उत्तर प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए नए साल की शुरुआत एक बड़े झटके के साथ हो सकती है। प्रदेश में जिस जोर-शोर से 'मुफ्त' स्मार्ट प्रीपेड मीटर (Smart Prepaid Meters) लगाने का अभियान चल रहा है, उसके पीछे की असली कीमत अब सामने आने लगी है। यह 'मुफ्त' की सौगात असल में उपभोक्ताओं की जेब पर एक बड़े बोझ की तरह गिरने वाली है।READ ALSO:-मेरठ में बढ़ी स्कूल की छुट्टियां: कड़ाके की ठंड के कारण 24 और 26 दिसंबर को भी अवकाश, अब सीधे 29 दिसंबर को खुलेंगे स्कूल
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उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) प्रबंधन ने मौजूदा उपभोक्ताओं के घरों में लगाए जा रहे इन स्मार्ट मीटरों की लागत वसूलने के लिए एक बड़ा दांव चला है। प्रबंधन ने परोक्ष रूप से बिजली की दरों में छह से सात प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का खाका तैयार कर लिया है। इसके लिए विद्युत नियामक आयोग (Electricity Regulatory Commission) में बाकायदा एक प्रस्ताव भी दाखिल कर दिया गया है, जिसमें स्मार्ट मीटर पर आने वाले हजारों करोड़ रुपये के खर्च का बोझ टैरिफ के जरिए आम जनता से वसूलने की मांग की गई है।
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यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब महंगाई पहले ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है। अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो इसका सीधा असर हर महीने आने वाले बिजली के बिल पर पड़ेगा। हालांकि, इस प्रस्ताव के खिलाफ उपभोक्ता संगठनों ने भी मोर्चा खोल दिया है, जिससे आने वाले दिनों में नियामक आयोग में एक बड़ी बहस देखने को मिल सकती है।
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क्या है पावर कॉरपोरेशन का 'महंगा' प्रस्ताव?

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पावर कॉरपोरेशन का तर्क है कि प्रदेश भर में पुराने मीटरों को बदलकर उनकी जगह अत्याधुनिक स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में एक भारी-भरकम लागत आ रही है। कॉरपोरेशन का मानना है कि यह खर्च अंततः उपभोक्ताओं से ही वसूला जाना चाहिए।
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प्राप्त जानकारी के अनुसार, पावर कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक पंकज कुमार की ओर से विद्युत नियामक आयोग में वर्ष 2026-27 के लिए बिजली दर (Tariff) का प्रस्ताव दाखिल किया गया है। इस प्रस्ताव के सबसे विवादास्पद हिस्से में स्मार्ट प्रीपेड मीटर की लागत को शामिल किया गया है।
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    3837 करोड़ का बोझ: कॉरपोरेशन ने अपने प्रस्ताव में स्मार्ट प्रीपेड मीटर परियोजना के मद में लगभग 3837 करोड़ रुपये का खर्च दिखाया है।
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    टैरिफ में बढ़ोतरी का गणित: प्रस्ताव के मुताबिक, यदि नियामक आयोग इस 3837 करोड़ रुपये के खर्च को वार्षिक राजस्व आवश्यकता (ARR) में शामिल करने की स्वीकृति दे देता है, तो इसका सीधा असर बिजली की प्रति यूनिट दर पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का आकलन है कि केवल स्मार्ट मीटर के इस खर्च की भरपाई के लिए ही मौजूदा बिजली दरों में 6% से 7% तक की तत्काल बढ़ोतरी करनी पड़ेगी।
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यह बढ़ोतरी अन्य किसी भी संभावित टैरिफ हाइक से अलग होगी। यानी, अगर कोयला महंगा होने या अन्य कारणों से बिजली दरें बढ़ती हैं, तो स्मार्ट मीटर का यह 7% का बोझ उसके ऊपर से अतिरिक्त होगा।
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उपभोक्ता परिषद का विरोध: केंद्र के आदेश का हवाला

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पावर कॉरपोरेशन के इस प्रस्ताव की भनक लगते ही उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद (U.P. Rajya Vidyut Upbhokta Parishad) सक्रिय हो गया है। परिषद ने इस प्रस्ताव को उपभोक्ताओं के साथ धोखा करार देते हुए इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया है।
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परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने तत्काल विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार से मुलाकात की और कॉरपोरेशन के प्रस्ताव के खिलाफ अपना प्रति-प्रस्ताव (Counter-Proposal) दाखिल किया। परिषद की मांग स्पष्ट है—स्मार्ट प्रीपेड मीटर के नाम पर बिजली दरों में एक पैसे की भी बढ़ोतरी नहीं होनी चाहिए और कॉरपोरेशन के प्रस्ताव को सिरे से खारिज किया जाना चाहिए।
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विरोध के मुख्य आधार:

