उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में मौसम ने करवट लेनी शुरू कर दी है और दिन-प्रतिदिन गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। जैसे-जैसे सूरज की तपिश तेज हो रही है, वैसे-वैसे राज्य में बिजली की मांग (Electricity Demand) भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने लगी है। हालात यह हैं कि मार्च के पहले सप्ताह में ही बिजली की डिमांड 19 हजार मेगावाट (MW) के आंकड़े को पार कर गई है। यह स्थिति तब है जब अभी भीषण गर्मी के महीने मई और जून आने बाकी हैं। पिछले साल का ट्रेंड देखें तो फरवरी माह से ही बिजली की मांग में इजाफा होना शुरू हो गया था और गर्मियों के चरम पर यह 32 हजार मेगावाट के विशाल आंकड़े तक जा पहुंची थी। इस बार पावर कॉरपोरेशन का अनुमान है कि मई-जून की भीषण गर्मी में यह मांग 33 हजार मेगावाट का नया रिकॉर्ड बना सकती है।READ ALSO:-मेरठ में ट्रैफिक पुलिस का 'हंटर': बुलेट के पटाखों और जातिसूचक शब्दों पर कड़ा एक्शन, 11 वाहन सीज, धड़ाधड़ कटे चालान
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लेकिन, प्रदेश की जनता और विशेषज्ञों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मांग 33 हजार मेगावाट तक पहुंचेगी, तो इतनी बिजली आएगी कहां से? क्या हमारा सिस्टम इस भारी-भरकम लोड को सहने के लिए तैयार है? वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यूपी में बिजली संकट गहराता हुआ नजर आ रहा है। ट्रांसमिशन की क्षमता उपभोक्ताओं के स्वीकृत भार की तुलना में काफी कम है, बिजली का उत्पादन सीमित है और डिस्ट्रिब्यूशन (वितरण) व्यवस्था चरमरा रही है। ऐसे में प्रदेश के करोड़ों उपभोक्ताओं के घरों तक 24 घंटे निर्बाध बिजली कैसे पहुंचेगी, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न बन गया है।
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कंज्यूमर राइट रूल- 2020 और यूपी में बिजली का 'रोस्टर सिस्टम'

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बिजली उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार ने 'कंज्यूमर राइट रूल- 2020' (Consumer Right Rule- 2020) लागू किया था। इस नियम के तहत देश भर के उपभोक्ताओं को 24 घंटे निर्बाध बिजली पाने का अधिकार दिया गया है। लेकिन, हैरानी की बात यह है कि उत्तर प्रदेश देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां आज भी बिजली आपूर्ति के लिए 'रोस्टर सिस्टम' (Roster System) लागू है।
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जहां देश के अन्य राज्य अपने ग्रामीण और शहरी इलाकों में बिना किसी भेदभाव के 24 घंटे बिजली देने का दावा करते हैं, वहीं यूपी के ग्रामीण इलाकों में आज भी कागजों पर 18 घंटे का रोस्टर लागू है। यानी गांव के लोगों को दिन के 24 घंटों में से सिर्फ 18 घंटे ही बिजली देने का आधिकारिक प्रावधान है, और कई बार लोकल फॉल्ट या ट्रिपिंग के कारण यह आंकड़ा 12 से 14 घंटे तक ही सिमट कर रह जाता है। उपभोक्ताओं के अधिकारों के स्पष्ट उल्लंघन के बावजूद, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी का हवाला देकर इस रोस्टर सिस्टम को लगातार चलाया जा रहा है।
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यूपी में बिजली संकट: उत्पादन, क्षमता और मांग का गणित

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उत्तर प्रदेश के बिजली सिस्टम और संभावित यूपी में बिजली संकट को समझने के लिए हमें तीन मुख्य बिंदुओं पर गौर करना होगा:
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    यूपी में बिजली की कुल उत्पादन क्षमता
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  3. \r\n
    यूपी पावर ट्रांसमिशन की उपलब्ध क्षमता
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  4. \r\n
  5. \r\n
    प्रदेश में कुल उपभोक्ताओं की संख्या और उनका लोड
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  6. \r\n
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1. प्रदेश में कितनी बिजली उपलब्ध है? (ऊर्जा मंत्री का दावा)

