लखनऊ (Power, Politics & Utility Desk): उत्तर प्रदेश के पावर सेक्टर में इन दिनों एक बड़े घोटाले और प्रशासनिक मनमानी की सुगबुगाहट तेज हो गई है। प्रदेश सरकार द्वारा उपभोक्ताओं को निर्बाध और पारदर्शी बिजली आपूर्ति देने के बड़े-बड़े दावों के बीच एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। मामला 'स्मार्ट प्रीपेड मीटर' (Smart Prepaid Meter) की जबरन स्थापना से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद (UP State Electricity Consumer Council) ने राज्य के पावर कारपोरेशन (UPPCL) पर सीधे तौर पर 'संविधान की धज्जियां उड़ाने' और 'फर्जीवाड़े' का आरोप लगाया है।READ ALSO:-मेरठ पुलिस बनी तस्करों का 'काल': लोहिया नगर के बाद मवाना में बड़ा एक्शन; जिम के पास से हथियारों का भारी जखीरा बरामद
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परिषद का दावा है कि उत्तर प्रदेश में एक ऐसे नियम के आधार पर आम जनता को लूटा जा रहा है और उन पर नियम थोपे जा रहे हैं, जिसे भारत सरकार खुद ही कई हफ्तों पहले मृत और निरस्त (Expired and Cancelled) घोषित कर चुकी है। इस गंभीर प्रशासनिक अंधेरगर्दी और तानाशाही के खिलाफ उपभोक्ता परिषद ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए प्रदेश और केंद्र सरकार से इस पूरे प्रकरण की तत्काल प्रभाव से 'सीबीआई' (CBI) जांच कराने की मांग कर दी है।
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क्या है पूरा विवाद? रद्द अधिसूचना का कैसे हो रहा है खुला खेल

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इस पूरे विवाद और कथित फर्जीवाड़े को समझने के लिए हमें कुछ महीने पीछे जाना होगा। पावर कारपोरेशन के जिस आदेश को लेकर बवाल मचा है, उसके तार केंद्र सरकार की एक पुरानी गाइडलाइन से जुड़े हैं।
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    यूपीपीसीएल का 10 सितंबर 2025 का फरमान: उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के प्रबंधन ने 10 सितंबर 2025 को पूरे राज्य के लिए एक सख्त और एकतरफा आदेश जारी किया था। इस आदेश में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि भविष्य में प्रदेश के भीतर जो भी नया बिजली कनेक्शन (New Electricity Connection) जारी किया जाएगा, उसमें केवल और केवल 'स्मार्ट मीटर' ही लगाया जाएगा और वह भी 'प्रीपेड मोड' (Prepaid Mode) में होगा। यानी उपभोक्ता को मोबाइल फोन की तरह पहले अपने मीटर को रिचार्ज करना होगा, तभी उसके घर का बल्ब जलेगा।
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    केंद्र के जिस नियम का दिया गया था हवाला: अपने इस तुगलकी फरमान को कानूनी रूप से सही ठहराने के लिए यूपीपीसीएल ने भारत सरकार के 'केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण' (Central Electricity Authority - CEA) की 28 फरवरी 2022 को जारी की गई एक अधिसूचना (Notification) का ढाल की तरह इस्तेमाल किया था। उस अधिसूचना में तकनीकी रूप से प्रीपेड मोड में नया कनेक्शन देने की बात कही गई थी।
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उपभोक्ता परिषद की कानूनी जंग और केंद्र सरकार का यू-टर्न

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उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने शुरुआत से ही पावर कारपोरेशन के इस फैसले का कड़ा विरोध किया था। परिषद का तर्क था कि यह फैसला आम जनता, विशेषकर ग्रामीण और गरीब तबके के खिलाफ है। कानूनी मोर्चे पर लड़ते हुए परिषद ने यह सिद्ध किया कि किसी भी उपभोक्ता को जबरन 'प्रीपेड मोड' में धकेलना 'विद्युत अधिनियम 2003' (Electricity Act 2003) की धारा 47(5) की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है।
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उपभोक्ता परिषद की इस लंबी कानूनी, तकनीकी और प्रशासनिक लड़ाई का असर भी हुआ। लगातार बढ़ते दबाव और कानूनी खामियों को स्वीकार करते हुए, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने आखिरकार अपनी 28 फरवरी 2022 की उस विवादित अधिसूचना में बड़ा संशोधन किया। भारत सरकार ने स्पष्ट आदेश जारी करते हुए 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में 'स्मार्ट प्रीपेड मोड' की अनिवार्यता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया।
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यूपीपीसीएल की हठधर्मिता: आज भी थोपा जा रहा है 'कैंसिल' नियम

