लखनऊ (डेस्क रिपोर्ट): आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर 'लाइक्स', 'शेयर' और 'फॉलोवर्स' की भूख ने आम जनता के साथ-साथ पुलिस महकमे को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। अक्सर देखा जाता है कि खाकी वर्दी पहने पुलिसकर्मी फिल्मी गानों या भारी-भरकम डायलॉग्स पर रील बनाकर सोशल मीडिया पर अपना 'भौकाल' (रौब) दिखाते हैं। लेकिन, उत्तर प्रदेश पुलिस (UP Police) में अब यह सब बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।READ ALSO:-मेरठ में भाजपा का 'मिशन इलेक्शन': संगठन को धार देने के लिए 16 नए मंडल प्रभारियों का ऐलान, देखें पूरी सूची
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वर्दी की गरिमा और अनुशासन को सर्वोपरि रखते हुए, उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय ने रील बनाने और 'सोशल मीडिया पॉलिसी-2023' का उल्लंघन करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ एक बेहद सख्त और निर्णायक कदम उठाया है। अब ऐसे अनुशासनहीन पुलिसकर्मियों पर यदा-कदा नहीं, बल्कि हर महीने कार्रवाई का चाबुक चलेगा। एडीजी (कानून-व्यवस्था) अमिताभ यश ने डीजीपी के अनुमोदन से सभी जोन, परिक्षेत्र और जनपदों के प्रभारियों (पुलिस कप्तानों) को इस संबंध में बेहद कड़े और स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं।
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सोशल मीडिया पॉलिसी-2023: क्या है यह नियम और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
\r\n\r\nगौरतलब है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को पूरे देश में एक अनुशासित और पेशेवर बल (Disciplined Force) के रूप में जाना जाता है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर पुलिसकर्मियों द्वारा वर्दी में वीडियो और रील डालने की बाढ़ सी आ गई थी। कई बार ये वीडियो ड्यूटी के दौरान बनाए जाते थे, जिससे आम जनता के बीच पुलिस की छवि एक रक्षक के बजाय एक 'एक्टर' या 'इन्फ्लुएंसर' की बनने लगी थी।
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इस बढ़ती प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए, पुलिस मुख्यालय ने 8 फरवरी 2023 को 'सोशल मीडिया पॉलिसी-2023' लागू की थी। डीजी परिपत्र संख्या-05/2023 के तहत लागू इस नीति में स्पष्ट रूप से निर्देश दिए गए थे कि कोई भी सेवारत या प्रशिक्षु (Trainee) पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान, वर्दी में या हथियारों के साथ कोई भी ऐसा वीडियो, रील या पोस्ट साझा नहीं करेगा जो विभागीय गरिमा के खिलाफ हो या जिससे पुलिस बल की छवि धूमिल होती हो।
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लगातार हो रहा था उल्लंघन, अब हर महीने देनी होगी प्रगति रिपोर्ट
\r\n\r\nनीति लागू होने के बावजूद, यह देखा गया कि कई पुलिसकर्मी पुलिस मैनुअल और निर्देशों को ताक पर रखकर लगातार सोशल मीडिया पर रील और आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट कर रहे हैं। इस शौक के चक्कर में न केवल उनके दैनिक शासकीय कार्यों (Daily Official Duties) में बाधा आ रही थी, बल्कि आम जनता की शिकायतों की सुनवाई भी प्रभावित हो रही थी।
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इसी लापरवाही को बेहद गंभीरता से लेते हुए एडीजी कानून-व्यवस्था ने नया आदेश जारी किया है। नए आदेश के तहत:
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- \r\n हर महीने होगी समीक्षा: अब जिला स्तर के जिम्मेदार अधिकारियों (SSP/SP) को केवल चेतावनी देकर या प्राथमिक कार्रवाई करके मामले को रफा-दफा नहीं करना होगा। बल्कि, हर महीने एक तय प्रोफार्मा (Format) के तहत पूरी विस्तृत रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय को भेजनी होगी।\r\n \r\n
- \r\n दोषियों की पहचान: सभी कप्तानों को टास्क दिया गया है कि वे अपने-अपने जनपदों में ऐसे पुलिसकर्मियों को तुरंत चिन्हित (Identify) करें जो सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय हैं और विभागीय नियमों को तोड़ रहे हैं।\r\n \r\n