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हाल ही में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान, राज्य के ऊर्जा मंत्री एके शर्मा (AK Sharma) ने बिजली की उपलब्धता को लेकर एक विस्तृत आंकड़ा पेश किया था। एक सवाल के जवाब में उन्होंने सदन को बताया था कि राज्य के पास वर्तमान में 31 हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित है।
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इस 31 हजार मेगावाट के आंकड़े को यदि हम हिस्सों में बांटें तो:

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    राज्य स्वामित्व वाली कंपनियां: उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (UPRVUNL) और अन्य सरकारी उपक्रमों की अपनी उत्पादन क्षमता 18,136 मेगावाट है।
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  • \r\n
  • \r\n
    प्राइवेट सेक्टर (निजी क्षेत्र): विभिन्न निजी बिजली उत्पादक कंपनियों (Private Sector) के साथ किए गए पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) के तहत प्रदेश सरकार को 8,814 मेगावाट बिजली प्राप्त होती है।
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  • \r\n
  • \r\n
    सेंट्रल पूल (केंद्रीय कोटा): एनटीपीसी (NTPC) और अन्य सेंट्रल जनरेटिंग स्टेशंस से यूपी को अपने हिस्से के रूप में 7,621 मेगावाट बिजली मिलती है।
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  • \r\n
  • \r\n
    सौर ऊर्जा (Solar Energy): प्रदेश में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के प्रयासों के चलते अब सौर ऊर्जा की क्षमता भी 2,815 मेगावाट तक पहुंच चुकी है।
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  • \r\n
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इन सभी को मिलाकर देखा जाए तो कागज पर यूपी के पास पर्याप्त बिजली है। वर्तमान में राज्य में औसत बिजली की खपत भी बढ़कर 724 यूनिट प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष पहुंच चुकी है, जो राज्य के विकास का सूचक है। 
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2. मार्च के पहले हफ्ते की हकीकत: जब सिस्टम की पोल खुली

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भले ही कागजों पर ऊर्जा विभाग 31 हजार मेगावाट बिजली की उपलब्धता का दावा कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। 3 मार्च 2026 की रात को ही सिस्टम की क्षमता का लिटमस टेस्ट हो गया।
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रात 8 बजकर 17 मिनट पर (जो कि पीक ऑवर माना जाता है), प्रदेश में बिजली की कुल मांग अचानक बढ़कर 19,830 मेगावाट तक पहुंच गई। लेकिन, चौंकाने वाली बात यह रही कि इतनी भारी-भरकम कागजी उपलब्धता होने के बावजूद, बिजली विभाग उस वक्त सिर्फ 17,211 मेगावाट बिजली ही सप्लाई कर पाया।
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इसका सीधा सा मतलब यह है कि डिमांड की तुलना में विभाग लगभग 2,619 (ढाई हजार से ज्यादा) मेगावाट बिजली की सप्लाई करने में पूरी तरह से फेल साबित हुआ। इस भारी अंतर (Gap) की भरपाई करने के लिए विभाग के पास बिजली कटौती (Power Cut) के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। होली के महत्वपूर्ण त्योहार से ठीक पहले ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बत्ती गुल हो गई, जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
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विशेषज्ञों की राय: 'जब बिजली है तो कटौती क्यों?'

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इस विरोधाभास पर उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा गंभीर सवाल उठाते हैं। उनका तर्क है कि जब राज्य के ऊर्जा मंत्री खुद सदन में 31 हजार मेगावाट बिजली उपलब्ध होने का दावा कर रहे हैं, तो मात्र 19 हजार मेगावाट की मांग आने पर सिस्टम क्यों हांफने लगा?
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अवधेश वर्मा का कहना है, "यह प्रदेश के उपभोक्ताओं के साथ सीधा धोखा है। अगर हमारे पास पर्याप्त बिजली है, तो फिर ये अघोषित कटौती क्यों की जा रही है? देश भर में यूपी इकलौता राज्य बनकर रह गया है जहां 'कंज्यूमर राइट रूल 2020' का खुलेआम मखौल उड़ाया जा रहा है और 18 घंटे का रोस्टर थोपा जा रहा है।"
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उनका यह सवाल सीधा सिस्टम के प्रबंधन और ट्रांसमिशन की खामियों की ओर इशारा करता है। बिजली का होना एक बात है, लेकिन उसे सुरक्षित और निर्बाध रूप से उपभोक्ता के घर तक पहुंचाना दूसरी बात है। और यहीं यूपी का पावर सिस्टम बुरी तरह से मात खा रहा है।
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ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन की कड़वी सच्चाई: खस्ताहाल इंफ्रास्ट्रक्चर

