बिजनौर (स्पेशल ग्राउंड रिपोर्ट): भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में 'गौमाता' (Cow) का स्थान सर्वोच्च माना गया है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सत्ता में आते ही जिस एक मुद्दे पर सबसे ज्यादा जोर दिया था, वह था— गोवंश का संरक्षण और किसानों को छुट्टा जानवरों की समस्या से निजात दिलाना। सरकार के इस विजन को जमीनी स्तर पर कितनी ईमानदारी से लागू किया जा रहा है, इसका एक बेहतरीन और जीवंत उदाहरण बिजनौर जिले के नूरपुर विकास खंड में देखने को मिला है।
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शुक्रवार, 27 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग (UP Goseva Aayog), लखनऊ के माननीय सदस्य श्री दीपक गोयल ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत नूरपुर ब्लॉक की ग्राम पंचायत मिर्जापुर ढीकली में संचालित 'अस्थाई गो आश्रय स्थल' (Temporary Cow Shelter) का औचक निरीक्षण किया।READ ALSO:-मेरठ के रामराज मर्डर केस की 'इनसाइड स्टोरी': बिना तलाक प्रेमी सुनील 'गाबा' के साथ रह रही थी पूनम, हत्यारे पति को जेल; मीडिया के सामने फूट-फूटकर रोई पत्नी
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अक्सर सरकारी गोशालाओं को लेकर अव्यवस्थाओं की खबरें सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन मिर्जापुर ढीकली की इस गोशाला ने गोसेवा आयोग के सदस्य सहित सभी अधिकारियों को सुखद आश्चर्य में डाल दिया। आइए, इस निरीक्षण के दौरान सामने आए हर एक पहलू, गोवंश के आहार प्रबंधन और प्रशासनिक टीम की मेहनत का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
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1. निरीक्षण का मुख्य घटनाक्रम: क्या-क्या मिला गोशाला में? (The Ground Zero Report)

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जब यूपी गोसेवा आयोग के सदस्य दीपक गोयल अपनी टीम के साथ मिर्जापुर ढीकली के अस्थाई गो आश्रय स्थल पहुंचे, तो उनका मुख्य उद्देश्य यह जाँचना था कि क्या सरकारी फंड का सही इस्तेमाल हो रहा है और क्या बेजुबान गोवंश को कड़कड़ाती ठंड और बदलते मौसम में सही आश्रय मिल रहा है या नहीं।
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112 गोवंशों का सुरक्षित आशियाना

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निरीक्षण के दौरान सबसे पहले गोशाला में मौजूद जानवरों की गिनती (Headcount) की गई। रजिस्टर में दर्ज आंकड़ों और मौके पर मौजूद जानवरों का मिलान किया गया। जांच में गो आश्रय स्थल के अंदर कुल 112 गोवंश (Bovines) पूरी तरह से संरक्षित और सुरक्षित पाए गए। सभी गोवंश स्वस्थ नजर आ रहे थे और किसी भी जानवर में कुपोषण या बीमारी के गंभीर लक्षण नहीं देखे गए।
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आहार प्रबंधन (Nutritional Management): भूसा, हरा चारा और गुड़-चोकर

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किसी भी गोशाला की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वहां जानवरों को पेट भर और पौष्टिक भोजन मिल रहा है या नहीं। आयोग के सदस्य दीपक गोयल ने जब चारे के गोदाम और नांद (Feeding Troughs) का निरीक्षण किया, तो वहां व्यवस्थाएं चाक-चौबंद मिलीं:
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    सूखा भूसा और हरा चारा: गोवंश के लिए पर्याप्त मात्रा में सूखा भूसा और हरा चारा (Green Fodder) उपलब्ध था। हरा चारा दुधारू और कमजोर गायों के पाचन तंत्र को मजबूत रखने के लिए बेहद जरूरी होता है।
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  • \r\n
    गुड़ और चोकर (Jaggery & Bran): सर्दियों के जाते-जाते और बदलते मौसम में गायों के शरीर का तापमान नियंत्रित रखने और उन्हें ऊर्जा देने के लिए गुड़ एक संजीवनी का काम करता है। वहीं, चोकर (Bran) उनके वजन और दूध (लैक्टेशन) को बढ़ाता है। निरीक्षण टीम को गोशाला के स्टॉक में गुड़ और चोकर प्रचुर मात्रा में मिला, जो यह दर्शाता है कि पंचायत स्तर पर गोवंश के 'डाइट चार्ट' का पूरी वैज्ञानिकता से पालन किया जा रहा है।
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स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था

