट में बताया कि EPR के पूरी तरह लागू होने से पहले, 99 फीसदी ई-वेस्ट इनफॉर्मल सेक्टर में रीसाइकिल किया जा रहा था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। एटेरो का दावा है कि लगभग 60 परसेंट ई-वेस्ट अब फॉर्मल सेक्टर में आ गया है。
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सीलमपुरी की गलियां और इनफॉर्मल सेक्टर का स्याह सच

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भले ही सरकारी आंकड़े और बड़ी कंपनियां बदलाव का दावा कर रही हों, लेकिन जमीनी हकीकत अभी भी पूरी तरह नहीं बदली है। इसका जीता-जागता सबूत है दिल्ली का सीलमपुरी इलाका。
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सीलमपुरी एक कम इनकम वाला इलाका है, जो भारत के सबसे बड़े इनफॉर्मल ई-वेस्ट हब (Informal E-waste Hub) में से एक है। यहाँ की पतली गलियां उलझे हुए केबल, टूटे हुए मदरबोर्ड और पुराने डिवाइस से पटी पड़ी हैं。
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'असली माल तो हमारे पास आता है'

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एक लोकल ट्रेडर शब्बीर खान ने मीडिया रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा, "नई कंपनियां सिर्फ सर्टिफ़िकेशन के लिए काफी सामान रखती हैं, लेकिन बाकी (असली कचरा) हमारे पास आता है। बिजनेस बढ़ा है… कम नहीं हुआ है।"。
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यह बयान उन दावों पर सवाल उठाता है कि 60% कचरा फॉर्मल हो गया है। आलोचकों और यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) के एक नोट (अक्टूबर) के अनुसार, भारत का 80 फीसदी से ज़्यादा ई-वेस्ट अभी भी इनफॉर्मल तरीके से प्रोसेस किया जाता है。
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इनफॉर्मल रीसाइक्लिंग के खतरे

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सस्टेनेबल इलेक्ट्रॉनिक्स रीसाइक्लिंग इंटरनेशनल के सीनियर एडवाइजर संदीप चटर्जी कहते हैं कि भारत का ज्यादातर ई-वेस्ट अभी भी इनफॉर्मल चैनलों से बहता है, जिससे "ज़रूरी मिनरल्स का नुकसान" होता है。
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    तकनीक का अभाव: इनफॉर्मल सेक्टर केवल कॉपर और एल्युमीनियम जैसे आसानी से बिकने वाले मेटल्स निकालता है। उनके पास लिथियम या कोबाल्ट निकालने की तकनीक नहीं होती, जिससे ये कीमती मिनरल्स बर्बाद हो जाते हैं。
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    सेहत और पर्यावरण को खतरा: भारत सरकार के थिंक-टैंक नीति आयोग ने चेतावनी दी है कि इनफॉर्मल रीसाइक्लिंग खतरों से भरी हुई है। इसमें "एसिड बाथ" (Acid Bath), खुले में जलाना और बिना सुरक्षा के तोड़ना-फोड़ना शामिल है। यह वर्कर्स को जहरीले धुएं के संपर्क में लाता है और मिट्टी व पानी को गंदा करता है。
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चुनौतियां - चीन और यूरोप से मुकाबला

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भारत की कोशिशें सराहनीय हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
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    सीमित क्षमता: चीन और यूरोपियन यूनियन (EU) की तुलना में भारत की फॉर्मल रीसाइक्लिंग कैपेसिटी (Formal Recycling Capacity) अभी भी 'लिमिटेड' है。
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    निवेश की कमी: चीन और यूरोप ने एडवांस्ड रिकवरी टेक्नोलॉजी और 'ट्रेसेबिलिटी सिस्टम' (Traceability System) में भारी निवेश किया है, जिससे वे कचरे के एक-एक कण का हिसाब रख सकते हैं。 भारत को अभी इस स्तर पर पहुंचना बाकी है।
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भविष्य की राह और समाधान

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भारत एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ ई-वेस्ट का बढ़ता पहाड़ है जो प्रदूषण का खतरा है, और दूसरी तरफ उसी पहाड़ में छिपा 'सफेद सोना' है जो आत्मनिर्भर भारत की कुंजी है।
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विशेषज्ञ संदीप चटर्जी का सुझाव है कि हमें इनफॉर्मल सेक्टर को खत्म करने के बजाय उन्हें मुख्यधारा में लाना चाहिए। उन्होंने कहा, "भारत का इनफॉर्मल सेक्टर कचरा इकट्ठा करने और छांटने की रीढ़ बना हुआ है।"。 जो कबाड़ फॉर्मल रीसाइकलर तक पहुंचता है, वह भी अक्सर पहले इनफॉर्मल हाथों से ही गुजरता है。
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अगर इनफॉर्मल कबाड़ बीनने वालों (Ragpickers) और छोटी वर्कशॉप्स को एक 'ट्रेसेबल सप्लाई चेन' में जोड़ दिया जाए, तो 'सॉर्टिंग और डिसमेंटलिंग स्टेज' पर कीमती जरूरी मिनरल्स का नुकसान काफी कम हो सकता है。
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भारत की यह यात्रा—कचरे से कंचन (सोना) बनाने की यात्रा—न केवल आर्थिक है, बल्कि रणनीतिक भी है। अगर एक्सिगो और एटेरो जैसी कंपनियां, सरकार की EPR नीति और सीलमपुरी के कबाड़ व्यापारी एक साथ मिलकर काम करें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के फाइटर जेट और इलेक्ट्रिक कारें भारत के ही कचरे से निकले 'क्रिटिकल मिनरल्स' से संचालित होंगी。
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तथ्य पत्र (Fact Sheet) - एक नज़र में

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विवरण
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जानकारी
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वार्षिक ई-वेस्ट (भारत)
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1.5 मिलियन टन (आधिकारिक) / 3 मिलियन टन (अनुमानित)
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संभावित आर्थिक मूल्य
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$6 बिलियन प्रति वर्ष
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रिकवर किए जाने वाले मिनरल्स
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लिथियम, कोबाल्ट, निकल, रेयर अर्थ्स
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प्रमुख चुनौतियां
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इनफॉर्मल रीसाइक्लिंग, तकनीक की कमी, इम्पोर्ट डिपेंडेंसी
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सरकारी पहल
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$170 मिलियन का प्रोग्राम, EPR नियम
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प्रमुख कंपनियां
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Exigo Recycling, Attero Recycling
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उपयोग
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स्मार्टफोन, EV बैटरीज, डिफेंस इक्विपमेंट (लड़ाकू जेट)
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आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम

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भारत का ई-वेस्ट से 'सोना' निकालने का यह अभियान केवल आर्थिक लाभ के लिए नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक सुरक्षा का भी सवाल है। चीन और यूरोपीय संघ ने रिकवरी टेक्नोलॉजी में भारी निवेश किया है, और भारत अब उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
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अगर भारत अपने ई-वेस्ट का 100% वैज्ञानिक तरीके से रीसाइकिल करने में सफल हो जाता है, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी इलेक्ट्रिक गाड़ियां और फाइटर जेट्स हमारे ही कचरे से निकले 'स्वदेशी' लिथियम और कोबाल्ट से चलेंगे। यह 'वेस्ट टू वेल्थ' (कचरे से कंचन) की दिशा में भारत की सबसे बड़ी छलांग होगी।
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\r\nDisclaimer: यह रिपोर्ट एएफपी (AFP), नीति आयोग, और उद्योग विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध कराए गए डेटा और बयानों पर आधारित है। आंकड़ों में बदलाव संभव है।
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