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यूपी में बिजली संकट का मुख्य कारण बिजली का उत्पादन नहीं, बल्कि उसका वितरण (Distribution) और ट्रांसमिशन (Transmission) है। प्रदेश में मुख्य रूप से बिजली का उत्पादन UPRVUNL के थर्मल प्लांट्स और सेंट्रल जनरेटिंग स्टेशन (SSGS) में यूपी के शेयर से होता है। वहां से बिजली निकल तो रही है, लेकिन रास्ते में ही दम तोड़ देती है।
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क्षमता और लोड का भारी अंतर: प्रदेश में वर्तमान में लगभग 3 करोड़ 72 लाख (3.72 Crore) वैध बिजली उपभोक्ता हैं। इन सभी उपभोक्ताओं का कुल स्वीकृत बिजली भार (Sanctioned Load) 8.40 करोड़ किलोवाट से भी अधिक है। इसके विपरीत, बिजली को शहरों और गांवों तक पहुंचाने वाली ट्रांसमिशन कंपनी (UPPTCL) के 132 केवी (132 KV) सब-स्टेशनों की कुल उपलब्ध क्षमता मात्र 6.35 करोड़ किलोवाट ही है।
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सीधे शब्दों में समझें तो, लोड 8.40 करोड़ किलोवाट का है और उठाने की क्षमता सिर्फ 6.35 करोड़ किलोवाट की है। यानी 2.05 करोड़ किलोवाट का एक बहुत बड़ा अंतर (Deficit) साफ दिखाई देता है। जब गर्मियों में सभी उपभोक्ता एक साथ अपने एसी, कूलर और पंखे चलाते हैं, तो यह पुराना और कम क्षमता वाला ट्रांसमिशन सिस्टम ओवरलोड होकर बैठ जाता है।
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जर्जर तार और कम क्षमता वाले ट्रांसफार्मर: यूपी विद्युत संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे बताते हैं कि बिजली विभाग कभी भी प्रदेश की मांग के अनुरूप बिजली उपलब्ध नहीं करा पाता क्योंकि वितरण सिस्टम (Distribution Network) अभी भी पूरी तरह से अपग्रेड नहीं हुआ है।
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    ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में आज भी कई जगह दशकों पुरानी जर्जर लाइनें बदली नहीं जा सकी हैं।
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    ट्रांसफार्मरों (Transformers) की क्षमता उस क्षेत्र के वास्तविक लोड की तुलना में काफी कम होती है।
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    भीषण गर्मी के दिनों में ओवरलोडिंग के कारण अक्सर ट्रांसफार्मर धू-धू कर जल जाते हैं, या जर्जर तार टूटकर गिर जाते हैं। एक बार ट्रांसफार्मर फुंकने के बाद उसे बदलने में जो समय लगता है, वह उपभोक्ताओं के लिए किसी सजा से कम नहीं होता।
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कर्मचारियों की छंटनी और लाइन लॉस: सिस्टम की इस खस्ताहाली के बीच एक और बड़ी समस्या है मैनपावर (Manpower) की कमी। जब से विभाग में वर्टिकल व्यवस्था लागू हुई है, तब से तकनीकी कर्मचारियों की भारी कमी देखी जा रही है। एक तरफ उपभोक्ताओं की संख्या 3.72 करोड़ तक पहुंच गई है, जिन्हें निर्बाध बिजली देने के लिए स्टाफ बढ़ाया जाना चाहिए था। लेकिन इसके उलट, संविदा कर्मचारियों (Contract Workers) की लगातार छंटनी की जा रही है। फॉल्ट ठीक करने के लिए पर्याप्त लाइनमैन ही उपलब्ध नहीं हैं।
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इसके अतिरिक्त, प्रदेश में आज भी लगभग 20 प्रतिशत बिजली चोरी (Power Theft) या लाइन लॉस में चली जाती है। यानी हर 100 यूनिट में से 20 यूनिट बिजली का कोई राजस्व विभाग को नहीं मिलता। यह लाइन लॉस भी ओवरलोडिंग और सिस्टम के फेल होने का एक बड़ा कारण है। (Internal link to related article: उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर योजना और बिजली चोरी पर लगाम)
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33 हजार मेगावाट की डिमांड: विभाग का 'मास्टर प्लान' क्या है?