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चारे के साथ-साथ साफ पानी भी पशुओं के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। गोशाला परिसर में गोवंशों के पीने के लिए साफ पानी की उचित व्यवस्था (Water Troughs) पाई गई। पानी की हौदियों (Tanks) को नियमित रूप से साफ किया जा रहा था ताकि पानी में काई या बैक्टीरिया न पनपें, जिससे गायों को जलजनित (Water-borne) बीमारियों से बचाया जा सके।
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2. जमीन पर काम करने वाले असली 'हीरो': केयरटेकर्स और साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल

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किसी भी सरकारी योजना को तब तक सफल नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि उसे जमीन पर लागू करने वाले कर्मचारियों में सेवा और समर्पण का भाव न हो। मिर्जापुर ढीकली गो आश्रय स्थल की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय वहां दिन-रात काम करने वाले केयरटेकर्स (Caretakers) को जाता है।
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निरीक्षण के दौरान गोशाला में गोवंशों की चौबीसों घंटे देखरेख, साफ-सफाई, गोबर उठाने और चारा-पानी देने के लिए 3 केयरटेकर मुस्तैद पाए गए। इनके नाम हैं:
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  1. \r\n
    सलाउद्दीन (Salauddin)
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  2. \r\n
  3. \r\n
    सायरा (Sayra)
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  5. \r\n
    शमशाद (Shamshad)
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गोसेवा में कोई धर्म नहीं होता

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इन तीनों केयरटेकर्स के नाम इस बात का एक बहुत बड़ा और खूबसूरत संदेश देते हैं कि 'गोसेवा' (Cow Service) किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है। मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सलाउद्दीन, सायरा और शमशाद जिस लगन और श्रद्धा के साथ इन 112 गोवंशों की सेवा कर रहे हैं, वह उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक सौहार्द (Communal Harmony) और मानवीय संवेदनाओं की एक बेहतरीन मिसाल है। बेजुबानों की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, और इन केयरटेकर्स ने अपनी मेहनत से गोशाला को एकदम चकाचक (Clean and Hygienic) रखा हुआ था।
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3. अधिकारियों की मुस्तैदी: प्रशासनिक टीम का शानदार समन्वय (Administrative Coordination)

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एक गोशाला को सफलतापूर्वक चलाने के लिए पंचायती राज विभाग और पशुपालन विभाग (Animal Husbandry Department) के बीच बेहतरीन तालमेल (Coordination) की आवश्यकता होती है। मिर्जापुर ढीकली में यह समन्वय साफ नजर आया।
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निरीक्षण के समय यूपी गोसेवा आयोग के सदस्य दीपक गोयल के साथ स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों के निम्नलिखित अधिकारी उपस्थित रहे, जिन्होंने गोशाला के हर पहलू की विस्तृत जानकारी दी:
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  • \r\n
    डॉ. विनय कुमार (Dr. Vinay Kumar), पशुपालन विभाग: इन्होंने गोवंश के स्वास्थ्य, टीकाकरण (Vaccination), ईयर-टैगिंग (Ear-tagging) और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण का ब्यौरा आयोग के समक्ष पेश किया।
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  • \r\n
  • \r\n
    नीरज कुमार (Neeraj Kumar), ग्राम पंचायत सचिव: गोशाला के लिए चारा खरीदने के टेंडर, फंड का आवंटन, केयरटेकर्स के मानदेय (Salary) का भुगतान और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी नीरज कुमार के कंधों पर है, जिसे वे बखूबी निभा रहे हैं।
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  • \r\n
  • \r\n
    चन्द्रपाल सिंह (Chandrapal Singh), पशुधन प्रसार अधिकारी: इन्होंने गोवंश की नस्ल सुधार और उनके भरण-पोषण के तकनीकी पहलुओं पर निरीक्षण टीम को जानकारी दी।
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  • \r\n
  • \r\n
    पंकज कुमार (Pankaj Kumar), रोजगार सेवक: मनरेगा (MGNREGA) के तहत गोशाला में बाउंड्री वॉल, शेड निर्माण और इंटरलॉकिंग जैसी बुनियादी ढांचागत सुविधाओं (Infrastructure) के विकास में रोजगार सेवक की अहम भूमिका रही है।
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  • \r\n
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दीपक गोयल ने इस पूरी टीम के सामूहिक प्रयासों (Teamwork) की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
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4. गोसेवा आयोग के सदस्य दीपक गोयल का बयान और दिशा-निर्देश

