उत्तर प्रदेश के बिजनौर (Bijnor) जिले का चांदपुर (Chandpur) तहसील क्षेत्र इन दिनों एक ऐतिहासिक और उग्र किसान आंदोलन (Farmers Protest) का गवाह बन रहा है। हर साल गंगा नदी की विनाशकारी बाढ़ का दंश झेलने वाले गंगा खादर (Ganga Khadar) इलाके के किसानों के सब्र का बांध अब पूरी तरह से टूट चुका है। अपना घर, अपनी फसलें और मवेशियों को हर साल आंखों के सामने डूबते देखने वाले इन किसानों ने अब शासन और प्रशासन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।READ ALSO:-मेरठ के होटल में बड़ा खेल: नाबालिग किशोरी के लिए बनवाया गया 'फर्जी आधार कार्ड', खुद को बीजेपी नेता बताने वाला संचालक अमन फौजी गिरफ्तार!
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
पांडव नगर पुलिस चौकी क्षेत्र में पिछले 10 दिनों से किसानों का अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन जारी है। इस धरने की सबसे बड़ी और अहम मांग है— गंगा नदी पर एक स्थायी पक्के बांध (तटबंध) का निर्माण। किसानों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दे दी है कि यदि उनकी इस मांग को तत्काल पूरा नहीं किया गया, तो वे आगामी सभी चुनावों का पूर्ण रूप से बहिष्कार (Election Boycott) करेंगे। आंदोलन की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि न्याय की गुहार लगाते हुए 5 किसान भूख हड़ताल (Hunger Strike) पर बैठ गए हैं, लेकिन सिस्टम की नींद अभी तक नहीं टूटी है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

तबाही का पर्याय: क्या है गंगा खादर की असली पीड़ा?

\r\n\r\n
चांदपुर तहसील का खादर क्षेत्र गंगा नदी के सीधे प्रभाव वाले इलाके में आता है। जब भी मानसून के दौरान पहाड़ों पर भारी बारिश होती है, या बैराज से पानी छोड़ा जाता है, तो गंगा का जलस्तर सबसे पहले इसी इलाके में मौत और तबाही का मंजर लेकर आता है। करीब 35 से 40 गांव इस बाढ़ की सीधी चपेट में आते हैं। इस त्रासदी का असर बहुआयामी है:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    फसलों की पूर्ण बर्बादी: इस क्षेत्र के किसानों की आजीविका मुख्य रूप से गन्ना, धान और सब्जियों की खेती पर निर्भर है। बाढ़ का पानी हफ्तों तक खेतों में भरा रहता है, जिससे हजारों एकड़ में लहलहाती फसल पूरी तरह जलमग्न होकर सड़ जाती है। किसानों की साल भर की मेहनत और पूंजी कुछ ही दिनों में मटियामेट हो जाती है।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    पशुओं के लिए भुखमरी का संकट: बाढ़ का पानी खेतों और घरों में घुसने से पशुओं के लिए भूसे और हरे चारे का भयानक संकट पैदा हो जाता है। चारे के अभाव में बेजुबान मवेशी दम तोड़ने लगते हैं।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    संपर्क मार्ग और बुनियादी ढांचे का विनाश: बाढ़ के अनियंत्रित और तेज बहाव में गांवों को जोड़ने वाली पक्की सड़कें, पुलिया और कच्चे रास्ते कटान का शिकार हो जाते हैं। दर्जनों गांव एक टापू में तब्दील हो जाते हैं, जिनका मुख्य धारा से संपर्क हफ्तों तक कटा रहता है।
    \r\n
  6. \r\n
  7. \r\n
    बीमारियों का खौफ: बाढ़ का पानी उतरने के बाद पूरे क्षेत्र में डायरिया, मलेरिया, और डेंगू जैसी घातक संक्रामक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
    \r\n
  8. \r\n
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n

