लखनऊ/मेरठ (स्पेशल इनवेस्टिगेशन डेस्क - ख़बरीलाल):
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उत्तर प्रदेश में एक आम आदमी के लिए जमीन खरीदना जितना मुश्किल होता है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल उस जमीन पर कानूनन घर बनाना होता है। वजह—विकास प्राधिकरणों (Development Authorities) की पेचीदा नियमावली और 'नक्शा पास' (Map Approval) कराने का थका देने वाला सफर। अक्सर देखा गया है कि एक आम नागरिक अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाकर जमीन तो ले लेता है, लेकिन जब वह ईंट रखने की तैयारी करता है, तो उसे नक्शा पास कराने के लिए कभी फायर विभाग, कभी वन विभाग, तो कभी जल निगम के चक्कर काटने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया में 'एनओसी' (NOC - No Objection Certificate) का खेल ऐसा चलता है कि फाइलें महीनों, और कभी-कभी सालों तक धूल फांकती रहती हैं।READ ALSO:-Meerut Kapsad Murder Case: पारस सोम 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया; कोर्ट में बोला- 'मैं बेकसूर हूं', रूबी का बयान सीलबंद
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लेकिन, अब यह तस्वीर बदलने वाली है। वर्ष 2026 की शुरुआत में ही योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश के करोड़ों लोगों को एक बड़ी राहत दी है। सरकार ने नक्शा पास करने की प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन (Radical Changes) करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है—'ईज ऑफ लिविंग' और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस'।
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि आखिर नए नियम क्या हैं, पुरानी व्यवस्था में क्या खामियां थीं, और इस फैसले का मेरठ, लखनऊ, नोएडा जैसे शहरों के निवासियों पर क्या असर पड़ेगा।
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नया शासनादेश - क्या बदला है?

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प्रमुख सचिव (आवास) पी. गुरुप्रसाद द्वारा जारी किए गए नए निर्देशों ने विकास प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। अब तक जो अधिकारी फाइलों को बिना वजह रोके रखते थे, उनकी जवाबदेही तय कर दी गई है।
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1. NOC के नाम पर उत्पीड़न खत्म

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अब तक नक्शा पास कराने के लिए आवेदकों से ऐसी-ऐसी एनओसी मांगी जाती थीं, जिनका उस निर्माण से कोई सीधा सरोकार नहीं होता था। नए आदेश के मुताबिक:
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    गैर-जरूरी एनओसी पर रोक: अब विकास प्राधिकरण आवेदकों से अनावश्यक विभागों की एनओसी नहीं मांग सकेंगे।
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    सिंगल प्रोफार्मा (Single Proforma): यदि किसी विशेष परिस्थिति में एनओसी की जरूरत पड़ती भी है (जैसे एयरपोर्ट के पास या हाईटेंशन लाइन के पास), तो उसे अलग-अलग फॉर्म भरने के बजाय एक ही 'कॉमन प्रोफार्मा' पर लिया जाएगा। इससे कागजी कार्रवाई आधी रह जाएगी।
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2. 15 दिन का 'टाइम बम' (Deadlines)

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सबसे बड़ा बदलाव समय सीमा को लेकर है। अब तक आपत्तियों (Objections) के नाम पर फाइल को अनिश्चित काल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता था।
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    नया नियम: यदि किसी नक्शे में कोई तकनीकी खामी है, तो विभाग को 15 दिनों के भीतर उसका निस्तारण करना होगा या आवेदक को स्पष्ट कारण बताना होगा।
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    अर्थ: अधिकारी अब फाइल पर कुंडली मारकर नहीं बैठ सकते। 15 दिन बीतते ही उन्हें जवाब देना होगा कि नक्शा पास क्यों नहीं हुआ।
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3. 'लखनऊ मॉडल' पूरे प्रदेश में लागू