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निरीक्षण के बाद, माननीय सदस्य दीपक गोयल ने अपनी संतुष्टि जाहिर की। उन्होंने मीडिया और उपस्थित अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा:
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"मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का स्पष्ट विजन है कि प्रदेश का कोई भी गोवंश सड़क पर निराश्रित न घूमे और गोशालाओं में उन्हें घर जैसा माहौल मिले। आज मिर्जापुर ढीकली गो आश्रय स्थल की व्यवस्थाओं को देखकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई है। यहां हरा चारा, गुड़ और पीने के पानी का जो बेहतरीन प्रबंध किया गया है, वह पूरे बिजनौर जिले और प्रदेश की अन्य पंचायतों के लिए एक 'रोल मॉडल' (Role Model) है। मैं ग्राम पंचायत सचिव नीरज कुमार, डॉ. विनय कुमार और यहां के समर्पित केयरटेकर्स को इस उत्कृष्ट कार्य के लिए बधाई देता हूं।"
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इसके साथ ही, उन्होंने अधिकारियों को भविष्य के लिए कुछ कड़े दिशा-निर्देश (Directives) भी दिए:
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  1. \r\n
    निरंतरता बनाए रखें: चारे और पानी की जो बेहतरीन व्यवस्था आज मिली है, वह केवल निरीक्षण के दिन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि साल के 365 दिन यह निरंतर (Continuous) बनी रहनी चाहिए।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    गर्मी से बचाव की तैयारी: चूंकि अब सर्दियां खत्म हो रही हैं और गर्मियों का मौसम आ रहा है, इसलिए गोशाला में पर्याप्त शेड (Tin Sheds) और जरूरत पड़ने पर पंखों या फव्वारों (Cooling System) की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित कर ली जाए।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    संक्रामक रोगों से बचाव: आगामी महीनों में पशुओं में फैलने वाले संक्रामक रोगों (जैसे खुरपका-मुंहपका - FMD, या लंपी स्किन डिजीज - LSD) को लेकर पशुपालन विभाग अलर्ट रहे और समय से 100% टीकाकरण (Vaccination) पूरा कर लिया जाए।
    \r\n
  6. \r\n
  7. \r\n
    साफ-सफाई: गोबर का समय पर उठान हो ताकि गोशाला में कीचड़ या मक्खी-मच्छर न पनपें।
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  8. \r\n
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5. मैक्रो एनालिसिस: उत्तर प्रदेश सरकार की 'निराश्रित गोवंश नीति' और इसके दूरगामी प्रभाव

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बिजनौर के इस छोटे से गांव मिर्जापुर ढीकली की गोशाला की सफलता केवल एक स्थानीय खबर नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश सरकार की उस 'मैक्रो-पॉलिसी' (Macro-Policy) का एक सफल 'माइक्रो-एग्जीक्यूशन' (Micro-Execution) है, जिसे 2017 के बाद से राज्य में लागू किया गया है।
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आइए समझते हैं कि अस्थाई गो आश्रय स्थलों के निर्माण से राज्य की अर्थव्यवस्था, किसानों और समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
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A. किसानों की फसलों की सुरक्षा (Protecting Agriculture)

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कुछ साल पहले तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश (जिसमें बिजनौर, मुरादाबाद, मेरठ शामिल हैं) में छुट्टा और निराश्रित गोवंश किसानों के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द बन चुके थे। ये बेसहारा पशु रात के अंधेरे में खेतों में घुसकर गेहूं, गन्ना और सरसों की लहलहाती फसलें बर्बाद कर देते थे। किसानों को अपनी फसलों को बचाने के लिए कड़कड़ाती ठंड में रात-रात भर खेतों में जागना पड़ता था।
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    मिर्जापुर ढीकली जैसे गो आश्रय स्थलों के बनने से इलाके के 112 गोवंश अब सुरक्षित चारदीवारी के अंदर हैं। इसका सीधा फायदा यह हुआ है कि नूरपुर ब्लॉक के सैकड़ों किसानों की फसलें अब सुरक्षित हैं, जिससे कृषि उपज (Agricultural Output) में इजाफा हो रहा है।
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B. सड़क दुर्घटनाओं में भारी कमी (Preventing Road Accidents)

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निराश्रित गोवंश अक्सर हाईवे और मुख्य मार्गों (जैसे बिजनौर-मुरादाबाद हाईवे) पर आ जाते थे, जिसके कारण रात के समय भयंकर सड़क दुर्घटनाएं होती थीं। इनमें न केवल बेजुबान गायों की जान जाती थी, बल्कि कई बाइक सवार और वाहन चालक भी मौत के मुंह में समा जाते थे। गोशालाओं में पशुओं के संरक्षण से इन प्राणघातक दुर्घटनाओं (Fatal Accidents) के ग्राफ में भारी गिरावट आई है।
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C. ग्रामीण रोजगार का सृजन (Rural Employment Generation)

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गोशालाएं सिर्फ गायों के रहने की जगह नहीं हैं, बल्कि ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy) को भी चला रही हैं।
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  • \r\n
    मिर्जापुर ढीकली गोशाला के माध्यम से सलाउद्दीन, सायरा और शमशाद जैसे स्थानीय ग्रामीणों को उनके ही गांव में स्थायी रोजगार (Employment) मिला है।
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  • \r\n
  • \r\n
    गोशाला के लिए हरा चारा, भूसा और चोकर भी स्थानीय किसानों से ही खरीदा जाता है, जिससे गांव का पैसा गांव के ही किसानों की जेब में जा रहा है।
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6. भविष्य की रूपरेखा: कैसे 'आत्मनिर्भर' बनेंगी ये गोशालाएं? (The Road to Self-Sustainability)

