बिजनौर के नजीबाबाद में रफूग्रान मस्जिद के पास ट्यूशन से लौट रही 7 वर्षीय बच्ची महिरा पर आवारा कुत्तों ने किया भयानक हमला। लहूलुहान बच्ची पूजा हॉस्पिटल में भर्ती। जानें नगर पालिका प्रशासन की घ
Published at : 10 Mar 2026, 09:37 AM
Updated at : 11 Sep 2026, 06:40 PM
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नजीबाबाद (बिजनौर विशेष रिपोर्ट): उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद कस्बे में इन दिनों सड़कों पर चलना मौत को दावत देने जैसा हो गया है। शहर की गलियों और मुख्य मार्गों पर आवारा कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि अब मासूम बच्चे भी सुरक्षित नहीं हैं। सोमवार की शाम एक ऐसी ही रूह कंपा देने वाली घटना सामने आई, जिसने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। नजीबाबाद के रफूग्रान मस्जिद इलाके में ट्यूशन से लौट रही 7 से 8 साल की एक मासूम बच्ची, महिरा, पर आवारा कुत्तों के एक बड़े झुंड ने अचानक जानलेवा हमला कर दिया।Read also:-बिजनौर के धामपुर में नहटौर रेलवे फाटक 12 मार्च तक बंद, आवागमन प्रभावित; ट्रेनों की रफ्तार पर भी लगा ब्रेक
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कुत्तों ने बच्ची को इस कदर नोंचा कि वह खून से लथपथ हो गई। घटना के बाद आनन-फानन में परिजनों और स्थानीय लोगों ने उसे नजीबाबाद के पूजा हॉस्पिटल में भर्ती कराया है, जहां उसकी हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं है, बल्कि नगर पालिका प्रशासन की घोर लापरवाही और नाकामी का जीता-जागता सबूत है।
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कैसे हुआ महिरा पर यह खौफनाक हमला?
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प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों से मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार की शाम ढल रही थी। 7-8 वर्षीय महिरा रोज की तरह अपना ट्यूशन पढ़कर घर की ओर लौट रही थी। वह नजीबाबाद के रफूग्रान मस्जिद के पास पहुंची ही थी कि वहां पहले से घात लगाए बैठे आवारा कुत्तों के एक झुंड ने उस पर झपट्टा मार दिया।
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बच्ची की उम्र इतनी कम थी कि वह कुत्तों के इस भयानक हमले का विरोध भी नहीं कर सकी। कुत्तों ने उसे सड़क पर गिरा दिया और बुरी तरह काटना शुरू कर दिया। मासूम की चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग अपने घरों और दुकानों से बाहर दौड़े। लोगों ने लाठी-डंडों की मदद से बमुश्किल कुत्तों को वहां से खदेड़ा और बच्ची की जान बचाई। लेकिन तब तक महिरा के शरीर पर कुत्तों के दांतों के गहरे निशान छप चुके थे और वह दर्द से तड़प रही थी।
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पूजा हॉस्पिटल में चल रहा है जिंदगी का संघर्ष
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घटना के तुरंत बाद, बदहवास परिजन बच्ची को लेकर सीधे नजीबाबाद के प्रसिद्ध पूजा हॉस्पिटल पहुंचे। डॉक्टरों की टीम ने तुरंत उसका प्राथमिक उपचार शुरू किया।
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चिकित्सकों के अनुसार, कुत्तों के काटने से शरीर पर कई गहरे घाव (Deep Wounds) हुए हैं। एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) और अन्य जरूरी दवाइयां दी जा रही हैं, लेकिन संक्रमण (Infection) और रेबीज का खतरा अभी भी बना हुआ है। बच्ची गहरे सदमे (Trauma) में है और लगातार डर के मारे कांप रही है। अस्पताल के बाहर बच्ची के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका एक ही सवाल है कि आखिर उनकी मासूम बच्ची का क्या कसूर था?
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नगर पालिका प्रशासन: एक 'मूक दर्शक' की भूमिका में
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नजीबाबाद में यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी शहर के विभिन्न मोहल्लों में आवारा कुत्ते बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को अपना निशाना बना चुके हैं। सुबह के समय टहलने निकलने वाले बुजुर्ग हों या स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे, हर कोई इन कुत्तों के खौफ के साए में जीने को मजबूर है।
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नगर पालिका प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह शहरवासियों को सुरक्षित माहौल दे और सड़क पर घूमने वाले आवारा पशुओं की समस्या का समाधान करे। लेकिन यहाँ स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।
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एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) प्रोग्राम फेल: सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि नगर पालिकाओं को आवारा कुत्तों की नसबंदी (Sterilization) और टीकाकरण (Vaccination) अभियान चलाना चाहिए। लेकिन नजीबाबाद में यह नियम सिर्फ कागजों तक सीमित है।
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बजट का क्या हुआ? जनता टैक्स देती है ताकि उन्हें मूलभूत सुविधाएं और सुरक्षा मिले। कुत्तों को पकड़ने और उनकी नसबंदी के लिए हर साल बजट आवंटित होता है, लेकिन धरातल पर कोई काम नजर नहीं आता।
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शिकायतों की अनदेखी: स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने कई बार लिखित और मौखिक रूप से नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी (EO) और अध्यक्ष से कुत्तों को पकड़वाने की गुहार लगाई है, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ खोखले आश्वासन ही मिले हैं।
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क्यों आक्रामक हो रहे हैं शहर के कुत्ते?