'तटबंध नहीं तो वोट नहीं': लोकतंत्र के सबसे बड़े हथियार का इस्तेमाल

\r\n\r\n
दशकों से राजनेताओं के झूठे वादों का शिकार होते आ रहे चांदपुर के इन किसानों ने अब लोकतंत्र के सबसे बड़े हथियार— 'वोट की ताकत' का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। धरना स्थल पर चारों तरफ बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर लगे हैं, जिन पर साफ अक्षरों में लिखा है— "बाढ़ पीड़ित अब न सहेंगे, पक्का बांध बनवा के रहेंगे। चुनाव बहिष्कार, तटबंध नहीं तो वोट नहीं।"
\r\n\r\n\r\n\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
किसानों का स्पष्ट आरोप है कि आजादी के 7 दशकों बाद भी वे एक मूलभूत सुरक्षा के लिए तरस रहे हैं। हर बार चुनाव से ठीक पहले विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता उनके गांवों में आते हैं, उनके आंसू पोंछने का नाटक करते हैं और बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन, चुनाव जीतते ही वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर खादर की इस त्रासदी को पूरी तरह भूल जाते हैं। इस बार किसानों ने ठान लिया है कि जब तक पक्के बांध के निर्माण का सरकारी आदेश (जीओ) पारित नहीं हो जाता और जमीन पर मशीनें काम करना शुरू नहीं कर देतीं, तब तक न तो धरना खत्म होगा और न ही गांवों में किसी भी राजनेता को प्रवेश करने दिया जाएगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

भूख हड़ताल पर बैठे 5 किसान और प्रशासन की 'आश्वासन नीति'

\r\n\r\n
आंदोलन को धार देने और गूंगी-बहरी व्यवस्था तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए पांच किसान अपनी जान की परवाह किए बिना अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। दस दिन से लगातार चल रहे इस धरने और भूख हड़ताल के कारण इन अनशनकारी किसानों का स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा है। उनका वजन कम हो रहा है और कमजोरी बढ़ती जा रही है, लेकिन उनके हौसले अब भी चट्टान की तरह मजबूत हैं। इन किसानों की बिगड़ती हालत को देखकर आसपास के गांवों के ग्रामीणों में भारी रोष और आक्रोश पनप रहा है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
प्रशासनिक अमले की बात करें, तो चांदपुर के उप जिलाधिकारी (SDM) और स्थानीय स्तर के कई अधिकारी धरना स्थल का मुआयना कर चुके हैं। इसके अलावा पूर्व विधायक कमलेश सैनी के पति भी अपने समर्थकों के साथ किसानों को मनाने पहुंचे थे। उन्होंने किसानों को शासन स्तर पर बातचीत करने और जल्द समाधान निकालने का 'आश्वासन' दिया। लेकिन किसानों ने अधिकारियों और नेताओं को दो टूक जवाब दे दिया है कि वे अब आश्वासनों की घुट्टी पीने वाले नहीं हैं। उन्हें कागज पर कोरे वादे नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस काम चाहिए।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

अस्थायी उपाय या भ्रष्टाचार का खेल?

\r\n\r\n
गंगा खादर में तटबंध का निर्माण कोई नई मांग नहीं है। हर साल मानसून से ठीक पहले बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई विभाग करोड़ों रुपये अस्थायी बचाव कार्य (रेत और मिट्टी के बोरे लगाने) में खर्च करता है। लेकिन, ये बोरे पहली ही तेज बाढ़ में तिनके की तरह बह जाते हैं। किसानों का सीधा आरोप है कि यह 'अस्थायी उपाय' असल में विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों के लिए भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का एक बड़ा जरिया बन चुका है। इसी 'कमीशन' के खेल को जारी रखने के लिए जानबूझकर पक्का बांध नहीं बनाया जाता। पक्का तटबंध बनने से इस इलाके में बाढ़ हमेशा के लिए रुक जाएगी, लेकिन फिर हर साल आने वाला यह करोड़ों का 'बाढ़ राहत बजट' भी खत्म हो जाएगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

क्या सरकार सुनेगी किसानों की पुकार?

\r\n\r\n
चांदपुर के किसानों का यह 10 दिन पुराना धरना अब धीरे-धीरे एक बड़े जन आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। आसपास के कई अन्य गांवों के प्रधान, सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय किसान यूनियन के पदाधिकारी भी इस धरने को अपना पूर्ण समर्थन देने के लिए धरना स्थल की ओर कूच कर रहे हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
यदि समय रहते उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन ने इस संवेदनशील मामले में कोई ठोस, पारदर्शी और निर्णायक कदम नहीं उठाया, तो यह आंदोलन न केवल जिले की कानून-व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है, बल्कि आगामी चुनावों में सत्ताधारी दल के लिए भारी राजनीतिक और चुनावी नुकसान का कारण भी साबित होगा। पांच अनशनकारियों की बिगड़ती सेहत और हजारों किसानों के आक्रोश के बीच, अब हर किसी की निगाहें शासन-प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। खादर का किसान अब झुकने को तैयार नहीं है, उसकी एक ही मांग है— "राहत नहीं, समाधान चाहिए!"
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें