प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच ठनी। 'कालनेमि' कहने पर सीएम योगी पर पलटवार, डिप्टी सीएम केशव मौर्य को बताया सीएम पद के योग्य। जानें पालकी विवाद से लेकर प
प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज में चल रहे माघ मेले (Magh Mela 2026) की आध्यात्मिक शांति इस बार एक बड़े विवाद की भेंट चढ़ गई है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand Saraswati) और उत्तर प्रदेश प्रशासन के बीच का टकराव अब एक राजनीतिक और धार्मिक महाभारत का रूप ले चुका है। मौनी अमावस्या (18 जनवरी) के दिन शाही स्नान से रोके जाने के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब केवल 'स्नान' तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें 'गो-हत्या', 'कालनेमि' और 'असली-नकली संत' जैसे गंभीर मुद्दे जुड़ गए हैं।READ ALSO:-Meerut News: सिस्टम की 'काली करतूत' ने ली जान! नाले में समाया ई-रिक्शा, 30 मिनट तक तड़पते चालक की दर्दनाक मौत; नोएडा जैसा खौफनाक मंजर
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बीते सात दिनों से अपनी छावनी (शिविर) के बाहर खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने शनिवार को साफ कर दिया कि वह झुकने वाले नहीं हैं। प्रशासन की नोटिस और जमीन रद्द करने की धमकियों पर उन्होंने दो टूक जवाब दिया है—"हम तुम्हारे टुकड़ों पर पलने वाले लोग नहीं हैं।" इतना ही नहीं, उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के 'कालनेमि' वाले बयान पर तीखा पलटवार करते हुए प्रदेश में हो रही गो-हत्याओं का मुद्दा उछाल दिया है और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य (Keshav Prasad Maurya) की तारीफ कर यूपी की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
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VIDEO | Prayagraj: “I will go to court as the notice asking me to prove I am Shankaracharya was issued to defame me”, says Swami Avimukteshwaranand Saraswati. \r\n \r\n(Full video available on PTI Videos - https://t.co/n147TvrpG7) pic.twitter.com/PHnrNM4TfA
प्रयागराज माघ मेला प्रशासन द्वारा शंकराचार्य को एक के बाद एक दो नोटिस भेजे जाने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख और भी कड़ा हो गया है। मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस भेजकर पूछा था कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने के बावजूद वह 'शंकराचार्य' की उपाधि का उपयोग कैसे कर रहे हैं और क्यों न उन्हें आवंटित जमीन और सुविधाएं वापस ले ली जाएं।
इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, "प्रशासन को लगता है कि हम उनकी दी हुई सुविधाओं के मोहताज हैं। हमने उन्हें साफ कह दिया है कि हम किसी के टुकड़ों पर पलने वाले लोग नहीं हैं। मेला प्रशासन चाहे तो आज ही जमीन और सुविधाओं का आवंटन रद्द कर सकता है। हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम यहां धर्म और परंपरा का निर्वाह करने आए थे, सुविधाओं का भोग करने नहीं।"
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उन्होंने आगे कहा, "जब तक प्रशासन अपनी गलती के लिए सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांग लेता और हमें पूरे सम्मान के साथ हमारी पालकी में संगम स्नान नहीं कराता, हम शिविर के अंदर प्रवेश नहीं करेंगे। हम यहीं बाहर धरने पर बैठे रहेंगे। अगर इस साल स्नान नहीं हुआ, तो हम वापस लौट जाएंगे और अगले साल फिर आएंगे, लेकिन अपमान का घूंट पीकर अंदर नहीं जाएंगे।"
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शंकराचार्य का यह बयान स्पष्ट करता है कि यह लड़ाई अब 'आत्मसम्मान' और 'मठ की परंपरा' की रक्षा की लड़ाई बन चुकी है। उनका कहना है कि प्रशासन ने उन्हें नहीं रोका, बल्कि सनातन परंपरा और शंकराचार्य पद की गरिमा को ठेस पहुंचाई है।
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योगी आदित्यनाथ बनाम शंकराचार्य: 'कालनेमि' कौन?
