उत्तर प्रदेश की नौकरशाही (Bureaucracy) में शनिवार को उस वक्त हड़कंप मच गया, जब न्यायपालिका का एक सख्त आदेश सामने आया। आम तौर पर जिस जिलाधिकारी (District Magistrate) के आदेश पर जिले में कुर्की और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होती है, आज उसी डीएम के सरकारी आवास को कुर्क करने का फरमान जारी हो गया है।READ ALSO:-UP Police Digital Strike: यूपी में अब 'मुखबिर' बनने से नहीं लगेगा डर, व्हाट्सएप बॉट 'पुलिस सतर्क मित्र' लॉन्च; आपकी पहचान रहेगी 'टॉप सीक्रेट'
\r\n\r\n\r\n\r\n
मुरादाबाद स्थित भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (LARRA) कोर्ट ने बिजनौर की जिलाधिकारी जसजीत कौर (IAS Jasjeet Kaur) के सरकारी आवास को कुर्क करने का आदेश पारित किया है। यह मामला एक किसान की जमीन अधिग्रहण और उसके मुआवजे के भुगतान में हुई देरी से जुड़ा है। अदालत की इस सख्ती ने बिजनौर से लेकर लखनऊ तक प्रशासनिक अमले की नींद उड़ा दी है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
न्यायाधीश जैग़म उद्दीन की अदालत ने न केवल कुर्की का आदेश दिया है, बल्कि डीएम को 9 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का अल्टीमेटम भी दिया है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
क्या है पूरा मामला? (The Case Background)
\r\n\r\nयह पूरा विवाद शासन और प्रशासन की उस लेटलतीफी का नतीजा है, जिसके चलते एक आम आदमी को न्याय के लिए सालों भटकना पड़ता है। मामला 'उमेश बनाम सरकार' (Umesh vs State) का है।
\r\n\r\nFollow the Khabreelal News channel on WhatsApp Join › \r\n\r\n
- \r\n
- \r\n जमीन अधिग्रहण: सिंचाई विभाग (Irrigation Department) ने बिजनौर में एक परियोजना के लिए याचिकाकर्ता उमेश की जमीन का अधिग्रहण किया था।\r\n \r\n
- \r\n मुआवजे का विवाद: जमीन तो ले ली गई, लेकिन उसका उचित मुआवजा किसान को नहीं मिला। थक-हारकर किसान ने न्याय की गुहार लगाई।\r\n \r\n
- \r\n 2020 का फैसला: याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के अनुसार, इस मामले में 13 मार्च 2020 को ही अदालत ने मुआवजा देने का फैसला सुना दिया था। कोर्ट ने प्रशासन को आदेश दिया था कि पीड़ित पक्ष को भुगतान किया जाए।\r\n \r\n
- \r\n 5 साल का इंतजार: कोर्ट के आदेश के बावजूद, बिजनौर जिला प्रशासन और सिंचाई विभाग की फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर रेंगती रहीं। 5 साल बीत गए, लेकिन किसान को उसका पैसा नहीं मिला।\r\n \r\n
\r\n\r\n
क्यों आया कुर्की का आदेश?
\r\n\r\nयाचिकाकर्ता उमेश का आरोप है कि डीएम ने इस मामले को जानबूझकर लंबित रखा। कोर्ट के आदेशों की लगातार अवहेलना की गई। कई बार रिमाइंडर और नोटिस भेजने के बावजूद जब प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंगी, तो वादी ने LARRA कोर्ट में एक्जीक्यूशन याचिका (Execution Petition) दाखिल की।
\r\n\r\n\r\n\r\n
शनिवार को सुनवाई के दौरान न्यायाधीश जैग़म उद्दीन ने पाया कि प्रशासन का रवैया बेहद लापरवाही भरा है। 25 लाख 23 हजार रुपये की बकाया राशि का भुगतान न होने पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए बिजनौर डीएम के आधिकारिक आवास को कुर्क करने का आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर प्रशासन भुगतान नहीं करता है, तो डीएम के आवास की नीलामी/कुर्की के जरिए इस रकम की भरपाई की जाएगी।
\r\n\r\n
🏪 आपके शहर के ऑफर
विज्ञापन · स्थानीय दुकानों की ताज़ा स्कीम · स्वाइप करें →
सभी ऑफर देखें →
डीएम जसजीत कौर की सफाई: "दोषियों पर गिरेगी गाज"
\r\n\r\nकोर्ट के इस आदेश के बाद बिजनौर जिला प्रशासन डैमेज कंट्रोल में जुट गया है। जिलाधिकारी जसजीत कौर की तरफ से सूचना विभाग द्वारा आनन-फानन में एक प्रेस नोट जारी किया गया। इसमें डीएम ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
