उत्तर प्रदेश की राजनीति (UP Politics) में जातियों का गणित बिठाना किसी भी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर जिस तरह से जातियों के आधार पर अलग-अलग लामबंदी की खबरें सामने आईं, उसने पार्टी हाईकमान के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी थीं। लेकिन अब पार्टी नेतृत्व ने इस पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए 'विभाजन' को 'एकता' में बदलने का मास्टरप्लान तैयार कर लिया है।READ ALSO:-Love Across Borders: अलीगढ़ के 'रांझा' ने पाकिस्तान में काटी एक साल की 'काल-कोठरी'; फेसबुक वाली 'सना' के इश्क में लांघी थी सरहद, अब रिहाई के बाद वतन वापसी का इंतजार
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केंद्रीय नेतृत्व के सख्त निर्देश के बाद अब यूपी में ब्राह्मण और क्षत्रिय (ठाकुर) विधायक अलग-अलग गुटों में नहीं, बल्कि एक साथ नजर आएंगे। पार्टी ने 'जातीय गेट-टू-गेदर' (Get-together) की जगह अब 'संयुक्त सहभोज' की रणनीति बनाई है। बहुत जल्द राजधानी लखनऊ में एक बड़ा आयोजन होने वाला है, जहां ये दोनों प्रभावशाली समुदाय एक साथ भोजन करेंगे।
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क्यों पड़ी इस 'डैमेज कंट्रोल' की जरूरत?

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यह पूरा घटनाक्रम हाल ही में हुए शीतकालीन विधानसभा सत्र के दौरान शुरू हुआ विवाद है। दरअसल, 23 दिसंबर को लखनऊ में कुशीनगर से भाजपा विधायक पंचानंद पाठक (Panchanand Pathak) के आवास पर एक 'भोज' का आयोजन किया गया था। इसमें करीब 40-50 ब्राह्मण विधायक और एमएलसी शामिल हुए।
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इस बैठक में देवरिया से विधायक शलभमणि त्रिपाठी और रत्नाकर मिश्रा जैसे कद्दावर चेहरे मौजूद थे। हालांकि आयोजकों ने इसे एक सामान्य सामाजिक मुलाकात बताया था, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे 'शक्ति प्रदर्शन' और ब्राह्मणों की नाराजगी के तौर पर देखा गया।
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विपक्ष ने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। समाजवादी पार्टी (SP) के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव (Shivpal Singh Yadav) ने तो यहां तक कह दिया कि अगर ब्राह्मण विधायक बीजेपी में अपमानित महसूस कर रहे हैं, तो सपा के दरवाजे उनके लिए खुले हैं। इससे पहले मानसून सत्र में क्षत्रिय विधायकों ने भी 'कुटुंब परिवार' के नाम से एक अलग बैठक की थी, जिसमें 40 ठाकुर विधायक जुटे थे। इन अलग-अलग बैठकों ने पार्टी के भीतर 'जातीय गोलबंदी' का खतरा पैदा कर दिया था।
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नेतृत्व की सख्ती: "पार्टी सर्वस्पर्शी है, जातिवादी नहीं"

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इन खबरों के तूल पकड़ते ही यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी (Pankaj Chaudhary) ने कड़े शब्दों में नाराजगी जाहिर की। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि पार्टी के सिद्धांतों के खिलाफ जाने वाली किसी भी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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नेतृत्व ने साफ किया है कि बीजेपी किसी एक जाति या वर्ग की पार्टी नहीं है, बल्कि 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र पर चलती है। सूत्रों के मुताबिक, अलग बैठक करने वाले विधायकों को नेतृत्व की तरफ से फोन करके सतर्क रहने और भविष्य में ऐसी गुटबाजी से बचने की हिदायत दी गई है।
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अब 'तोड़ने' वाली नहीं, 'जोड़ने' वाली बैठकें होंगी

