उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला... जिसे प्रकृति ने अपनी खूबसूरती से नवाजा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में यह खूबसूरती 'दहशत' में बदल गई है। हरे-भरे गन्ने के खेत, जो कभी किसानों की समृद्धि का प्रतीक थे, आज वही खेत 'गुलदारों' (Leopards) का पसंदीदा ठिकाना बन चुके हैं। आए दिन होने वाले हमलों, मासूम बच्चों की मौतों और ग्रामीणों के गुस्से ने इस जिले को 'मानव-वन्यजीव संघर्ष' (Human-Wildlife Conflict) का केंद्र बना दिया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अक्सर जब भी कोई हमला होता है, तो मांग उठती है—"गुलदार को गोली मारो" या "उसे पिंजरे में कैद करो"। लेकिन क्या हर समस्या का समाधान हिंसा या कैद है? शायद नहीं। इसी सोच को बदलने के लिए और समस्या की जड़ (जागरूकता की कमी) पर प्रहार करने के लिए, बिजनौर की चांदपुर वन रेंज (Chandpur Forest Range) ने एक ऐसी पहल की है, जो न केवल अनूठी है बल्कि भविष्य के लिए एक नजीर भी है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
वन विभाग ने अब संघर्ष को रोकने के लिए लाठी-डंडे नहीं, बल्कि 'कला' और 'संवाद' का सहारा लिया है। गांवों में नुक्कड़ नाटकों (Street Plays) के जरिए लोगों को जागरूक करने का एक महा-अभियान शुरू किया गया है, जो अब धीरे-धीरे एक जन-आंदोलन का रूप ले रहा है।
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n

बदलाव की बयार: 14 और 15 जनवरी को क्या हुआ?

\r\n\r\n
चांदपुर रेंज के वन अधिकारियों ने महसूस किया कि केवल नोटिस बोर्ड लगाने या पंपलेट बांटने से ग्रामीण उन बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, जो उनकी जान बचा सकती हैं। ग्रामीण परिवेश में बात कहने का सबसे प्रभावी तरीका 'मनोरंजन' और 'लोक विधा' होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए नुक्कड़ नाटकों की योजना बनाई गई।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

घटनाक्रम का ब्यौरा:

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    दिनांक 14 जनवरी 2025 (मंगलवार): जागरूकता का यह कारवां सबसे पहले ग्राम नाईपुरा, सैदपुरा और लाडूपुरा पहुंचा। ढोल-नगाड़ों की आवाज सुनकर जब ग्रामीण इकट्ठा हुए, तो उन्हें कोई भाषण नहीं, बल्कि एक जीवंत नाटक देखने को मिला।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    दिनांक 15 जनवरी 2025 (बुधवार): अगले दिन यह टीम ग्राम मंसूरपुर, पिलाना, सिसोना और मलेशिया जैसे संवेदनशील गांवों में पहुंची। ये वो इलाके हैं जहां गन्ने की फसल घनी है और अक्सर गुलदार की गतिविधियां (Movement) देखी जाती हैं।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

नुक्कड़ नाटक ही क्यों? (The Power of Street Plays)

\r\n\r\n
सवाल उठता है कि वन विभाग ने नुक्कड़ नाटक को ही क्यों चुना? संचार विशेषज्ञों का मानना है कि "दृश्य और श्रव्य" (Audio-Visual) माध्यम का असर इंसान के दिमाग पर सबसे ज्यादा होता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    सीधा जुड़ाव: नुक्कड़ नाटक में कलाकार ग्रामीणों के बीच, उनकी ही भाषा और बोली में बात करते हैं। इससे अपनापन महसूस होता है।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    मनोरंजन के साथ शिक्षा: (Edutainment) - गंभीर से गंभीर बात को अगर हंसी-मजाक या कहानी के जरिए कहा जाए, तो वह याद रहती है। नाटकों में कलाकारों ने गुलदार बनने का अभिनय किया, किसी ने डरे हुए किसान का, तो किसी ने वन रक्षक का।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    भीड़ जुटाना आसान: सरकारी बैठकों में लोग कम आते हैं, लेकिन जब नाटक होता है तो बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग खुद-ब-खुद खिंचे चले आते हैं।
    \r\n
  6. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

नाटक की कहानी और सुरक्षा का पाठ (Content & Message)