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विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों की मानें तो आवारा कुत्तों के आक्रामक होने के पीछे कई बड़े कारण हैं, जिन्हें प्रशासन और समाज दोनों नजरअंदाज कर रहे हैं:
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कचरे के ढेर और गंदगी: शहर में जगह-जगह खुले में फेंका गया मांस और कचरा कुत्तों को आकर्षित करता है। जब उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिलता, तो वे चिड़चिड़े और हिंसक हो जाते हैं।
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बढ़ती आबादी: नसबंदी न होने के कारण कुत्तों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। जगह और खाने को लेकर उनके बीच संघर्ष होता है (Territorial Aggression), जिसकी चपेट में अक्सर इंसान आ जाते हैं।
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बीमारी और रेबीज का खतरा: कई कुत्तों को जरूरी टीके नहीं लगते, जिससे उनमें रेबीज या अन्य संक्रमण हो सकता है, जो उनके व्यवहार को हिंसक बना देता है।
भारतीय दंड संहिता और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act) के तहत, किसी भी नागरिक को आवारा कुत्तों को जान से मारने या पीटने का अधिकार नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार, इसका एकमात्र स्थायी और कानूनी समाधान 'कैच, न्यूटर, वैक्सीनेट एंड रिलीज' (Catch, Neuter, Vaccinate and Release - CNVR) तकनीक है। इसके तहत नगर निगम या पालिका को कुत्तों को पकड़कर, उनकी नसबंदी करनी होती है, रेबीज का टीका लगाना होता है और फिर उन्हें उसी इलाके में वापस छोड़ना होता है। यदि नजीबाबाद नगर पालिका ने समय रहते इस नियम का पालन किया होता, तो आज महिरा अस्पताल के बिस्तर पर न होती।
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जनता में भारी आक्रोश: "क्या किसी की मौत का इंतजार है?"
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इस घटना के बाद नजीबाबाद की जनता में नगर पालिका के खिलाफ भारी रोष व्याप्त है। रफूग्रान मस्जिद और आसपास के इलाकों के निवासियों ने प्रशासन को खुली चेतावनी दी है।
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स्थानीय नागरिक मोहम्मद आरिफ (काल्पनिक नाम) का कहना है, "हम अपने बच्चों को घर से बाहर निकालने में डरने लगे हैं। नगर पालिका का काम सिर्फ टैक्स वसूलना रह गया है। अगर जल्द ही कुत्तों को पकड़ने का अभियान नहीं चलाया गया, तो हम नगर पालिका कार्यालय का घेराव करने को मजबूर होंगे।"
कुत्ते के काटने पर तुरंत क्या करें? (जनहित में जारी)
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चूंकि ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, इसलिए यह जानना बेहद जरूरी है कि यदि किसी को कुत्ता काट ले, तो तुरंत कौन से कदम उठाने चाहिए:
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घाव को धोएं: सबसे पहले घाव को कम से कम 15 मिनट तक बहते पानी और साबुन से अच्छी तरह धोएं। यह रेबीज के वायरस को खत्म करने का सबसे प्रभावी शुरुआती तरीका है।
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एंटी-सेप्टिक लगाएं: घाव धोने के बाद उस पर पोविडोन-आयोडीन या कोई अन्य एंटी-सेप्टिक लोशन लगाएं।
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तुरंत डॉक्टर के पास जाएं: घाव को खुला छोड़ें (पट्टी न बांधें) और बिना कोई देरी किए नजदीकी अस्पताल पहुंचें।
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टीकाकरण: डॉक्टर की सलाह के अनुसार एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) का पूरा कोर्स लें। जरूरत पड़ने पर रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) भी दिया जाता है। लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है, क्योंकि रेबीज का कोई इलाज नहीं है।
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नजीबाबाद में 7 वर्षीय महिरा पर हुआ यह जानलेवा हमला हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह घटना इस बात की चेतावनी है कि अगर अब भी नगर पालिका और स्थानीय प्रशासन नींद से नहीं जागा, तो भविष्य में इसके और भी भयंकर परिणाम हो सकते हैं।
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बिजनौर के जिलाधिकारी (DM) और संबंधित आला अधिकारियों को इस मामले का तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। नगर पालिका नजीबाबाद की जवाबदेही तय होनी चाहिए और शहर में युद्ध स्तर पर कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण का अभियान चलाया जाना चाहिए। मासूम बच्चों का बचपन डर के साए में नहीं, बल्कि सुरक्षित माहौल में बीतना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि प्रशासन 'मूक दर्शक' की भूमिका छोड़कर 'एक्शन' मोड में आए।
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