बिजनौर (खबरीलाल ग्राउंड रिपोर्ट):
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उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में प्रकृति का एक बार फिर भयानक रूप देखने को मिल रहा है। गंगा नदी का बढ़ता जलस्तर अब नदी किनारे बसे दर्जनों गांवों के लिए बड़ी मुसीबत और आफत बन चुका है। जिले के चांदपुर और हस्तिनापुर खादर क्षेत्र में हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। बाढ़ के पानी ने न सिर्फ मुख्य मार्गों और रास्तों को अपने आगोश में ले लिया है, बल्कि किसानों की खून-पसीने से उगाई गई फसलें भी जलमग्न हो गई हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि लगभग एक दर्जन गांवों का संपर्क अन्य इलाकों से कट सा गया है।
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​लेकिन इस प्राकृतिक आपदा के बीच सबसे बड़ा आक्रोश प्रशासन और शासन व्यवस्था के प्रति है। स्थायी समाधान की मांग को लेकर पिछले करीब 16 दिनों से धरने पर बैठे ग्रामीण अब आर-पार के मूड में आ चुके हैं। गुस्साए ग्रामीणों ने गांवों में 'चुनाव बहिष्कार' के बैनर तक टांग दिए हैं।
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​खादर क्षेत्र में बिगड़े हालात: सड़कें बनीं नदियां, फसलें बर्बाद

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​पहाड़ी और मैदानी इलाकों में हो रही लगातार बारिश के कारण गंगा का जलस्तर तेजी से ऊपर उठ रहा है। इसका सीधा और घातक असर बिजनौर के खादर क्षेत्रों पर पड़ रहा है। हालात यह हैं कि कई संपर्क मार्गों पर पानी कई-कई फीट ऊपर बह रहा है। मजबूरी में ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को जान जोखिम में डालकर इस तेज बहाव के बीच से गुजरना पड़ रहा है।
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​किसानों की चिंताएं सबसे ज्यादा बढ़ गई हैं। धान, गन्ना और अन्य मौसमी फसलें जो खेतों में लहलहा रही थीं, वे अब बाढ़ के पानी में डूबकर सड़ने लगी हैं। किसानों का कहना है कि सालभर की मेहनत एक झटके में बर्बाद हो रही है, जिससे उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। एक दर्जन से अधिक गांवों के रास्ते बंद होने से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी दूभर हो गया है।
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​16 दिनों से धरना जारी, सुस्त पड़ा प्रशासन

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​ग्रामीणों का आरोप है कि बाढ़ और जलभराव की यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि हर साल बरसात या पानी छोड़े जाने के वक्त उन्हें इस त्रासदी से जूझना पड़ता है। हर बार जनप्रतिनिधि और अधिकारी आश्वासन देकर चले जाते हैं, लेकिन जमीन पर कोई ठोस काम नहीं होता।
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​इसी व्यवस्था की पोल खोलने और स्थायी समाधान पाने के लिए ग्रामीण पिछले करीब 16 दिनों से लगातार धरने पर बैठे हैं। उनकी मांग है कि गंगा के कटाव को रोकने और बाढ़ से बचाने के लिए क्षेत्र में मजबूत तटबंध (Embankment) का निर्माण कराया जाए। हालांकि, इतने दिन बीत जाने के बावजूद प्रशासनिक अमले की तरफ से कोई ठोस पहल न होने से ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे चुका है।
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​"तटबंध नहीं, तो वोट नहीं" – ग्रामीणों का कड़ा रुख

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​लोकतंत्र में वोट की ताकत सबसे बड़ी मानी जाती है, और बिजनौर के इन खादर गांवों के लोगों ने इसी हथियार का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। आक्रोशित ग्रामीणों ने गांवों के बाहर और चौराहों पर 'चुनाव बहिष्कार' के बैनर लगा दिए हैं।
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​ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में ऐलान कर दिया है कि जब तक उनकी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता और क्षेत्र में तटबंध नहीं बनता, तब तक वे आगामी किसी भी चुनाव में मतदान नहीं करेंगे। राजनेताओं के वोटों की अपील को ठुकराने का यह ऐलान प्रशासन के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने के लिए काफी है। क्या अब यह स्थानीय मुद्दा जिला प्रशासन और शासन के लिए एक बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बनेगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
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प्रशासनिक जवाबदेही
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​बिजनौर के खादर क्षेत्र की यह तस्वीर सिर्फ एक आपदा की कहानी नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की उस उदासीनता का आईना है जो आम जनता की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज करती है। तटबंध निर्माण की मांग पूरी तरह जायज है, क्योंकि हर साल बाढ़ से होने वाले नुकसान से क्षेत्र का विकास सालों पीछे चला जाता है। प्रशासन को तुरंत संज्ञान लेकर धरنے पर बैठे ग्रामीणों से वार्ता करनी चाहिए और राहत एवं बचाव कार्यों में तेजी लानी चाहिए।
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