दहेज (Dowry), हमारे समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुकी एक ऐसी कुप्रथा है, जो न जाने कितनी ही बेटियों की जान ले चुकी है। सरकार के कड़े कानूनों और जागरूकता अभियानों के बावजूद, दहेज के लोभियों की भूख शांत होने का नाम नहीं ले रही है। ताजा और बेहद दर्दनाक मामला उत्तर प्रदेश के चांदपुर (Chandpur) क्षेत्र के ग्राम अकोन्धा से सामने आया है, जहां एक नवविवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है।READ ALSO:-मथुरा में मौत का अंधा मोड़: शादी की खुशियां मातम में बदलीं, 20 फीट गहरी नहर में कार गिरने से 4 युवकों की दर्दनाक मौत
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इस घटना ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। मृतका के भाई ने सीधा आरोप लगाया है कि यह कोई सामान्य मौत या आत्महत्या नहीं, बल्कि दहेज के लालच में की गई एक सोची-समझी हत्या है। जब मायके वाले बेटी की ससुराल पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। घर में कोई नहीं था, सभी ससुराली फरार थे, और आंगन में बिछी चारपाई पर उनकी लाडली बेटी की लाश पड़ी थी। आइए, इस पूरी घटना के घटनाक्रम, मायके वालों के आरोपों और पुलिस की अब तक की कार्रवाई पर विस्तार से नजर डालते हैं।
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घटना का पूरा घटनाक्रम: कौन थी यासमीन और कैसे हुई शादी?

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इस दुखद दास्तान की शुरुआत 26 अप्रैल 2023 को हुई थी, जब दो परिवारों के बीच एक नया रिश्ता जुड़ा था।
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अमरोहा से चांदपुर तक का सफर

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मृतका की पहचान यासमीन के रूप में हुई है। यासमीन, जनपद अमरोहा (Amroha) के थाना नौगावा सादात (Naugawan Sadat) के अंतर्गत आने वाले ग्राम जमना खास के रहने वाले खलील की बेटी थी। पिता खलील और परिवार के अन्य सदस्यों ने बड़े अरमानों के साथ अपनी बेटी के हाथ पीले किए थे। यासमीन का निकाह चांदपुर क्षेत्र के ग्राम अकोन्धा निवासी फहीम के साथ तय हुआ था। 26 अप्रैल 2023 को पूरे रीति-रिवाजों और हर्षोल्लास के साथ यासमीन की विदाई हुई। परिवार को लगा था कि उनकी बेटी अपने नए घर में राज करेगी, लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह घर बहुत जल्द यासमीन के लिए एक यातना गृह (Torture House) में तब्दील होने वाला है।
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हैसियत से बढ़कर दिया था दान-दहेज

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मृतका के भाई यूसुफ ने पुलिस और मीडिया को बताया कि उन्होंने अपनी बहन की शादी में किसी भी चीज की कमी नहीं रखी थी। पिता ने अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई अपनी लाडली की खुशी के लिए लुटा दी थी।
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    क्या-क्या दिया गया था दहेज में? भाई के अनुसार, शादी के समय ससुराल पक्ष को सोने और चांदी के भारी जेवर, घर का सारा कीमती घरेलू सामान (फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि) दिया गया था।
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    बुलेट और कैश: इसके अलावा, दामाद फहीम की मांग को पूरा करते हुए एक 'बुलेट मोटरसाइकिल' (Royal Enfield Bullet) और लगभग दो लाख रुपये नकद (Cash) भी उपहार स्वरूप दिए गए थे। मायके वालों को उम्मीद थी कि इतना सब कुछ देने के बाद ससुराल वाले खुश रहेंगे और उनकी बेटी को पलकों पर बिठाकर रखेंगे। लेकिन लालच की कोई सीमा नहीं होती।
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लालच की इंतहा: बुलेट के बाद 'स्विफ्ट कार' और 5 लाख की डिमांड

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शादी के कुछ शुरुआती महीने तो ठीक बीते, लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, ससुराल वालों का असली चेहरा सामने आने लगा। जिस परिवार को बुलेट और 2 लाख रुपये कैश भी कम लगने लगा था, उन्होंने अपनी नई और बड़ी मांगें यासमीन के सामने रखनी शुरू कर दीं।
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रोजाना की प्रताड़ना और ताने

