लखनऊ (UP News): उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों 'स्मार्ट मीटर' (Smart Meter) सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा बन गया है। राज्य की बिजली वितरण व्यवस्था को हाई-टेक बनाने का जो सपना सरकार ने देखा था, वह धरातल पर उतरते ही आम जनता के लिए किसी बुरे ख्वाब में तब्दील हो गया। प्रदेश भर से आ रही स्मार्ट प्रीपेड मीटरों (Smart Prepaid Meters) की शिकायतों, अत्यधिक बिल और लोगों के उग्र प्रदर्शनों ने अंततः योगी आदित्यनाथ सरकार (Yogi Adityanath Govt) की चिंताएं बढ़ा दीं।READ ALSO:-यूपी में स्मार्ट मीटर पर सरकार का बड़ा यू-टर्न: प्रीपेड का झंझट खत्म, अब लागू होगी 'पोस्टपेड' व्यवस्था; जानिए क्या होंगे इसके फायदे और नुकसान
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नतीजा यह हुआ कि राज्य सरकार को अपने ही फैसले पर एक बड़ा यू-टर्न लेना पड़ा है। अब उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर प्रीपेड नहीं, बल्कि पुराने और पारंपरिक पोस्टपेड (Postpaid) तरीके से ही काम करेंगे। आइए, गहराई से विश्लेषण करते हैं कि आखिर 70 लाख घरों में लागू हुई यह महात्वाकांक्षी योजना कैसे एक बड़े जन आंदोलन में बदल गई और सरकार को हार मानकर बैकफुट पर क्यों आना पड़ा।
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तीन साल पहले शुरू हुई थी 'स्मार्ट' क्रांति, जो बन गई गले की फांस
\r\n\r\nकहानी आज से करीब तीन साल पहले शुरू होती है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन (UPPCL) और राज्य सरकार ने प्रदेश में बड़े स्तर पर स्मार्ट मीटर लगाने का महाभियान शुरू किया था। इस योजना के पीछे सरकार के मुख्य उद्देश्य थे:
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- \r\n रियल-टाइम ट्रैकिंग: उपभोक्ता और विभाग दोनों रियल-टाइम में बिजली खपत देख सकें।\r\n \r\n
- \r\n लाइन लॉस में कमी: बिजली चोरी पर पूरी तरह से लगाम लगाना।\r\n \r\n
- \r\n राजस्व में वृद्धि: 100% ऑनलाइन और एडवांस बिलिंग से विभाग का घाटा कम करना।\r\n \r\n
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इस योजना के तहत प्रदेश के लगभग 70 लाख घरों में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए गए। साथ ही एक कड़ा नियम लागू किया गया कि अब से प्रदेश में जो भी नया कनेक्शन होगा, उस पर अनिवार्य रूप से प्रीपेड स्मार्ट मीटर ही लगाया जाएगा। उपभोक्ता को मोबाइल फोन की तरह पहले रिचार्ज करना होता था, और फिर वह बिजली का उपभोग कर सकता था।
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ख्वाब बनाम हकीकत: जब आने लगे 'करंट' मारने वाले बिल
\r\n\r\nकागजों पर जो योजना 'स्मार्ट' और 'पारदर्शी' लग रही थी, वह जमीन पर उतरते ही उपभोक्ताओं की जेब काटने लगी। जैसे ही स्मार्ट प्रीपेड मीटर सुचारू रूप से चालू हुए और लोगों के मोबाइल पर बिल आने शुरू हुए, पूरे प्रदेश में हाहाकार मच गया।
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उपभोक्ताओं ने मुख्य रूप से तीन गंभीर आरोप लगाए:
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- \r\n कई गुना ज्यादा बिल: आम लोगों का सीधा आरोप था कि स्मार्ट मीटर पुराने मीटरों की तुलना में कई गुना तेज भाग रहे हैं। जो उपभोक्ता पहले महीने भर का बिल 600 से 800 रुपये चुकाते थे, अब उन्हें हर हफ्ते इतने ही रुपयों का रिचार्ज करवाना पड़ रहा था।\r\n \r\n
- \r\n माइनस बैलेंस और अचानक अंधेरा: प्रीपेड सिस्टम में बैलेंस खत्म होते ही ऑटोमैटिक तरीके से घर की बिजली कट जाती थी। रात के 2 बजे हों या तपती दोपहर, सिस्टम कोई रहम नहीं दिखाता था।\r\n \r\n
- \r\n रिचार्ज के बाद भी प्रताड़ना: सबसे ज्यादा खून जलाने वाली बात यह थी कि जब उपभोक्ता मजबूर होकर रिचार्ज कर भी लेता था, तब भी सर्वर की खराबी या तकनीकी खामियों के चलते 24 से 72 घंटे तक बिजली की आपूर्ति बहाल नहीं होती थी।\r\n \r\n
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सड़कों पर उतरा जनाक्रोश और उखड़ने लगे मीटर
\r\n\r\nजब विभागीय अधिकारियों और टोल-फ्री नंबरों से कोई समाधान नहीं मिला, तो जनता का गुस्सा फूट पड़ा। उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिले—मेरठ, मुरादाबाद, गोरखपुर, बनारस से लेकर लखनऊ तक—से विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें सामने आने लगीं।
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लोगों का आक्रोश इस कदर बढ़ गया कि कई मोहल्लों में उपभोक्ताओं ने खुद ही खंभों से स्मार्ट मीटर उखाड़ कर सड़कों पर फेंक दिए। बिजली घरों का घेराव किया गया, सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई और धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर उखड़े हुए मीटरों की तस्वीरें और वीडियो आग की तरह फैलने लगे।
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यह साफ होने लगा कि यह मामला अब केवल उपभोक्ता फोरम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे एक विशाल जन आंदोलन (Public Movement) का रूप लेता जा रहा है।