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इस पूरे प्रकरण का सबसे चौंकाने वाला और विवादित पहलू यह है कि केंद्र सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2026 को नियम समाप्त किए जाने के बावजूद, उत्तर प्रदेश का पावर कारपोरेशन आज भी गहरी नींद में होने का नाटक कर रहा है। उपभोक्ता परिषद द्वारा साक्ष्यों के साथ यह खुलासा किया गया है कि यूपीपीसीएल आज भी उसी पुराने, रद्द और मृत हो चुके आदेश के आधार पर काम कर रहा है।
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पूरे उत्तर प्रदेश में आज भी धड़ल्ले से नए बिजली कनेक्शनों को केवल 'प्रीपेड मोड' में ही जारी किया जा रहा है। आम उपभोक्ता जब पोस्टपेड (Postpaid) कनेक्शन की मांग करता है, तो स्थानीय बिजली विभाग के अधिकारी उसी पुराने आदेश का हवाला देकर उन्हें वापस लौटा देते हैं। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने पावर कारपोरेशन के इस रवैये को पूरी तरह से "असंवैधानिक", "गैरकानूनी" और "घोर उपभोक्ता विरोधी" करार दिया है।
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प्रदेश के ऊर्जा मंत्री की 'रहस्यमयी चुप्पी' पर उठे तीखे सवाल

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उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा (Awadhesh Kumar Verma) ने इस मुद्दे पर सत्ता के शीर्ष तक निशाना साधा है। उन्होंने पावर कारपोरेशन के अधिकारियों पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि विभाग जानबूझकर और एक सोची-समझी साजिश के तहत भारत सरकार की समाप्त हो चुकी अधिसूचना का हवाला देकर प्रदेश के लाखों उपभोक्ताओं को गुमराह कर रहा है।
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वर्मा ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए सीधे तौर पर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री (Energy Minister) को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा, "यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री, जो पूर्व में भारत सरकार में एक वरिष्ठ नौकरशाह के रूप में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं, वे इस तकनीकी और कानूनी फर्जीवाड़े की गंभीरता को समझने में पूरी तरह से विफल प्रतीत हो रहे हैं। उनकी चुप्पी रहस्यमयी है। ऐसा लगता है कि वे इस पूरी तानाशाही को चुपचाप बैठकर देख रहे हैं और पावर कारपोरेशन के बेलगाम अधिकारियों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।"
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आम उपभोक्ता पर क्या पड़ रहा है इसका सीधा असर?

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जबरन प्रीपेड मीटर थोपे जाने का सबसे बड़ा खामियाजा आम आदमी, मध्यम वर्ग और किसानों को भुगतना पड़ रहा है:
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    आर्थिक बोझ (Financial Burden): पोस्टपेड व्यवस्था में उपभोक्ता को बिजली इस्तेमाल करने के बाद महीने के अंत में बिल चुकाना होता है, जिससे उसे वित्तीय प्रबंधन का समय मिलता है। प्रीपेड में उसे पहले से ही एकमुश्त पैसा फंसाकर रखना पड़ता है।
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    अचानक बिजली कटने का डर: गरीब परिवारों के पास हमेशा नकद पैसा नहीं होता। रिचार्ज खत्म होते ही बिना किसी पूर्व चेतावनी के रात के अंधेरे में या भीषण गर्मी में बिजली काट दी जाती है, जो मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है।
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    विकल्प की स्वतंत्रता छीनी गई: उपभोक्ता का यह बुनियादी अधिकार है कि वह प्रीपेड या पोस्टपेड में से अपनी सुविधानुसार किसी एक का चुनाव करे। यूपीपीसीएल का यह फरमान उनकी इस स्वतंत्रता को छीन रहा है।
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क्यों जरूरी है इस मामले की सीबीआई (CBI) जांच?

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राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने अपनी शिकायत में एक बहुत बड़े आर्थिक घोटाले (Economic Scam) की ओर इशारा किया है। परिषद का आरोप है कि इस जबरन प्रीपेड व्यवस्था के पीछे मीटर बनाने वाली निजी कंपनियों, टेंडर माफियाओं और विभाग के कुछ भ्रष्ट आला अधिकारियों की गहरी 'मिलीभगत' (Nexus) हो सकती है।
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करोड़ों रुपये के टेंडर और निजी कंपनियों को सीधा लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से ही रद्द नियमों को जानबूझकर जिंदा रखा गया है। इसी आशंका के मद्देनजर उपभोक्ता परिषद ने केंद्र और राज्य सरकार को कड़ा पत्र लिखकर मांग की है कि इस पूरे मामले की बिना किसी देरी के 'सीबीआई' (CBI) या किसी अन्य उच्च स्तरीय और स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराई जाए। परिषद की मांग है कि दोषियों की पहचान कर उन पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाए, ताकि प्रदेश के ईमानदार बिजली उपभोक्ताओं को न्याय मिल सके।
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अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि उपभोक्ता परिषद के इस कड़े रुख और सीबीआई जांच की मांग के बाद उत्तर प्रदेश सरकार और ऊर्जा मंत्रालय अपनी कुंभकर्णी नींद से जागते हैं, या फिर प्रदेश की जनता को 'स्मार्ट मीटर' के नाम पर यूं ही ठगा जाता रहेगा।
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