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जैसे-जैसे मई और जून का महीना करीब आ रहा है, यूपी पावर कॉरपोरेशन (UPPCL) के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। यूपी पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल के मुताबिक, विभाग 33 हजार मेगावाट की अनुमानित डिमांड से निपटने के लिए अपनी रणनीति तैयार कर चुका है।
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विभाग की इस रणनीति के मुख्य स्तंभ इस प्रकार हैं:1. पावर बैंकिंग (Power Banking) का सहारा: गर्मियों के यूपी में बिजली संकट से बचने के लिए बिजली विभाग ने ठंड के मौसम से ही तैयारियां शुरू कर दी थीं। इसके तहत 'पावर बैंकिंग' व्यवस्था का सहारा लिया गया है। पावर बैंकिंग एक ऐसा सिस्टम है जिसमें राज्य अपने सरप्लस (अतिरिक्त) बिजली को सर्दियों में दूसरे राज्यों को उधार दे देता है, और गर्मियों में जरूरत पड़ने पर उनसे वापस ले लेता है। यूपी ने मध्य प्रदेश, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान सहित कई राज्यों के साथ लगभग 5500 मेगावाट बिजली की बैंकिंग की है। इसका मतलब है कि सर्दियों में जब यूपी में एसी और पंखे बंद थे और बिजली की मांग कम थी, तब यूपी ने इन राज्यों को 5500 मेगावाट बिजली दी थी। अब मई-जून में जब यूपी को जरूरत होगी, तो ये राज्य वह बिजली वापस लौटाएंगे। इस पूरी प्रक्रिया में यूपी को केवल ट्रांसमिशन (लाने-ले जाने) का खर्च वहन करना पड़ता है, जो कि नई बिजली खरीदने से काफी सस्ता पड़ता है।
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2. शॉर्ट टर्म पावर एग्रीमेंट (Short-Term Contracts): चेयरमैन का दावा है कि पावर बैंकिंग के अलावा विभाग जरूरत के हिसाब से शॉर्ट टर्म (अल्पावधि) बिजली खरीद के अनुबंध भी कर रहा है। ये एग्रीमेंट विशेष रूप से मई से लेकर जुलाई के बीच के सबसे गर्म महीनों (Peak Summer Months) के लिए किए जा रहे हैं ताकि अचानक मांग बढ़ने पर निजी कंपनियों या पावर एक्सचेंज से तुरंत बिजली ली जा सके।
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3. ओपन मार्केट से खरीद (Open Market Purchase): यदि पावर बैंकिंग और शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट के बाद भी बिजली कम पड़ती है, तो अंतिम विकल्प के रूप में विभाग 'ओपन मार्केट' (इंडियन एनर्जी एक्सचेंज) से बिजली खरीदता है। हालांकि, पीक ऑवर में जब पूरे देश में गर्मी होती है, तब ओपन मार्केट में बिजली की दरें (Per Unit Rate) बहुत ज्यादा ऊंची होती हैं, जिससे पावर कॉरपोरेशन पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। फिर भी, उपभोक्ताओं को अंधेरे से बचाने के लिए सरकार को महंगे दामों पर बिजली खरीदनी पड़ती है।
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सौर ऊर्जा: भविष्य की एक किरण, लेकिन वर्तमान में सीमित

