उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला, जो अपनी उपजाऊ ज़मीन और गन्ने की बंपर पैदावार के लिए पूरे देश में जाना जाता है, इन दिनों एक गंभीर 'मानव-वन्यजीव संघर्ष' (Human-Wildlife Conflict) के मुहाने पर खड़ा है। यहां के किसानों के लिए अब सबसे बड़ा डर मौसम की बेरुखी या मंडी के गिरते दाम नहीं हैं, बल्कि उनका सबसे बड़ा खौफ वे विशालकाय जंगली हाथी हैं, जो रात के अंधेरे में जंगलों से निकलकर उनके खेतों में घुस आते हैं और चंद मिनटों में महीनों की गाढ़ी मेहनत को पैरों तले रौंद कर चले जाते हैं।
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​ताजा और बेहद दर्दनाक मामला साहूवाला वन रेंज क्षेत्र के ग्राम इनायतपुर से सामने आया है, जहां हाथियों के एक बड़े झुंड ने एक गरीब किसान की कमर ही तोड़ कर रख दी है।
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​क्या है पूरा मामला? (The Incident of Inayatpur Village)

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​बिजनौर के साहूवाला वन रेंज से सटे हुए ग्राम इनायतपुर में खेती-किसानी ही लोगों के जीवन यापन का एकमात्र साधन है। इसी गांव के रहने वाले पीड़ित किसान योगेश कुमार ने अपनी जमा-पूंजी और कर्ज़ लेकर 4 बीघा खेत में गन्ने की फसल बोई थी। गन्ने की बुवाई कोई आसान या सस्ता काम नहीं है; योगेश ने 1500 रुपये प्रति कुंतल (Quintal) के हिसाब से बेहद महंगा और उच्च गुणवत्ता वाला गन्ने का बीज खरीद कर अपने खेतों में डाला था।
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​फसल लहलहाने लगी थी और किसान योगेश को इस बार अच्छी आमदनी की उम्मीद थी। लेकिन, बीती रात जंगल से भटके हुए जंगली हाथियों के एक झुंड ने उनके खेत में धावा बोल दिया।
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    ​तबाही का मंज़र: हाथियों ने न केवल गन्ने को खाया, बल्कि अपने भारी-भरकम पैरों से पूरी 4 बीघा फसल को इस कदर रौंद दिया कि अब खेत में सिवाय टूटे और कुचले हुए गन्ने के डंठलों के कुछ नहीं बचा है।
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    ​आर्थिक बर्बादी: महंगी लागत (बीज, खाद, पानी और जुताई) लगाकर बोई गई इस फसल के बर्बाद होने से किसान योगेश कुमार पर लाखों रुपये का सीधा आर्थिक बोझ आ गिरा है। उनके परिवार के सामने अब रोजी-रोटी और कर्ज चुकाने का गहरा संकट खड़ा हो गया है।
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जंगल से खेतों तक: क्यों बढ़ रहा है हाथियों का आतंक?

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​किसानों का कहना है कि यह कोई एक दिन की घटना नहीं है। साहूवाला वन रेंज और उसके आसपास के गांवों में अब "आए दिन" जंगली हाथी फसलों को रौंद कर बर्बाद कर रहे हैं। आखिर हाथी बार-बार रिहायशी और कृषि इलाकों का रुख क्यों कर रहे हैं? इसके पीछे कुछ ठोस वैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारण छिपे हैं:
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    ​सिकुड़ते जंगल और भोजन की कमी: हाथियों का प्राकृतिक आवास (Natural Habitat) लगातार कम हो रहा है। जंगलों में भोजन और पानी की कमी उन्हें बाहर आने पर मजबूर करती है।
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    ​गन्ना—हाथियों का पसंदीदा भोजन: गन्ना (Sugarcane) हाथियों का सबसे पसंदीदा भोजन माना जाता है। साथ ही, गन्ने के ऊंचे और घने खेत उन्हें दिन के समय छिपने के लिए एक सुरक्षित जगह (Shelter) भी प्रदान करते हैं।
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    ​एलीफेंट कॉरिडोर (Elephant Corridors) में रुकावट: हाथियों के एक जंगल से दूसरे जंगल जाने के पारंपरिक रास्तों पर अब इंसानी बस्तियां और खेत बन चुके हैं। जब हाथी अपने पुराने रास्तों से गुजरते हैं, तो उनका सामना किसानों और खेतों से होता है।
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वन विभाग की भूमिका पर उठते गंभीर सवाल

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​इस पूरी त्रासदी में सबसे निराशाजनक पहलू वन विभाग (Forest Department) का रवैया और नाकामी है। पीड़ित किसानों का स्पष्ट आरोप है कि वन विभाग की टीम को कई बार शिकायतें दी जा चुकी हैं, लेकिन उनके तथाकथित "प्रयासों" के बाद भी जंगली हाथियों का आतंक रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
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    ​गश्त की कमी: वन विभाग के पास हाथियों को जंगलों की सीमा में रोके रखने के लिए उचित पेट्रोलिंग (गश्त) की व्यवस्था नहीं है।
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    ​संसाधनों का अभाव: जब हाथी गांव में घुस आते हैं, तो रैपिड रिस्पांस टीम (RRT) समय पर नहीं पहुंच पाती या उनके पास हाथियों को सुरक्षित वापस खदेड़ने के लिए आधुनिक उपकरण (जैसे- सर्चलाइट, ड्रोन) नहीं होते हैं।
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    ​बाड़बंदी की मांग: ग्रामीण लंबे समय से जंगलों के किनारे सौर ऊर्जा से चलने वाली बाड़ (Solar Fencing) या गहरी खाइयां (Elephant Trenches) खोदने की मांग कर रहे हैं, जो अब तक फाइलों में ही दबी हैं।
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महंगाई की मार और किसानों की बेबसी

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​एक तरफ देश का किसान पहले से ही डीजल, खाद (Fertilizers), और कीटनाशकों (Pesticides) की आसमान छूती कीमतों से परेशान है। ऊपर से बेमौसम बारिश और सूखा उनकी कमर तोड़ देता है। ऐसे में जब कर्ज लेकर बोई गई 1500 रुपये प्रति क्विंटल वाली बीज की फसल रातों-रात हाथियों के पैरों तले कुचल दी जाती है, तो किसान पूरी तरह से टूट जाता है।
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​ग्राम इनायतपुर के किसानों ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि:

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    ​पीड़ित किसान योगेश कुमार को उनके 4 बीघा गन्ने के नुकसान का 100% उचित और त्वरित मुआवजा दिया जाए।
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    ​वन विभाग तुरंत गांव की सीमाओं पर तारबंदी करे और हाथियों को खदेड़ने के लिए एक स्थायी टीम की तैनाती करे।
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अगर प्रशासन ने जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो किसानों का गुस्सा एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है,
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