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आरोप है कि यासमीन का पति फहीम, ससुर यासीन, सास सबीला और देवर फरीद आए दिन दहेज को लेकर ताने मारते थे।
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    उनकी एक सूत्रीय मांग थी: "अपने बाप के घर से 5 लाख रुपये नकद और एक मारुति स्विफ्ट (Swift) कार लेकर आओ।"
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    जब यासमीन ने यह कहते हुए असमर्थता जताई कि उसके पिता की इतनी हैसियत नहीं है कि वे इतनी बड़ी रकम और कार दे सकें, तो उस पर जुल्मों का पहाड़ टूट पड़ा।
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    भाई यूसुफ का स्पष्ट आरोप है कि कार और कैश की मांग पूरी न होने पर उसकी बहन को मानसिक (Mental Torture) और शारीरिक रूप से (Physical Abuse) प्रताड़ित किया जाने लगा। उसे मारा-पीटा जाता था और जान से मारने की धमकियां दी जाती थीं।
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बिरादरी का समझौता और वो 'आखिरी गलती'

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हमारे समाज की एक सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब भी कोई बेटी ससुराल की प्रताड़ना की शिकायत लेकर मायके आती है, तो समाज और रिश्तेदार अक्सर "घर बसाने" के नाम पर समझौता करा देते हैं। यासमीन के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ। भाई यूसुफ ने बताया कि ससुराल वालों की ज्यादतियों से तंग आकर कई बार विवाद हुआ। हर बार गांव और बिरादरी के संभ्रांत लोगों को बीच में डालकर पंचायत की गई। लोगों ने फहीम और उसके परिवार को समझाया और एक समझौता कराकर यासमीन को वापस अकोन्धा ससुराल भेज दिया गया। लेकिन शायद मायके वालों की यही सबसे बड़ी भूल साबित हुई। उन्हें लगा कि समाज के दबाव में ससुराल वाले सुधर जाएंगे, लेकिन दरिंदों ने समझौते को केवल एक दिखावा माना और अंदर ही अंदर यासमीन पर उनका जुल्म बढ़ता गया।
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वो खौफनाक बुधवार: "तुम्हारी बहन की तबीयत खराब है"

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दिन बीतते गए और यासमीन घुट-घुट कर जी रही थी। फिर आया वह मनहूस बुधवार, जिसने खलील के परिवार की दुनिया हमेशा के लिए उजाड़ दी।
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देवर का वह एक फोन कॉल

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बुधवार के दिन, अमरोहा में यासमीन के परिवार के पास उसके देवर (फरीद) का एक फोन आया। फोन पर उसने बेहद संक्षिप्त और रहस्यमयी लहजे में कहा कि "यासमीन की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, आप लोग तुरंत अकोन्धा आ जाओ।" इतना सुनते ही मायके वालों के होश उड़ गए। उनके मन में किसी अनहोनी की आशंका घर कर गई, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि यासमीन बीमार नहीं थी, बल्कि उसे प्रताड़ित किया जा रहा था। बिना एक पल गंवाए, पूरा परिवार बदहवास हालत में अमरोहा से चांदपुर के ग्राम अकोन्धा की तरफ दौड़ पड़ा।
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सन्नाटा, सिसकियां और एक लाश

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जब मायके वाले हांफते-कांपते फहीम के घर पहुंचे, तो वहां का दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला था।
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    घर का मुख्य दरवाजा खुला था, लेकिन अंदर अजीब सा सन्नाटा पसरा था।
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    पूरे घर में न तो पति फहीम मौजूद था, न सास-ससुर और न ही वह देवर जिसने फोन करके उन्हें बुलाया था। पूरा ससुराल पक्ष घर छोड़कर फरार हो चुका था।
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    जब परिवार के लोग अंदर कमरों की तरफ गए, तो आंगन में एक चारपाई पर यासमीन का बेजान शरीर पड़ा हुआ था। अपनी लाडली बेटी को इस हाल में देखकर परिवार की चीख-पुकार से पूरा गांव गूंज उठा। बेटी के गले पर निशान थे और उसकी सांसें थम चुकी थीं। यह स्पष्ट था कि उसे बेरहमी से मौत के घाट उतारा गया है और फिर आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई है।
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पुलिस का एक्शन: मौके पर पहुंची फोर्स और कानूनी प्रक्रिया