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ऊर्जा मंत्री के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में सौर ऊर्जा (Solar Energy) की क्षमता 2,815 मेगावाट तक पहुंच चुकी है, जो कि एक सकारात्मक संकेत है। उत्तर प्रदेश सरकार 'सौर ऊर्जा नीति' के तहत रूफटॉप सोलर पैनल्स और बड़े सोलर पार्कों को तेजी से बढ़ावा दे रही है।
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लेकिन, सौर ऊर्जा की अपनी एक बड़ी सीमा है। सोलर से बिजली का उत्पादन पूरी तरह से दिन के समय और साफ मौसम पर निर्भर करता है। शाम ढलने के बाद (रात 8 बजे से 11 बजे के बीच), जब घरों में लाइट, एसी और टीवी एक साथ चालू होते हैं और बिजली की मांग अपने सर्वोच्च शिखर (Peak Demand) पर होती है, तब सोलर पावर सिस्टम ग्रिड को कोई सपोर्ट नहीं दे पाता। इसलिए, 'बेस लोड' को संभालने के लिए अभी भी थर्मल (कोयला आधारित) और हाइड्रो पावर पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
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ग्रामीण उत्तर प्रदेश का दर्द: शहर रोशन, गांव अंधेरे में

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जब भी प्रदेश में बिजली का संकट गहराता है, तो उसका सबसे पहला और सबसे गहरा असर ग्रामीण इलाकों पर पड़ता है। शहरों को (विशेषकर वीआईपी जिलों और जिला मुख्यालयों को) 24 घंटे बिजली देने के दबाव में, विभाग अक्सर गांवों और छोटे कस्बों की बिजली काट देता है।
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किसानों को सिंचाई के लिए नलकूप चलाने होते हैं, जिसके लिए उन्हें रात-रात भर बिजली का इंतजार करना पड़ता है। गर्मी के दिनों में बिजली न होने से मच्छरों का प्रकोप और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। बच्चों की पढ़ाई से लेकर छोटे कुटीर उद्योगों तक, सब कुछ इस 18 घंटे के दिखावटी रोस्टर और अघोषित कटौतियों की भेंट चढ़ जाता है।
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जब तक यूपी का ट्रांसमिशन नेटवर्क ग्रामीण स्तर पर 132 केवी और 33/11 केवी के नए सब-स्टेशनों के साथ मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक गांव वालों को सुचारू बिजली मिलना एक सपना ही रहेगा।
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आंकड़ों, दावों और जमीनी हकीकत का विश्लेषण करने के बाद यह स्पष्ट है कि आगामी गर्मियों में यूपी में बिजली संकट एक विकराल रूप ले सकता है। यद्यपि ऊर्जा विभाग और सरकार कागजों पर 31 हजार मेगावाट की उपलब्धता और 5500 मेगावाट की पावर बैंकिंग का भरोसा दिला रहे हैं, लेकिन 2.05 लाख करोड़ किलोवाट का जो ट्रांसमिशन गैप है, वह किसी भी समय पूरे सिस्टम को धराशायी कर सकता है।
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मार्च महीने में 19 हजार मेगावाट की मांग पर ही ढाई हजार मेगावाट की कटौती इस बात का सीधा प्रमाण है कि मशीनरी पुराने तारों और कमजोर ट्रांसफार्मरों के बोझ तले हांफ रही है। 33 हजार मेगावाट की पीक डिमांड से निपटने के लिए केवल महंगी बिजली खरीदना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि युद्ध स्तर पर मैनपावर बढ़ाना, लाइन लॉस रोकना और सब-स्टेशनों की क्षमता को दोगुना करना अनिवार्य है। जब तक 'वितरण' की अंतिम कड़ी (Last Mile Connectivity) को मजबूत नहीं किया जाता, तब तक 'कंज्यूमर राइट रूल 2020' के तहत 24 घंटे बिजली का वादा उत्तर प्रदेश की जनता के लिए एक छलावा ही बना रहेगा। अब देखना यह होगा कि मई और जून के तपते महीनों में बिजली विभाग अपनी रणनीतियों से जनता को राहत दे पाता है, या फिर प्रदेश को एक बार फिर लालटेन और इन्वर्टर के सहारे रातें गुजारनी पड़ेंगी।
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