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विपक्ष को मिला 'ब्रह्मास्त्र' और सरकार की बढ़ी बेचैनी
\r\n\r\nलोकतंत्र में जनता का गुस्सा विपक्ष के लिए संजीवनी का काम करता है। समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) और कांग्रेस (Congress) समेत अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया। विपक्ष ने इसे "गरीबों को लूटने वाली योजना" करार दिया और इसे विधानसभा सत्र से लेकर सड़क तक एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना लिया।
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जैसे-जैसे विरोध बढ़ता गया, लखनऊ में बैठे शीर्ष नेतृत्व और योगी सरकार की बेचैनी बढ़ने लगी। सरकार को यह आभास हो गया कि यह कोई छिटपुट नाराजगी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा अंडरकरंट है जो सीधे तौर पर सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।
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अप्रैल की 'राहत' रही नाकाफी: डैमेज कंट्रोल का पहला प्रयास
\r\n\r\nजनता के गुस्से को भांपते हुए सरकार ने सबसे पहले अप्रैल में एक 'बैंड-एड' (Band-Aid) उपाय किया। इसके तहत घोषणा की गई कि:
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- \r\n बैलेंस खत्म होने पर तुरंत बिजली नहीं कटेगी।\r\n \r\n
- \r\n उपभोक्ताओं को अधिकतम 3 दिन या माइनस (-) 200 रुपये तक बिजली का इस्तेमाल करने की छूट दी गई।\r\n \r\n
- \r\n बैलेंस खत्म होने से पहले 5 स्तर का SMS अलर्ट सिस्टम लागू किया गया।\r\n \r\n
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लेकिन, यह 'डैमेज कंट्रोल' पूरी तरह से विफल रहा। बुनियादी समस्या (तेज मीटर और भारी बिल) जस की तस थी, इसलिए जनता का गुस्सा शांत नहीं हुआ। मीटर उखाड़ने और प्रदर्शनों का सिलसिला जारी रहा।
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आखिरकार सरकार का 'यू-टर्न': प्रीपेड हटा, पोस्टपेड लागू
\r\n\r\nकरीब 70 लाख घरों में लागू इस व्यवस्था से प्रदेश के लगभग 3 से 4 करोड़ लोग (वोटर) सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे थे। इस साल के अंत तक राज्य में विधानसभा चुनावों (Assembly Elections) का ऐलान होना है। चुनावी साल में इतनी बड़ी आबादी की नाराजगी मोल लेना किसी भी सत्ताधारी दल के लिए राजनीतिक आत्महत्या के समान था।
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चुनावी गणित और जनता के कड़े रुख को देखते हुए योगी सरकार ने आखिरकार घुटने टेक दिए और एक के बाद एक कई बड़े जनहितकारी फैसले लिए:
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- \r\n प्रीपेड सिस्टम का पूर्ण खात्मा: अब सभी स्मार्ट मीटर अनिवार्य रूप से 'पोस्टपेड' मोड में बदल दिए जाएंगे। उपभोक्ता पहले की तरह पूरे महीने बेफिक्र होकर बिजली का इस्तेमाल करेंगे और महीने के अंत में ही बिल का भुगतान करेंगे।\r\n \r\n
- \r\n प्रीपेड की अनिवार्यता खत्म: नए बिजली कनेक्शन लेने वालों के लिए भी अब प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है। अब नए कनेक्शन भी सीधे पोस्टपेड में ही दिए जाएंगे।\r\n \r\n
- \r\n बिल भुगतान में भारी मोहलत: अब उपभोक्ताओं का बिल हर महीने की 10 तारीख तक जनरेट कर दिया जाएगा। सबसे बड़ी राहत यह है कि भुगतान के लिए पूरे 15 दिन का समय (Grace Period) दिया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n बकाया चुकाने के लिए 10 किस्तें: जिन लोगों पर पुराने भारी-भरकम बिलों का बकाया चल रहा है, उन्हें एकमुश्त भुगतान के दबाव से मुक्ति दी गई है। अब वे अपना बकाया 10 आसान किस्तों (Installments) में जमा कर सकेंगे।\r\n \r\n
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क्या संशय अभी भी बरकरार है?
\r\n\r\nसरकार का यह यू-टर्न राजनीतिक नजरिए से एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सरकार ने बिल भरने का तरीका (प्रीपेड से पोस्टपेड) तो बदल दिया है, लेकिन उपभोक्ताओं के मन में बसा असली 'डर' अभी भी कायम है।
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लोगों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि— क्या पोस्टपेड होने के बाद स्मार्ट मीटर धीमी गति से चलेंगे? क्या अनाप-शनाप बिल आने बंद हो जाएंगे? अगर मीटर की तकनीकी कार्यप्रणाली (तेज भागना) वही रही, तो केवल महीने के अंत में बिल आने से समस्या खत्म नहीं होगी; बल्कि इकट्ठे बड़े बिल का बोझ उपभोक्ताओं की कमर तोड़ देगा।
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योगी सरकार ने चुनाव से पहले स्मार्ट मीटर की आग को बुझाने की कोशिश तो की है, लेकिन यह फैसला जनता का विश्वास पूरी तरह से जीत पाएगा या नहीं, यह तो आने वाले महीनों में आने वाले 'पोस्टपेड बिल' ही तय करेंगे। फिलहाल, उत्तर प्रदेश की जनता ने बार-बार मीटर रिचार्ज कराने के झंझट से जरूर राहत की सांस ली है।
Sabse pehle comment karne wale banein.