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बीजेपी के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अब तक जो 'गेट-टू-गेदर' जातियों को बांटने का काम कर रही थीं, अब उनका स्वरूप बदलकर उन्हें जोड़ने वाला बनाया जाएगा।
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प्लान के मुताबिक:

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    पहला चरण: सबसे पहले ब्राह्मण और क्षत्रिय विधायकों का एक संयुक्त भोज (Joint Dinner) आयोजित होगा। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि पार्टी के दो सबसे मजबूत स्तंभों में कोई मतभेद नहीं है।
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    दूसरा चरण: इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दलित विधायकों के साथ भी सवर्ण विधायकों के संयुक्त कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
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    मकसद: 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के भीतर 'ऑल इज वेल' का संदेश जनता और कार्यकर्ताओं तक पहुंचाना।
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यूपी का सियासी गणित: ब्राह्मण और ठाकुर क्यों हैं अहम?

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उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी काफी हद तक इन दो समुदायों के हाथ में रहती है। विधानसभा के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति कुछ ऐसी है:
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    ब्राह्मण विधायक: कुल 52 (अधिकतर बीजेपी से)।
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    क्षत्रिय विधायक: कुल 49 (अधिकतर बीजेपी से)।
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राज्य की करीब 100 से 150 सीटों पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश (Purvanchal) और अवध क्षेत्र में क्षत्रिय समुदाय का गहरा प्रभाव है। 2022 के चुनाव में बीजेपी को इन दोनों वर्गों का बंपर वोट मिला था। ऐसे में पार्टी 2027 से पहले अपने इस कोर वोट बैंक में किसी भी तरह की सेंधमारी या नाराजगी का जोखिम नहीं उठा सकती।
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विश्लेषकों की राय: "विपक्ष के हथियार को कुंद करने की कोशिश"

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राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अविनाश मिश्रा (Avinash Mishra) का कहना है, "यह बीजेपी की एक सोची-समझी रणनीति है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) लगातार विकास और राष्ट्रवाद की बात करते हैं, लेकिन जाति की वास्तविकता को यूपी में नकारा नहीं जा सकता। विपक्ष लगातार बीजेपी को सवर्ण विरोधी या पिछड़ा विरोधी साबित करने में लगा रहता है। ऐसे में संयुक्त भोज के जरिए बीजेपी अपने 'समरसता' के एजेंडे को धार देना चाहती है। अगर यह प्रयोग सफल रहा, तो विपक्ष के जातिवादी आरोपों की हवा निकल जाएगी।"
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उत्तर प्रदेश बीजेपी में चल रही यह 'लंच और डिनर डिप्लोमेसी' केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की राजनीति की बिसात है। अलग-अलग गुटों में बंटे विधायकों को एक जाजम पर लाना पार्टी के लिए चुनौती है, लेकिन नेतृत्व ने जिस तरह से कमान संभाली है, उससे साफ है कि अनुशासनहीनता के लिए अब कोई जगह नहीं है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जब ब्राह्मण और क्षत्रिय विधायक एक साथ भोजन की मेज पर बैठेंगे, तो उससे निकलने वाला सियासी संदेश 2027 तक कितना असरदार साबित होता है।
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उत्तर प्रदेश बीजेपी ने जाति आधारित अलग-अलग बैठकों पर रोक लगाते हुए अब ब्राह्मण और क्षत्रिय विधायकों के लिए 'संयुक्त भोज' आयोजित करने का फैसला किया है। हाल ही में कुशीनगर विधायक पंचानंद पाठक के घर हुई ब्राह्मण विधायकों की बैठक और उससे पहले हुई क्षत्रिय विधायकों की बैठक से उपजे विवाद को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया गया है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने गुटबाजी पर नाराजगी जताई है। अब 2027 चुनाव को देखते हुए पार्टी एकता का संदेश देने के लिए सभी जातियों के संयुक्त कार्यक्रम करेगी।
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