- \r\n मुख्यालय करेगा सीधी निगरानी: दोषी कार्मिकों के विरुद्ध की गई दंडात्मक कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट अब सीधे लखनऊ स्थित पुलिस मुख्यालय (PHQ) भेजी जाएगी, ताकि शीर्ष अधिकारी स्वयं पूरी प्रक्रिया की मॉनिटरिंग कर सकें।\r\n \r\n
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URL बनेगा सबसे बड़ा 'डिजिटल हथियार': सबूतों के आधार पर गिरेगी गाज
\r\n\r\nसोशल मीडिया की एक खासियत यह है कि विवाद होने पर लोग तुरंत अपनी पोस्ट या वीडियो डिलीट कर देते हैं और बाद में जांच कमेटी के सामने मुकर जाते हैं कि उन्होंने ऐसा कोई वीडियो डाला ही नहीं था। पुलिसकर्मियों की इस चालाकी को मात देने के लिए पुलिस मुख्यालय ने एक मास्टरस्ट्रोक चला है।
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नए आदेशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सोशल मीडिया पॉलिसी का उल्लंघन करने वाली संबंधित पोस्ट, रील या वीडियो के डिजिटल URL (लिंक) को अनिवार्य रूप से साक्ष्य (Evidence) के तौर पर सुरक्षित रखा जाएगा।
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- \r\n विधिक मजबूती: डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का मुख्य उद्देश्य यह है कि जब दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ विभागीय या विधिक (Legal) कार्रवाई हो, तो कोर्ट या विभागीय जांच कमेटी के पास पुख्ता तकनीकी सबूत मौजूद रहें।\r\n \r\n
- \r\n बचने का कोई रास्ता नहीं: एक बार URL सुरक्षित हो गया और स्क्रीन रिकॉर्डिंग कर ली गई, तो उसके बाद पोस्ट डिलीट करने पर भी पुलिसकर्मी कार्रवाई से बच नहीं पाएगा। साक्ष्यों के आधार पर दोषी पाए जाने पर निलंबन (Suspension), लाइन हाजिर या वेतन वृद्धि रोकने जैसी कठोर सजा मिल सकती है।\r\n \r\n
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ट्रेनिंग सेंटर्स में भी पैनी नजर: प्रशिक्षु पुलिसकर्मियों के लिए खास चेतावनी
\r\n\r\nमुख्यालय की नाराजगी केवल पुराने और सेवारत पुलिसकर्मियों तक ही सीमित नहीं है। इस नए आदेश में विशेष रूप से प्रशिक्षु (Trainee) पुलिसकर्मियों का भी जिक्र किया गया है। देखा जा रहा था कि पुलिस ट्रेनिंग सेंटर्स (PTC) में नए भर्ती हुए रंगरूट ट्रेनिंग से ज्यादा ध्यान अपनी 'स्वैग' वाली रील बनाने और बैकग्राउंड में पुलिस सायरन वाले गाने लगाकर वीडियो बनाने में दे रहे थे।
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पुलिस आलाकमान का मानना है कि यदि ट्रेनिंग के दौरान ही अनुशासन की नींव कमजोर हो गई, तो भविष्य में ऐसे पुलिसकर्मी कानून-व्यवस्था को कैसे संभालेंगे? इसलिए, सभी ट्रेनिंग सेंटर्स के प्रभारियों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रशिक्षुओं के सोशल मीडिया एकाउंट्स पर नजर रखें और उल्लंघन पाए जाने पर उनकी ट्रेनिंग रिपोर्ट में इसे 'नेगेटिव रिमार्क' के तौर पर दर्ज करें।
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वर्दी ड्यूटी के लिए है, लाइक्स बटोरने के लिए नहीं
\r\n\r\nयह नया और कड़ा आदेश उत्तर प्रदेश के डीजीपी (Director General of Police) के औपचारिक अनुमोदन और सहमति के बाद ही जारी किया गया है। इसका सीधा और स्पष्ट संदेश है— "वर्दी का काम जनता की सेवा, सुरक्षा और कानून का राज स्थापित करना है, न कि सोशल मीडिया पर लाइक्स, व्यूज और फॉलोवर्स बटोरना।"
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उत्तर प्रदेश पुलिस की यह पहल उन सभी जवानों के लिए एक कड़ा सबक है जो रील बनाने के शौक में अपनी जिम्मेदारी भूल चुके थे। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मासिक रिपोर्टिंग सिस्टम के लागू होने के बाद यूपी पुलिस के सोशल मीडिया व्यवहार में कितना सुधार आता है और कितने 'रीलबाज' पुलिसकर्मी इस नए चाबुक की जद में आते हैं। आम जनता ने भी पुलिस महकमे के इस कदम की सराहना की है, क्योंकि एक आम नागरिक पुलिस से तत्परता और न्याय की उम्मीद करता है, न कि फिल्मी अदाकारी की।
Sabse pehle comment karne wale banein.