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    भारत सरकार की एडवाइजरी का उल्लंघन: अवधेश वर्मा ने आयोग के सामने भारत सरकार द्वारा जारी एक स्पष्ट आदेश का हवाला दिया है। उन्होंने बताया कि सितंबर 2023 में केंद्र सरकार ने एक एडवाइजरी जारी की थी। इस आदेश में दो टूक कहा गया था कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने का कोई भी खर्च उपभोक्ताओं पर (Pass through) नहीं डाला जाएगा। केंद्र सरकार का मानना है कि यह एक ढांचागत सुधार है जिसका बोझ जनता पर नहीं पड़ना चाहिए।
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    घाटा नहीं, फायदे का सौदा: वर्मा ने आयोग का ध्यान केंद्र सरकार के उस आकलन की ओर भी खींचा, जिसमें कहा गया था कि स्मार्ट मीटर लगने से बिजली कंपनियों को फायदा होगा, नुकसान नहीं। आदेश के मुताबिक, प्रदेश में स्मार्ट मीटर लगने के बाद चोरी रुकेगी, बिलिंग दक्षता बढ़ेगी, और इससे प्रति मीटर 18 रुपये से लेकर 40 रुपये तक का वित्तीय लाभ (Financial Benefit) बिजली कंपनियों को होगा।
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    गलत आधार पर प्रस्ताव: उपभोक्ता परिषद का आरोप है कि पावर कॉरपोरेशन जिस एडवाइजरी के आधार पर खर्च का बोझ डालना चाहता है, वह आधार ही गलत है और केंद्र के नवीनतम निर्देशों के विपरीत है। जब केंद्र सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि यह खर्चीला नहीं बल्कि लाभकारी कदम है, तो फिर 3837 करोड़ रुपये का बोझ जनता पर क्यों?
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मंत्री का वादा बनाम विभाग का इरादा: 'विश्वासघात' का आरोप

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इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला पहलू सरकार के कथनी और करनी का अंतर है। यह मुद्दा अब राजनीतिक तूल भी पकड़ता जा रहा है क्योंकि यह सीधे तौर पर सरकार के वादों से जुड़ा है।
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उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह उपभोक्ताओं के साथ सीधा "अन्याय और विश्वासघात" है। उन्होंने याद दिलाया कि एक तरफ प्रदेश के ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा (Energy Minister AK Sharma) विधानसभा के पटल पर खड़े होकर यह आश्वासन देते हैं कि पुराने मीटर के बदले जाने पर मौजूदा उपभोक्ताओं से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। सरकार का यह स्टैंड रहा है कि मीटर बदलना विभाग की जिम्मेदारी है और यह प्रक्रिया पूरी तरह निःशुल्क है।
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वहीं दूसरी तरफ, उन्हीं के अधीन आने वाला पावर कॉरपोरेशन विभाग गुपचुप तरीके से नियामक आयोग में प्रस्ताव दाखिल कर उसी 'निःशुल्क' मीटर की कीमत 3837 करोड़ रुपये आंकते हुए उसे टैरिफ के जरिए वसूलने की योजना बना रहा है। यह विरोधाभास जनता के बीच भ्रम और अविश्वास पैदा कर रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या 'मुफ्त' का मतलब सिर्फ मीटर लगाते वक्त पैसे न लेना है, और बाद में उसे किस्तों में बिल के जरिए वसूलना है?
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उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर?

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अगर नियामक आयोग पावर कॉरपोरेशन के तर्कों से सहमत होकर इस प्रस्ताव को हरी झंडी दे देता है, तो इसका सीधा असर आम आदमी के मासिक बजट पर पड़ेगा।
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    बिल में उछाल: एक मध्यमवर्गीय परिवार, जिसका औसतन बिजली बिल 2000 रुपये आता है, उसे 6-7% की बढ़ोतरी के बाद हर महीने लगभग 120 से 140 रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ सकते हैं। सालाना यह बोझ 1500 से 1700 रुपये तक बढ़ जाएगा।
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    प्रीपेड का दबाव: स्मार्ट प्रीपेड मीटर का मतलब है कि पहले रिचार्ज करें, फिर बिजली इस्तेमाल करें। बढ़ी हुई दरों के साथ, रिचार्ज की राशि जल्दी खत्म होगी, जिससे उपभोक्ताओं पर बार-बार रिचार्ज करने का मानसिक और वित्तीय दबाव बढ़ेगा।
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    कमर्शियल कनेक्शन पर मार: घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ इसका असर छोटे दुकानदारों और उद्योगों पर भी पड़ेगा, जिससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और अंततः महंगाई में और इजाफा होगा।
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आगे की राह: आयोग के पाले में गेंद

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अब सबकी निगाहें विद्युत नियामक आयोग पर टिकी हैं। आयोग को एक तरफ पावर कॉरपोरेशन के वित्तीय घाटे और इंफ्रास्ट्रक्चर कॉस्ट के तर्कों को देखना है, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार की स्पष्ट गाइडलाइन और उपभोक्ताओं के हितों का ध्यान रखना है।
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आने वाले दिनों में आयोग इस प्रस्ताव पर जनसुनवाई (Public Hearing) की प्रक्रिया शुरू करेगा। यह तय है कि इस सुनवाई में जबरदस्त हंगामा देखने को मिलेगा। उपभोक्ता परिषद ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर स्मार्ट मीटर की लागत को टैरिफ में जुड़ने नहीं देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कानूनी लड़ाई ही क्यों न लड़नी पड़े।
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फिलहाल, उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए संदेश साफ है—'मुफ्त' स्मार्ट मीटर का जश्न मनाने से पहले, उसके पीछे छिपे संभावित 'महंगे' बिल के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना जरूरी है, जब तक कि नियामक आयोग इस पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना देता।
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