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चीख-पुकार और हंगामे की सूचना मिलते ही गांव वालों ने तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचना दी। मामले की गंभीरता (नवविवाहिता की संदिग्ध मौत) को देखते हुए चांदपुर थाने की पुलिस भारी फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गई।
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प्रथम दृष्टया 'फांसी' का मामला

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थाना प्रभारी निरीक्षक (SHO) अमित कुमार ने अपनी टीम के साथ घटनास्थल (Crime Scene) का बारीकी से मुआयना किया।
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    उन्होंने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि शुरुआती जांच (Prima Facie) और मृतका के शरीर/गले पर मौजूद निशानों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मौत 'फांसी' (Hanging) लगने के कारण हुई है।
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    हालांकि, यह आत्महत्या (Suicide) है या हत्या (Murder) करके शव को लटकाया/लिटाया गया है, यह अभी जांच का विषय है। हत्यारे अक्सर गला घोंटकर मारने के बाद मामले को आत्महत्या का रूप देने के लिए शव को फंदे से लटका देते हैं।
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मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में 'पंचायतनामा' (Inquest Report)

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चूंकि यासमीन की शादी को अभी केवल डेढ़ साल (7 साल से कम) ही हुआ था और उसकी मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी, इसलिए पुलिस ने कानूनी प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया।
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    ऐसे मामलों में सीधे पुलिस पंचनामा नहीं करती, बल्कि एक राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट का होना अनिवार्य होता है।
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    पुलिस ने तुरंत स्थानीय तहसीलदार (Tehsildar) को मौके पर बुलाया। तहसीलदार की मौजूदगी में शव का पंचायतनामा (Inquest Report - Section 174 CrPC/BNS equivalent) भरा गया।
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    इस प्रक्रिया में मृतका के शरीर पर मौजूद हर एक चोट के निशान, कपड़े, और घटनास्थल की स्थिति को रिकॉर्ड किया जाता है, ताकि कोर्ट में बचाव पक्ष कोई लाभ न उठा सके। इसके बाद पुलिस ने शव को सील कर कब्जे में ले लिया और उसे विस्तृत परीक्षण के लिए पोस्टमार्टम (Postmortem) के लिए जिला मुख्यालय भेज दिया।
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आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज

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मृतका के भाई यूसुफ ने पुलिस को एक लिखित तहरीर (Complaint) दी, जिसमें पूरी आपबीती, दहेज की लिस्ट और स्विफ्ट कार की मांग का जिक्र किया गया था।
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    इस तहरीर के आधार पर चांदपुर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दहेज हत्या (Dowry Death - IPC Section 304B / BNS Section 80) और प्रताड़ना की गंभीर धाराओं में नामजद मुकदमा (FIR) दर्ज कर लिया है।
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    आरोपी कौन हैं? इस मुकदमे में मुख्य रूप से चार लोगों को नामजद किया गया है:
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      फहीम (पति)
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      यासीन (ससुर)
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      सबीला (सास)
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      फरीद (देवर)
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पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक और वैज्ञानिक कारणों (Cause of Death) की पुष्टि हो सकेगी। फिलहाल, फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की कई टीमें गठित कर दी गई हैं और उनके संभावित ठिकानों पर दबिश (Raids) दी जा रही है। थाना प्रभारी ने आश्वासन दिया है कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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क्यों नहीं रुक रही हैं दहेज हत्याएं?

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यासमीन की मौत कोई इकलौती घटना नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में आज भी हर दिन औसतन 19 से 20 महिलाओं की मौत दहेज के कारण होती है। यह एक गंभीर बीमारी है, जिसके लिए सिर्फ ससुराल वाले ही नहीं, बल्कि पूरा समाज जिम्मेदार है।
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A. 'समाज क्या कहेगा' का डर

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यासमीन के मामले में भी यही देखा गया कि बिरादरी ने समझौता कराकर उसे वापस भेज दिया। हमारे समाज में आज भी माना जाता है कि "बेटी की डोली जहां जाती है, वहां से उसकी अर्थी ही उठनी चाहिए।" तलाक (Divorce) या अलग होने को एक कलंक माना जाता है। इसी सामाजिक दबाव के कारण लड़कियां घुट-घुट कर सहती रहती हैं और एक दिन उनकी अर्थी ही घर लौटती है।
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B. लालच का अंतहीन कुआं