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लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने पिछले कुछ समय में अपनी नक्शा पास करने की प्रक्रिया को काफी हद तक डिजिटल और पारदर्शी बनाया है। सरकार ने अब आदेश दिया है कि:
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    प्रदेश के सभी विकास प्राधिकरण (चाहे वह मेरठ का MDA हो, गाजियाबाद का GDA हो या कानपुर का KDA) लखनऊ मॉडल को अपनाएंगे।
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    जो प्रक्रिया राजधानी में सफल रही है, उसे अन्य जिलों में भी लागू किया जाएगा ताकि एकरूपता (Uniformity) बनी रहे।
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आंकड़ों का सच - क्यों पड़ी बदलाव की जरूरत?

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सरकार को यह सख्त कदम क्यों उठाना पड़ा, इसकी गवाही खुद सरकारी आंकड़े दे रहे हैं। आवास विभाग द्वारा जारी की गई ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली है।
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दिसंबर 2025 तक की स्थिति (एक नजर में):

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विवरण
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संख्या
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प्रतिशत (लगभग)
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कुल नक्शे जमा हुए
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2,517
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100%
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पास हुए नक्शे
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596
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23.6%
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रिजेक्ट हुए नक्शे
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373
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14.8%
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लंबित (Pending) नक्शे
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1,544
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61.6%
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ये आंकड़े बताते हैं कि सिस्टम कितना सुस्त है। कुल आवेदनों में से 60% से ज्यादा नक्शे अभी भी 'पेंडिंग' लिस्ट में हैं। यानी 1500 से ज्यादा परिवार या प्रोजेक्ट्स ऐसे हैं जो सिर्फ इसलिए शुरू नहीं हो पा रहे क्योंकि उनकी फाइल किसी बाबू की मेज पर अटकी है।
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प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद ने इसी आंकड़े को देखते हुए सख्त लहजे में कहा है कि "बिना किसी ठोस वजह के नक्शों को रोकना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।"
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पांच सदस्यीय 'सुधार समिति' का गठन

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सरकार ने केवल आदेश नहीं दिया, बल्कि इसे लागू करने के लिए एक तंत्र (Mechanism) भी विकसित किया है। आवास विभाग ने एक पांच सदस्यीय उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया है।
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समिति का कार्य:

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  1. \r\n
    नियमों की समीक्षा: यह टीम देखेगी कि वर्तमान में कौन से नियम ऐसे हैं जो प्रक्रिया को जटिल बना रहे हैं।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    सिफारिशें: समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी कि प्रक्रिया को और अधिक सरल कैसे बनाया जाए।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    कैबिनेट मंजूरी: समिति की सिफारिशों को सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता वाली कैबिनेट बैठक में रखा जाएगा। वहां से मंजूरी मिलते ही ये सिफारिशें 'कानून' का रूप ले लेंगी।
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  6. \r\n
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यह दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर कितनी गंभीर है। यह केवल एक विभागीय आदेश नहीं, बल्कि एक नीतिगत बदलाव (Policy Shift) है।
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हेरिटेज और सामान्य इलाकों में अंतर

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सरकार ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए शहर के अलग-अलग हिस्सों के लिए अलग-अलग नियम तय किए हैं।
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A. सामान्य रिहायशी इलाके (Residential Areas)

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नए विकसित हो रहे इलाको या सामान्य कॉलोनियों में नक्शा पास कराना अब 'फास्ट ट्रैक' पर होगा। यहाँ एनओसी की अनिवार्यता को लगभग समाप्त कर दिया जाएगा, बशर्ते आप 'बिल्डिंग बायलॉज' (Building Bye-laws) का पालन कर रहे हों।
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B. हेरिटेज और शासकीय क्षेत्र (Heritage Zones)