डीएम के बयान के मुख्य बिंदु:
\r\n\r\n- \r\n
- \r\n आदेश की पुष्टि: डीएम ने स्वीकार किया कि LARRA कोर्ट मुरादाबाद ने उमेश बनाम सरकार केस में 25,23,000 रुपये के भुगतान के संबंध में आदेश पारित किया है।\r\n \r\n
- \r\n विभाग की गलती: डीएम ने स्पष्ट किया कि यह मामला मूल रूप से सिंचाई विभाग से जुड़ा है। धनराशि की मांग शासन से की जानी थी, जिसमें देरी हुई।\r\n \r\n
- \r\n जांच के आदेश: डीएम जसजीत कौर ने कड़े तेवर दिखाते हुए कहा है कि इस मामले में जिस भी अधिकारी या कर्मचारी (बाबू) की पटल पर फाइल रोकी गई या जिसने शासन को डिमांड भेजने में देरी की, उसकी जांच की जाएगी। दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई होगी।\r\n \r\n
- \r\n भुगतान का आश्वासन: डीएम ने कहा कि 9 जनवरी (पेशी की तारीख) से पहले शासन से धनराशि जारी करवाकर सिंचाई विभाग के माध्यम से याचिकाकर्ता को भुगतान कर दिया जाएगा, ताकि कुर्की की नौबत न आए।\r\n \r\n
\r\n\r\n
क्या है LARRA कोर्ट? (Understanding LARRA)
\r\n\r\nआम जनता के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर यह कौन सी कोर्ट है जिसके पास डीएम के घर को कुर्क करने की शक्ति है। LARRA का पूरा नाम Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Authority (भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण) है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n उद्देश्य: जब सरकार किसी विकास कार्य (जैसे सड़क, नहर, बांध) के लिए किसानों या आम लोगों की जमीन का अधिग्रहण करती है, तो मुआवजे को लेकर अक्सर विवाद होता है। इन विवादों के त्वरित निपटारे के लिए इस विशेष प्राधिकरण का गठन किया गया है।\r\n \r\n
- \r\n शक्तियाँ: यह एक क्वासी-जुडिशियल (अर्ध-न्यायिक) बॉडी है, लेकिन इसके आदेशों की मान्यता सिविल कोर्ट की डिक्री के समान होती है। अगर सरकार इसके आदेश का पालन नहीं करती, तो यह संपत्ति कुर्क करने का आदेश दे सकती है।\r\n \r\n
\r\n\r\n
प्रशासनिक लापरवाही का नमूना
\r\n\r\nयह मामला उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में व्याप्त 'लाल फीताशाही' (Red Tapism) का एक क्लासिक उदाहरण है।
\r\n\r\n\r\n\r\n
- \r\n
- \r\n संवेदनहीनता: 25 लाख रुपये सरकार के लिए बड़ी रकम नहीं है, लेकिन एक किसान के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न हो सकता है। 2020 से 2025 तक भुगतान न होना अधिकारियों की संवेदनहीनता दर्शाता है।\r\n \r\n
- \r\n वकीलों की दलील: वादी के अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि "प्रशासन कोर्ट से बड़ा नहीं हो सकता।" बार-बार याद दिलाने के बाद भी रिपोर्ट पेश न करना कोर्ट की अवमानना है।\r\n \r\n
- \r\n अब क्या होगा? 9 जनवरी को डीएम को कोर्ट में हाजिर होकर बताना होगा कि भुगतान क्यों नहीं हुआ और अब तक क्या कार्रवाई की गई। कोर्ट ने रजिस्ट्री की शर्तों को तय करने के लिए व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य की है।\r\n \r\n
\r\n\r\n
साख बचाने की चुनौती
\r\n\r\nबहरहाल, अब बिजनौर जिला प्रशासन के पास 9 जनवरी तक का समय है। पूरी संभावना है कि प्रशासन अब बिजली की गति से काम करेगा और शासन से बजट आवंटित कराकर पीड़ित को भुगतान कर देगा ताकि डीएम आवास की कुर्की रोकी जा सके। लेकिन मुरादाबाद कोर्ट के इस फैसले ने यह साबित कर दिया है कि कानून की नजर में एक आम नागरिक और जिले का सबसे बड़ा अधिकारी (डीएम) बराबर हैं। अगर न्याय में देरी होगी, तो जवाबदेही तय की जाएगी, चाहे कुर्सी कितनी भी ऊंची क्यों न हो।
\r\n\r\n\r\n\r\n
अब देखना यह होगा कि डीएम की आंतरिक जांच में किस अधिकारी पर गाज गिरती है और पीड़ित उमेश को 5 साल के इंतजार के बाद न्याय कब मिलता है।
Sabse pehle comment karne wale banein.