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गोसेवा आयोग और राज्य सरकार का अगला सबसे बड़ा लक्ष्य इन गो आश्रय स्थलों को केवल 'सरकारी फंड' पर निर्भर न रखकर इन्हें 'आत्मनिर्भर' (Self-Reliant) बनाना है। मिर्जापुर ढीकली जैसी गोशालाओं में भविष्य के लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं:
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1. गोबर से वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost from Cow Dung)

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112 गोवंश प्रतिदिन भारी मात्रा में गोबर देते हैं। इस गोबर को यूं ही फेंकने के बजाय, इसका उपयोग केंचुआ खाद (Vermicompost) बनाने में किया जा सकता है। यह जैविक खाद रासायनिक उर्वरकों (Urea/DAP) का एक बेहतरीन और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है। ग्राम पंचायत इस खाद को बेचकर गोशाला के लिए अतिरिक्त आय (Extra Income) अर्जित कर सकती है।
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2. गोबर गैस (Biogas Plants)

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सरकार की 'गोबरधन योजना' (Gobardhan Yojana) के तहत गोशाला परिसरों में बायोगैस प्लांट लगाए जा सकते हैं। इस गैस का उपयोग केयरटेकर्स के लिए खाना पकाने या गोशाला में जनरेटर के जरिए बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है।
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3. गो-मूत्र से प्राकृतिक कीटनाशक (Panchgavya and Natural Pesticides)

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आजकल 'प्राकृतिक खेती' (Natural Farming) का चलन तेजी से बढ़ रहा है। गो-मूत्र (Cow Urine) से 'जीवामृत' और 'नीमास्त्र' जैसे प्राकृतिक कीटनाशक बनाए जा सकते हैं। अगर गोशाला प्रशासन इन्हें बोतलों में पैक करके किसानों को बेचे, तो यह गोशाला के वित्तीय स्थायित्व (Financial Stability) के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।
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7. जन-भागीदारी (Public Participation): समाज का भी है दायित्व

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भले ही यूपी सरकार प्रति गोवंश भरण-पोषण के लिए रोजाना एक तय धनराशि (जैसे ₹50 प्रति गोवंश) ग्राम पंचायतों को जारी कर रही है, लेकिन इतनी महंगाई के दौर में केवल सरकारी फंड से गोशाला को विश्वस्तरीय बनाए रखना एक चुनौती है।
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गोसेवा आयोग के सदस्य दीपक गोयल ने भी अक्सर 'जन-भागीदारी' (Jan-Bhagidari) पर जोर दिया है। समाज के संपन्न लोगों, व्यापारियों और आम नागरिकों को चाहिए कि वे अपने जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ या अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि के अवसर पर मिर्जापुर ढीकली जैसी गोशालाओं में आएं। वे गोवंश को अपने हाथों से गुड़, हरा चारा और फल खिलाएं। गोशालाओं को दान (Donation) देना सिर्फ पुण्य का काम नहीं है, बल्कि यह हमारे पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को बचाने की एक अहम कड़ी है।
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एक उम्मीद भरी तस्वीर

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बिजनौर के नूरपुर ब्लॉक की मिर्जापुर ढीकली ग्राम पंचायत ने यह साबित कर दिया है कि अगर प्रशासनिक इच्छाशक्ति (Administrative Willpower), कर्मचारियों का समर्पण और सही नीतियां एक साथ मिल जाएं, तो किसी भी सरकारी योजना को 100% सफलता के साथ जमीन पर उतारा जा सकता है।
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ग्राम पंचायत सचिव नीरज कुमार का कुशल प्रबंधन, डॉ. विनय कुमार की मेडिकल निगरानी और सलाउद्दीन, सायरा व शमशाद जैसे केयरटेकर्स की निस्वार्थ सेवा ने इस गोशाला को पूरे उत्तर प्रदेश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण (Exemplary Model) बना दिया है। यूपी गोसेवा आयोग के सदस्य दीपक गोयल का यह औचक निरीक्षण न केवल इन कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाएगा, बल्कि यह बिजनौर जिले की अन्य पंचायतों को भी अपनी गोशालाओं की व्यवस्थाओं को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित करेगा।
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गौमाता की रक्षा और उनका संवर्धन एक समृद्ध और खुशहाल भारत की नींव है, और मिर्जापुर ढीकली से उठ रही यह उम्मीद की किरण निश्चित रूप से एक बहुत बड़े और सकारात्मक बदलाव का संकेत है।
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