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पुराने शहर, ऐतिहासिक इमारतों के पास या अति-संवेदनशील सरकारी क्षेत्रों (जैसे छावनी के पास) में अभी भी एनओसी की प्रक्रिया लागू रहेगी।
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  • \r\n
    कारण: यह सुरक्षा और शहर की ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
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  • \r\n
    सुधार: हालांकि, यहाँ भी प्रक्रिया को ऑनलाइन किया जाएगा ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
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मेरठ और पश्चिमी यूपी के लिए इसके मायने

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विशेषकर मेरठ, गाजियाबाद और नोएडा, रियल एस्टेट का हब है। दिल्ली-एनसीआर के करीब होने के कारण यहाँ निर्माण कार्य बहुत तेजी से होते हैं।
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मेरठ विकास प्राधिकरण (MDA) के संदर्भ में:

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मेरठ में रैपिड रेल (Namo Bharat) के आने के बाद से प्रॉपर्टी की मांग बढ़ी है। लेकिन नक्शा पास कराने में आने वाली दिक्कतों के कारण कई बार लोग अवैध निर्माण (Illegal Construction) का रास्ता चुन लेते थे।
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  • \r\n
    अवैध निर्माण पर चोट: जब नक्शा आसानी से पास होगा, तो लोग अवैध निर्माण करने के बजाय वैध रास्ता चुनेंगे। इससे MDA की आय बढ़ेगी और शहर का विकास नियोजित (Planned) तरीके से होगा।
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  • \r\n
    भ्रष्टाचार में कमी: मेरठ और आसपास के इलाकों में नक्शा पास कराने के लिए 'सुविधा शुल्क' (रिश्वत) की शिकायतें आम रही हैं। ऑनलाइन प्रक्रिया और एनओसी खत्म होने से बिचौलियों (Middlemen) का धंधा बंद होगा।
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अब कैसे पास होगा नक्शा? (स्टेप-बाय-स्टेप गाइड)

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इस नए बदलाव के बाद, एक आम पाठक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब प्रक्रिया क्या होगी? आइए समझते हैं:
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  1. \r\n
    ऑनलाइन आवेदन (OBPAS): उत्तर प्रदेश सरकार के 'Online Building Plan Approval System' (OBPAS) पोर्टल पर जाएं।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    आर्किटेक्ट का चयन: एक पंजीकृत आर्किटेक्ट से अपने घर का नक्शा बनवाएं जो 'उपविधि-2025' के मानकों के अनुरूप हो।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    दस्तावेज अपलोड: अब आपको 10 तरह की एनओसी अपलोड करने की जरूरत नहीं होगी। केवल स्वामित्व (Ownership) के कागज और बेसिक आईडी प्रूफ लगेंगे।
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  6. \r\n
  7. \r\n
    फीस का भुगतान: ऑनलाइन गेटवे के माध्यम से फीस जमा करें।
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  8. \r\n
  9. \r\n
    स्वते: मंजूरी (Deemed Approval): छोटे प्लॉट (निश्चित वर्ग मीटर तक) के लिए अगर आपने सभी मानक पूरे किए हैं, तो आपको तुरंत प्रोविजनल मंजूरी मिल सकती है।
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  10. \r\n
  11. \r\n
    15 दिन का इंतजार: बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए विभाग के पास जांच के लिए 15 दिन होंगे। अगर 15 दिन में कोई आपत्ति नहीं आई, तो आपका नक्शा पास माना जाएगा।
    \r\n
  12. \r\n
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रियल एस्टेट सेक्टर और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

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यह फैसला केवल एक घर बनाने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है, इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था (Economy) पर भी पड़ेगा।
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  • \r\n
    प्रोजेक्ट्स की रफ्तार: बिल्डर्स और डेवलपर्स के प्रोजेक्ट्स जो महीनों तक एनओसी में लटके रहते थे, अब समय पर पूरे होंगे।
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  • \r\n
  • \r\n
    लागत में कमी: प्रोजेक्ट में देरी होने से 'कंस्ट्रक्शन कॉस्ट' बढ़ जाती है, जिसका बोझ अंततः खरीदार (Buyer) पर पड़ता है। प्रक्रिया तेज होने से घरों की कीमत स्थिर रह सकती है।
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  • \r\n
  • \r\n
    निवेश को बढ़ावा: 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की रैंकिंग में यूपी और ऊपर जाएगा, जिससे बाहरी निवेशक यहाँ होटल, मॉल और हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने के लिए आकर्षित होंगे।
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  • \r\n
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चुनौतियां - राह अब भी आसान नहीं