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जो परिवार शादी में एक 'बुलेट' और 'दो लाख रुपये' लेकर खुश नहीं हुआ, उसे 'स्विफ्ट कार' देकर भी शांत नहीं किया जा सकता था। दहेज एक ऐसी भूख है जो कभी मिटती नहीं है। कार मिल जाती, तो कल को वे घर बनाने के लिए पैसे मांगते। लालची लोगों की फितरत कभी नहीं बदलती।
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C. महिलाओं का आर्थिक रूप से निर्भर होना

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कई मामलों में लड़कियां इसलिए ससुराल नहीं छोड़ पातीं क्योंकि वे आर्थिक रूप से अपने पति या पिता पर निर्भर होती हैं। अगर यासमीन के पास खुद का कोई रोजगार या आर्थिक स्वतंत्रता होती, तो शायद वह इस नरक से बहुत पहले ही बाहर निकल चुकी होती।
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कानून क्या कहता है? (Legal Rights & Awareness)

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इस मामले में पुलिस ने बहुत सही दिशा में काम किया है। हर महिला और उसके परिवार को ऐसे मामलों से जुड़े कानूनों की जानकारी होनी चाहिए:
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    दहेज हत्या (Section 80 of BNS / Section 304B of IPC): यदि किसी महिला की मौत शादी के 7 साल के भीतर जलने, फांसी लगने या किसी संदिग्ध परिस्थिति में होती है, और यह साबित होता है कि मौत से कुछ समय पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था, तो इसे 'दहेज हत्या' माना जाता है। इसमें कम से कम 7 साल से लेकर आजीवन कारावास (Life Imprisonment) तक की सजा का प्रावधान है।
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    क्रूरता (Section 85 of BNS / Section 498A of IPC): पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ की गई किसी भी प्रकार की मानसिक या शारीरिक क्रूरता (दहेज के लिए या वैसे भी) एक गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है।
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    सबूत का भार (Burden of Proof): दहेज हत्या के मामलों में कानून इतना सख्त है कि यह मान कर चला जाता है कि आरोपियों ने ही हत्या की है (Presumption as to dowry death - Section 113B of Evidence Act)। अब फहीम और उसके परिवार को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि उन्होंने यासमीन को नहीं मारा।
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परिवार और समाज के लिए सबक: बेटियों को कैसे बचाएं?

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यासमीन की दर्दनाक मौत उन सभी माता-पिता के लिए एक बहुत बड़ा सबक है, जो सोचते हैं कि ज्यादा पैसा और सामान देने से उनकी बेटी ससुराल में खुश रहेगी।
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    दहेज नहीं, शिक्षा दें: अपनी जीवन भर की कमाई किसी लालची को दहेज में देने से बेहतर है कि वह पैसा बेटी की पढ़ाई और उसे आत्मनिर्भर (Independent) बनाने में खर्च करें। एक शिक्षित और आत्मनिर्भर लड़की कभी किसी के जुल्म नहीं सहेगी।
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    समझौता जानलेवा हो सकता है: अगर बेटी ससुराल से प्रताड़ना की शिकायत कर रही है, तो उसे हल्के में न लें। समाज और बिरादरी की झूठी शान के खातिर उसे वापस उसी नर्क में धकेलने की गलती कभी न करें। जान है तो जहान है; रिश्ता टूट जाए तो कोई बात नहीं, कम से कम बेटी जिंदा तो रहेगी।
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    शुरुआत में ही पुलिस की मदद लें: जैसे ही पहली बार दहेज की मांग या मारपीट हो, तभी महिला हेल्पलाइन (1090) या स्थानीय पुलिस को सूचना दें। चुप रहने से अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं।
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अंततः, चांदपुर दहेज हत्या (Chandpur Dowry Death) का यह मामला हमारी सामाजिक व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है। अकोन्धा गांव में हुई यासमीन की मौत सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि उस बीमार मानसिकता का परिणाम है जो एक महिला की जिंदगी की कीमत कुछ लाख रुपयों और एक गाड़ी से तौलती है। पुलिस ने धारा 304B के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। अब यह कानून और न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि फरार आरोपियों—फहीम, यासीन, सबीला और फरीद—को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर उन्हें कठोरतम सजा दिलाई जाए। इसके साथ ही, समाज के हर वर्ग को इस कुप्रथा के खिलाफ एकजुट होना होगा, ताकि फिर किसी यासमीन को दहेज की वेदी पर अपनी जान न गंवानी पड़े।
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