उत्तर प्रदेश में कोहरे और कड़ाके की सर्दी (UP Winter) ने दस्तक दे दी है। सुबह-शाम गलन बढ़ गई है, लेकिन प्रदेश के सरकारी स्कूलों की तस्वीर बेहद चिंताजनक है। 'सब पढ़े, सब बढ़े' का नारा देने वाले बेसिक शिक्षा विभाग की तकनीकी खामियों का खामियाजा करीब 10 लाख गरीब बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। ये बच्चे बिना स्वेटर, जूते-मोजे और स्कूल बैग के ही कड़ाके की ठंड में स्कूल आने को मजबूर हैं। वजह है- अभिभावकों के खाते में यूपी स्कूल डीबीटी का पैसा (UP School DBT Money) न पहुंचना।READ ALSO:-दिल्ली का बदल गया भूगोल: राजधानी में अब 11 नहीं होंगे 13 जिले, CM रेखा गुप्ता ने दी मंजूरी; लिस्ट से 'शाहदरा' का नाम गायब
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सरकार ने बच्चों को यूनिफॉर्म और स्वेटर के लिए 1200 रुपये सीधे खाते में भेजने (DBT) की योजना बनाई थी, लेकिन आधार कार्ड और बैंक खाते की तकनीकी अड़चनों ने इस योजना की रफ्तार रोक दी है।
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आंकड़े डराने वाले: आधार और बैंक लिंकिंग का पेंच

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बेसिक शिक्षा विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगता है। विभाग ने इस साल सभी परिषदीय स्कूलों के छात्रों को 1200 रुपये डीबीटी के माध्यम से देने का फैसला किया था। लेकिन अभी भी लाखों बच्चे कतार में हैं।
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    3.50 लाख बच्चे: इनके अभिभावकों के पास अभी तक आधार कार्ड ही नहीं है।
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    6.50 लाख बच्चे: इनके अभिभावकों का आधार कार्ड तो बना है, लेकिन वह उनके बैंक खाते से लिंक (Seeded) नहीं है।
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इस प्रकार कुल मिलाकर लगभग 10 लाख बच्चे ऐसे हैं, जिनके अभिभावकों के खाते में पैसा ट्रांसफर नहीं हो पाया है। तकनीकी भाषा में इसे 'आधार सीडिंग' (Aadhaar Seeding) की समस्या कहा जा रहा है, लेकिन व्यावहारिक रूप में यह लापरवाही लाखों बच्चों की सेहत पर भारी पड़ रही है।
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अधिकारियों का आदेश: बीआरसी पर लगेंगे कैंप

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मामले की गंभीरता को देखते हुए बेसिक शिक्षा निदेशक प्रताप सिंह बघेल ने सभी जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों (BSA) को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि कड़ाके की ठंड में कोई भी बच्चा बिना स्वेटर और जूते-मोजे के स्कूल नहीं आना चाहिए।
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    कैंप लगाने के निर्देश: सभी ब्लॉक संसाधन केंद्रों (BRC) पर विशेष कैंप लगाकर अभिभावकों के आधार कार्ड बनवाने और उन्हें बैंक खातों से लिंक करने का आदेश दिया गया है।
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    वेरिफिकेशन: पेंडिंग डाटा का तुरंत वेरिफिकेशन कर शत-प्रतिशत डीबीटी पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
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निदेशक ने अधिकारियों से जवाब-तलब किया है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में डेटा पेंडिंग क्यों है। उन्होंने दिसंबर के अंत तक या जनवरी के पहले सप्ताह तक हर हाल में यूपी स्कूल डीबीटी का पैसा छात्रों तक पहुंचाने को कहा है।
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जमीनी हकीकत: कांपते हुए स्कूल पहुंच रहे मासूम

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सरकारी आदेश अपनी जगह हैं, लेकिन स्कूलों की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ग्रामीण इलाकों के कई प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों ने बताया कि बच्चे पुरानी फटी यूनिफॉर्म और चप्पलों में स्कूल आ रहे हैं। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हमारे स्कूल में 40 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिनके पास गर्म कपड़े नहीं हैं। वे सुबह ठंड से कांपते हुए प्रार्थना सभा में खड़े होते हैं। कई बच्चे ठंड लगने के कारण बीमार पड़ गए हैं। अगर यूपी स्कूल डीबीटी का पैसा समय पर आ जाता, तो अभिभावक कम से कम स्वेटर तो खरीद ही लेते।"
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क्या जनवरी तक मिल पाएगी राहत?

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विभाग का दावा है कि जल्द ही सभी अड़चनें दूर कर ली जाएंगी। लेकिन सवाल यह है कि जब तक पैसा आएगा, तब तक आधी सर्दी बीत चुकी होगी। कई जिलों में बैंकों में आधार लिंकिंग की प्रक्रिया बेहद धीमी है और अभिभावक रोज बैंक और स्कूल के चक्कर काट रहे हैं।
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ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और बैंकों की लापरवाही के कारण यह प्रक्रिया कछुआ चाल से चल रही है। शिक्षा विभाग को अब 'मिशन मोड' में काम करना होगा, वरना यह सर्दी इन गरीब बच्चों के लिए एक सजा बन जाएगी।
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डिजिटल इंडिया के दौर में तकनीकी खामियों के कारण 10 लाख बच्चों का ठंड में ठिठुरना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 1200 रुपये की राशि भले ही छोटी हो, लेकिन एक गरीब परिवार के बच्चे के लिए यह सर्दी से बचने का एकमात्र सहारा है। सरकार को चाहिए कि वह प्रक्रिया को सरल बनाए ताकि यूपी स्कूल डीबीटी का पैसा तत्काल जरूरतमंदों तक पहुंच सके।
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यूपी के सरकारी स्कूलों में 10 लाख बच्चों को अब तक यूनिफॉर्म और स्वेटर के लिए 1200 रुपये नहीं मिले हैं। 3.5 लाख अभिभावकों के पास आधार नहीं है और 6.5 लाख के खाते लिंक नहीं हैं। शिक्षा निदेशक ने कैंप लगाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन बच्चे ठंड में परेशान हैं।
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