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हालांकि सरकार की मंशा साफ है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लागू करने में कुछ चुनौतियां आ सकती हैं:
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  1. \r\n
    अधिकारियों की मानसिकता: सालों से चली आ रही 'बाबूगिरी' की मानसिकता को बदलना एक बड़ी चुनौती होगी। क्या अधिकारी वाकई 15 दिन की समय सीमा का पालन करेंगे?
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  2. \r\n
  3. \r\n
    पोर्टल की तकनीकी दिक्कतें: OBPAS पोर्टल पर अक्सर सर्वर डाउन या तकनीकी ग्लिच की शिकायतें आती हैं। इसे सुधारा जाना बेहद जरूरी है।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    जन जागरूकता: आम जनता को अभी भी यह नहीं पता कि नक्शा पास कराने के नियम क्या हैं। वे आज भी ठेकेदारों के भरोसे रहते हैं। सरकार को व्यापक जागरूकता अभियान चलाना होगा।
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  6. \r\n
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'अपना घर' अब नहीं रहेगा सपना

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उत्तर प्रदेश सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है। यह 'मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस' (Minimum Government, Maximum Governance) का एक बेहतरीन उदाहरण है। नक्शा पास कराने की प्रक्रिया का सरलीकरण न केवल भ्रष्टाचार पर प्रहार है, बल्कि यह उस आम आदमी के सम्मान की बहाली है जो अपना घर बनाने के लिए सरकारी दफ्तरों के आगे लाचार खड़ा रहता था।
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अगर यह नीति सही तरीके से लागू होती है, तो आने वाले दिनों में हम उत्तर प्रदेश के शहरों को अधिक व्यवस्थित, सुंदर और कानूनी रूप से विकसित होते देखेंगे। अब गेंद विकास प्राधिकरणों के पाले में है कि वे सरकार के इस 'विजन' को कितनी ईमानदारी से 'मिशन' में बदलते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

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Q1: क्या अब मुझे किसी भी विभाग से NOC नहीं लेनी होगी?
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A: सामान्य रिहायशी मकानों के लिए ज्यादातर विभागों की NOC खत्म कर दी गई है। लेकिन अगर आपका प्लॉट किसी संरक्षित स्मारक, हाईटेंशन लाइन, या एयरपोर्ट के पास है, तो आपको NOC लेनी होगी, लेकिन वह भी अब आसान प्रक्रिया से मिलेगी।
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Q2: अगर 15 दिन में नक्शा पास नहीं हुआ तो क्या होगा?
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A: नए नियमों के अनुसार, अधिकारियों को 15 दिन के भीतर कारण बताना होगा। अगर वे बिना कारण फाइल रोकते हैं, तो आप उच्च अधिकारियों या 'जनसुनवाई पोर्टल' पर शिकायत कर सकते हैं और उन पर कार्यवाही होगी।
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Q3: यह नियम कब से लागू होगा?
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A: प्रमुख सचिव ने निर्देश जारी कर दिए हैं। सभी विकास प्राधिकरणों को इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने को कहा गया है। लखनऊ में यह पहले से आंशिक रूप से लागू है।
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Q4: क्या नक्शा पास कराने की फीस में भी कोई बदलाव हुआ है?
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A: फिलहाल फीस में बदलाव की कोई सूचना नहीं है। यह बदलाव केवल प्रक्रिया (Process) को सरल बनाने के लिए है।
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