\r\n\r\n
इन नाटकों की पटकथा (Script) को बहुत ही सोच-समझकर तैयार किया गया था। इसका मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन रक्षा था। नाटकों के माध्यम से निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
A. गुलदार का मनोविज्ञान (Understanding the Leopard): ग्रामीणों को समझाया गया कि गुलदार 'आदमखोर' पैदा नहीं होता। वह शर्मीला जानवर है। वह हमला तभी करता है जब:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    उसे अपनी जान का खतरा महसूस हो।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    वह अपने बच्चों की सुरक्षा कर रहा हो।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    या अचानक कोई उसके बहुत करीब आ जाए (Startled)। नाटकों में दिखाया गया कि कैसे गन्ने के खेत अब जंगल का रूप ले चुके हैं, इसलिए गुलदार वहां रहने को मजबूर है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
"क्या करें और क्या न करें" (Do's and Don'ts): नाटक के पात्रों ने अभिनय के जरिए बताया:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    खेत पर जाते समय: कभी भी अकेले न जाएं। हमेशा समूह (Group) में जाएं।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    शोर मचाएं: खेत में घुसने से पहले जोर-जोर से बातें करें, ताली बजाएं या मोबाइल पर गाने बजाएं। इससे गुलदार को पता चल जाता है कि इंसान आ रहा है और वह चुपचाप वहां से हट जाता है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    शौच के लिए: खुले में शौच के लिए जंगल या गन्ने के खेत के किनारे न जाएं, यह सबसे खतरनाक हो सकता है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    बच्चों की सुरक्षा: शाम के समय और अलसुबह बच्चों को घर से बाहर अकेला न छोड़ें। गुलदार अक्सर छोटे शिकार (जैसे कुत्ते या छोटे मवेशी) की तलाश में आबादी के पास आता है और बच्चों को गलती से शिकार समझ सकता है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

'एनिमल कंपैशन': नफरत नहीं, सह-अस्तित्व जरूरी

\r\n\r\n
इस पूरे अभियान का सबसे खूबसूरत पहलू था—"संवेदना" (Compassion) का संदेश। आमतौर पर संघर्ष वाले इलाकों में लोग वन्यजीवों को दुश्मन मानने लगते हैं। लेकिन चांदपुर रेंज की इस पहल ने एक अलग लकीर खींची है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

नुक्कड़ नाटकों में यह संदेश दिया गया कि:

\r\n\r\n
\r\n
"यह धरती जितनी हमारी है, उतनी ही इन बेजुबानों की भी है। अगर हम उनके जंगल काटेंगे, तो वे हमारे खेतों में आएंगे ही। हमें उन्हें मारने की नहीं, बल्कि उनसे बचकर रहने और तालमेल (Co-existence) बिठाने की जरूरत है।"
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
'ह्यूमन-वाइल्डलाइफ को-एग्जिस्टेंस' (Co-existence): ग्रामीणों को यह भी समझाया गया कि गुलदार पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए जरूरी है। वह जंगली सूअरों और नीलगाय की आबादी को नियंत्रित करता है, जो किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए, गुलदार का होना किसान के लिए एक तरह से फायदेमंद भी है, बशर्ते हम सुरक्षा के नियम अपनाएं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

बिजनौर की भौगोलिक चुनौती: गन्ने का जाल

\r\n\r\n
इस पहल को समझने के लिए हमें बिजनौर की जमीनी हकीकत को समझना होगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    गन्ना बेल्ट: बिजनौर पश्चिमी यूपी का प्रमुख गन्ना उत्पादक जिला है। गन्ने की फसल 10-12 फीट ऊंची और घनी होती है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    नकली जंगल: यह फसल गुलदार के लिए एक 'सुरक्षित पनाहगाह' (Safe Haven) बन जाती है। उसे यहां पानी मिलता है (सिंचाई के कारण), शिकार मिलता है (कुत्ते, सियार, सूअर) और छिपने की जगह मिलती है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    टकराव: किसान को अपनी फसल काटने या देखभाल करने खेत में जाना ही है। यही वह मोड़ है जहां इंसान और जानवर का आमना-सामना होता है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
वन विभाग जानता है कि गन्ने की खेती बंद नहीं हो सकती और गुलदारों को रातों-रात हटाया नहीं जा सकता। इसलिए, एकमात्र रास्ता "जागरूकता और व्यवहार में बदलाव" ही है, जिसे इन नाटकों के जरिए साधने की कोशिश की जा रही है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

ग्रामीणों की प्रतिक्रिया: "पहले डरते थे, अब संभलेंगे"

\r\n\r\n
सिसोना और मलेशिया गांव में नाटक देखने के बाद ग्रामीणों की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    एक बुजुर्ग किसान ने कहा, "साहब, हमें लगता था कि गुलदार हमारा दुश्मन है, लेकिन नाटक देखकर समझ आया कि वह भी अपनी जान बचाने के लिए ही हमला करता है। अब हम खेत पर जाते समय रेडियो जरूर बजाएंगे।"
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    बच्चों ने भी नाटक से सीखा कि उन्हें गन्ने के खेत के पास खेलने नहीं जाना है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    महिलाओं ने समझा कि मवेशियों के लिए चारा लेने जाते समय उन्हें गुट बनाकर जाना चाहिए।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

वन विभाग का विजन: भविष्य की राह

\r\n\r\n
चांदपुर रेंज के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक या दो दिन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया (Continuous Process) है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    विस्तार योजना: आने वाले हफ्तों में, रेंज के हर उस गांव में नुक्कड़ नाटक आयोजित किए जाएंगे जो 'रेड जोन' (High Conflict Zone) में आते हैं।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    फीडबैक: विभाग यह भी देखेगा कि इन नाटकों के बाद लोगों के व्यवहार में कितना बदलाव आया और क्या संघर्ष की घटनाओं में कमी आई।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    सामुदायिक सहयोग: वन विभाग अब 'वन मित्र' और गांव के युवाओं को भी इस मुहिम से जोड़ रहा है, ताकि वे खुद अपने गांव में जागरूकता फैला सकें।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

एक अनुकरणीय मॉडल

\r\n\r\n
बिजनौर के चांदपुर रेंज की यह पहल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकती है। जहां-जहां मानव-वन्यजीव संघर्ष है (चाहे वह महाराष्ट्र में तेंदुओं का हो या दक्षिण भारत में हाथियों का), वहां 'कम्युनिकेशन' (संचार) ही सबसे बड़ा समाधान है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
बंदूक की गोली एक जानवर को मार सकती है, लेकिन डर को नहीं। डर को केवल ज्ञान और जागरूकता ही मार सकती है। चांदपुर वन विभाग ने ढोल की थाप और कलाकारों के संवाद के जरिए यही ज्ञान बांटा है। उम्मीद है कि इस पहल से न केवल इंसानी जिंदगियां बचेंगी, बल्कि हमारे वन्यजीव भी सुरक्षित रह सकेंगे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
ख़बरीलाल विशेष: हम अपने पाठकों से अपील करते हैं कि वे वन विभाग की इस मुहिम का हिस्सा बनें। अगर आपके क्षेत्र में भी गुलदार की आहट है, तो घबराएं नहीं, सतर्क रहें। याद रखें, सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

सप्लीमेंट्री बॉक्स: गुलदार से बचाव के 5 'गोल्डन रूल्स'

\r\n\r\n
(पाठकों के लिए विशेष जानकारी)
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    संगठन में शक्ति है: खेत पर कभी अकेले न जाएं। हमेशा 2-3 लोगों के समूह में रहें।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    शोर है सुरक्षा: अपने साथ मोबाइल, रेडियो या कोई बजाने वाली चीज रखें। शोर सुनकर गुलदार दूर चला जाता है।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    झुकें नहीं: गन्ने के खेत में बैठकर काम करते समय बीच-बीच में खड़े होकर आसपास देखते रहें। बैठने पर इंसान का आकार छोटा दिखता है, जिससे गुलदार उसे छोटा शिकार समझ सकता है।
    \r\n
  6. \r\n
  7. \r\n
    उजाला रखें: रात के समय घर के बाहर और बाड़े में पर्याप्त रोशनी (Light) रखें।
    \r\n
  8. \r\n
  9. \r\n
    बच्चे रहें दूर: सुबह और शाम (गोधूलि बेला) के समय बच्चों को घर के अंदर ही रखें।
    \r\n
  10. \r\n
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें