नई दिल्ली: आज के समय में प्लास्टिक हमारे जीवन का एक ऐसा हिस्सा बन चुका है जिसे पूरी तरह से अलग करना मुश्किल है। लेकिन, सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब यह प्लास्टिक अदृश्य रूप से हमारे भोजन (Food) में प्रवेश कर जाता है। हाल के वर्षों में दुनिया भर में कई वैज्ञानिक शोधों ने दावा किया है कि इंसान अनजाने में हर हफ्ते एक क्रेडिट कार्ड के बराबर 'माइक्रोप्लास्टिक' (Microplastics) निगल रहा है।READ ALSO:-एलपीजी गैस ग्राहकों के लिए महा-अलर्ट: 15 अगस्त तक ई-केवाईसी नहीं कराया, तो छिन जाएगी सब्सिडी, कमर्शियल रेट पर मिलेगा सिलेंडर
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भारत में भी खाने-पीने की चीजों (नमक, चीनी, पानी, सीफूड आदि) में माइक्रोप्लास्टिक और नैनो-प्लास्टिक की मौजूदगी को लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। इसी गंभीर मुद्दे पर अब भारत सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए एक बड़ी घोषणा की है। सरकार ने संसद में बताया है कि भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने भारतीय खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की वैज्ञानिक जांच के लिए एक विशेष और विस्तृत प्रोजेक्ट शुरू किया है।
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FSSAI का 'स्पेशल प्रोजेक्ट': कौन-कौन से संस्थान हैं शामिल?
\r\n\r\nसंसद में एक सवाल के जवाब में सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया कि खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक के खतरों को लेकर FSSAI पूरी तरह से सजग है। चूंकि माइक्रोप्लास्टिक और नैनो-प्लास्टिक के कण इतने सूक्ष्म (5 मिलीमीटर से भी छोटे) होते हैं कि उन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता, इसलिए इनकी सटीक जांच के लिए उन्नत वैज्ञानिक तरीकों की आवश्यकता होती है।
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इस चुनौती से निपटने के लिए FSSAI ने देश के शीर्ष अनुसंधान संस्थानों के साथ हाथ मिलाया है। इस विशेष प्रोजेक्ट में निम्नलिखित संस्थान एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं:
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- \r\n CSIR-IITR (भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ)\r\n \r\n
- \r\n ICAR-CIFT (केंद्रीय मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान, कोच्चि)\r\n \r\n
- \r\n BITS Pilani (बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान)\r\n \r\n
क्या है इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य?
\r\n\r\nसरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, यह प्रोजेक्ट केवल एक सामान्य जांच नहीं है, बल्कि यह एक बहु-आयामी वैज्ञानिक अध्ययन (Multi-dimensional Scientific Study) है। इस अध्ययन के तहत मुख्य रूप से तीन बड़े काम किए जा रहे हैं:
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- \r\n नई जांच तकनीक विकसित करना (Developing Analytical Methods): भारत में अभी तक खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक का पता लगाने के लिए कोई सर्वमान्य, मानकीकृत परीक्षण प्रोटोकॉल नहीं है। यह प्रोजेक्ट सबसे पहले ऐसी विश्वसनीय तकनीक और स्टैंडर्ड तरीके विकसित करेगा जिससे भारतीय लैब में आसानी से इन सूक्ष्म कणों की पहचान की जा सके।\r\n \r\n
- \r\n खाद्य पदार्थों में मौजूदगी का आकलन: तकनीक विकसित होने के बाद, देश भर के अलग-अलग हिस्सों से विभिन्न खाद्य पदार्थों (जैसे— पैकेज्ड फूड, समुद्री भोजन, नमक, चीनी, पानी आदि) के सैंपल लिए जाएंगे और उनमें माइक्रो/नैनो-प्लास्टिक की मात्रा (Prevalence) का पता लगाया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n एक्सपोज़र का अध्ययन (Exposure Assessment): वैज्ञानिक यह भी अध्ययन करेंगे कि एक आम भारतीय नागरिक अपने दैनिक आहार के माध्यम से कितनी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आ रहा है और क्या यह मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।\r\n \r\n
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फूड पैकेजिंग के लिए सरकार के क्या हैं नियम?
\r\n\r\nखाने में प्लास्टिक मुख्य रूप से खराब क्वालिटी की पैकेजिंग (Food Packaging) के जरिए आता है। गर्म खाना जब घटिया प्लास्टिक के संपर्क में आता है, तो प्लास्टिक के रसायन और सूक्ष्म कण भोजन में घुल जाते हैं।
\r\n\r\n\r\n\r\nइस पर सफाई देते हुए सरकार ने बताया कि भारत में खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग के लिए पहले से ही सख्त नियम लागू हैं:
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- \r\n फूड-ग्रेड पैकेजिंग अनिवार्य: FSSAI के नियमों के तहत, खाद्य व्यवसाय संचालकों (FBOs) के लिए यह अनिवार्य है कि वे भोजन को पैक करने के लिए केवल 'फूड-ग्रेड' (Food-grade) पैकेजिंग सामग्री का ही उपयोग करें।\r\n \r\n
- \r\n BIS मानकों का कड़ाई से पालन: सरकार ने स्पष्ट किया है कि पैकेजिंग सामग्री को भारतीय मानक ब्यूरो (BIS - Bureau of Indian Standards) द्वारा निर्धारित कड़े मानकों (Standards) को पूरा करना होता है। किसी भी तरह के जहरीले या नॉन-फूड ग्रेड प्लास्टिक का इस्तेमाल पूर्णतया प्रतिबंधित है।\r\n \r\n
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क्या भारत में अभी माइक्रोप्लास्टिक मिलने का कोई आंकड़ा है?
\r\n\r\nसरकार से जब यह पूछा गया कि क्या अब तक भारतीय खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक पाए जाने के मामलों का कोई आधिकारिक डेटा मौजूद है?
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इस पर सरकार ने स्पष्ट जवाब देते हुए कहा कि, "अब तक (इस सवाल के जवाब के समय तक) सरकार या FSSAI की ओर से खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक मिलने के मामलों का कोई आधिकारिक, समेकित आंकड़ा (Data) सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया गया है।"
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सरकार का यह जवाब इस बात की ओर इशारा करता है कि चूंकि अभी तक जांच की मानकीकृत पद्धति (Standardized testing methodology) ही उपलब्ध नहीं थी, इसलिए पुख्ता आंकड़े भी जमा नहीं किए जा सके। लेकिन FSSAI द्वारा शुरू किए गए इस नए प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद, जल्द ही भारत के पास अपना खुद का वैज्ञानिक डेटाबेस होगा।
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सेहत के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?
\r\n\r\nवैज्ञानिकों का मानना है कि शरीर में जाने वाला माइक्रोप्लास्टिक हमारे खून, फेफड़ों और यहां तक कि प्लेसेंटा (गर्भनाल) तक में प्रवेश कर सकता है। इससे सूजन, कैंसर का खतरा और हार्मोनल असंतुलन जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। FSSAI द्वारा CSIR और ICAR के साथ मिलकर उठाया गया यह कदम भारत की खाद्य सुरक्षा के इतिहास में एक 'मील का पत्थर' साबित होगा। इस अध्ययन की रिपोर्ट आने के बाद, भविष्य में पैकेज्ड फूड को लेकर और भी सख्त नियम बनाए जाने की उम्मीद है।


Sabse pehle comment karne wale banein.