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इस पूरे विवाद में सबसे तीखा मोड़ तब आया जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हरियाणा के सोनीपत में और बाद में एक अन्य सभा में बिना किसी का नाम लिए "कालनेमि" शब्द का इस्तेमाल किया। योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि "कुछ लोग साधु के वेश में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं। ये रामायण के कालनेमि जैसे हैं, जो राम का नाम लेकर हनुमान जी का रास्ता रोकने आए थे। जनता को ऐसे छद्म वेशधारियों से सतर्क रहने की जरूरत है।"
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हालांकि सीएम योगी ने किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन इसका सीधा इशारा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ माना गया, जो सरकार की नीतियों और राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा (अर्धनिर्मित मंदिर मुद्दे) पर लगातार मुखर रहे हैं।
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इस बयान पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने भीषण पलटवार किया। उन्होंने कहा, "यह सवाल तो योगी आदित्यनाथ से ही पूछा जाना चाहिए कि असली कालनेमि कौन है? कालनेमि एक राक्षस था जो संत का चोला पहनकर रामभक्त हनुमान को भ्रमित करने बैठा था। आज संत का चोला किसने पहना है और राजसत्ता का भोग कौन कर रहा है, यह दुनिया देख रही है।"
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"जिसके राज में गाय कट रही, वही है असली कालनेमि"
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शंकराचार्य ने सीएम योगी पर सीधा हमला बोलते हुए उत्तर प्रदेश में गो-हत्या (Cow Slaughter) के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने कहा, "योगी जी के राज में गो-हत्या हो रही है। उन्हीं की पार्टी के विधायक नंद किशोर गुर्जर ने विधानसभा सदन में खड़े होकर कहा कि यूपी में 50 हजार गायें रोज काटी जा रही हैं। नोएडा में गो-मांस का जखीरा पकड़ा जा रहा है। दूसरे राज्यों में यूपी से एक्सपोर्ट किया हुआ मांस मिल रहा है। यह सब किसके राज में हो रहा है? जो व्यक्ति गद्दी पर बैठकर यह सब होने दे रहा है, और ऊपर से संत का चोला भी पहने हुए है, तो बताइए असली कालनेमि कौन है? जो गो-हत्या रोक नहीं पा रहा या हम जो गो-हत्या रोकने की मांग कर रहे हैं?"
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शंकराचार्य ने तंज कसते हुए कहा कि "12 साल से गद्दी पर बैठे हैं, लेकिन गो-हत्या नहीं रोक पाए। वह भी जवाबदेह हैं। केवल बयानवीर बनने से काम नहीं चलेगा। अपराध को सुधारने की अपेक्षा वक्तव्य वीर बन गए हैं।"
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यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि योगी आदित्यनाथ की छवि एक गोरक्षक संत की रही है। ऐसे में एक शंकराचार्य द्वारा उन्हें गो-हत्या के मुद्दे पर घेरना और 'कालनेमि' कहना, भाजपा के कोर हिंदुत्व वोट बैंक में सेंध लगाने जैसा है।
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केशव प्रसाद मौर्य की तारीफ: "इन्हें होना चाहिए सीएम"
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राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा शंकराचार्य द्वारा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य (Keshav Prasad Maurya) की तारीफ को लेकर है। केशव मौर्य ने हाल ही में सोशल मीडिया और बयानों के जरिए शंकराचार्य के प्रति नरमी दिखाई थी। मौर्य ने कहा था, "शंकराचार्य जी हमारे लिए पूज्य हैं। मैं उनके चरणों में प्रणाम करता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि वे स्नान कर लें और विवाद को समाप्त करें। प्रशासन की तरफ से अगर कोई गलती हुई है तो उसकी जांच होगी।"
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केशव मौर्य के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, "डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के अंदर कम से कम यह समझ तो है कि प्रशासन ने गलती की है। वह एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह बात कर रहे हैं। उन्हें एहसास है कि एक धर्माचार्य का अपमान हुआ है। ऐसे समझदार और जिम्मेदार व्यक्ति को ही उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होना चाहिए।"
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राजनीतिक विश्लेषक इसे बीजेपी के अंदरूनी समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं। केशव मौर्य और योगी आदित्यनाथ के बीच सत्ता संतुलन की खबरें अक्सर आती रहती हैं। ऐसे में शंकराचार्य का खुलेआम मौर्य को सीएम पद के लिए योग्य बताना, योगी खेमे के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
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विवाद की मुख्य वजह 18 जनवरी (मौनी अमावस्या) को शंकराचार्य की पालकी (Palanquin) को संगम नोज तक जाने से रोकना था। प्रशासन का तर्क था कि भीड़ बहुत ज्यादा है और पालकी से भगदड़ मच सकती है। प्रशासन ने उन्हें गाड़ी से जाने या पैदल जाने का विकल्प दिया था, जिसे शंकराचार्य ने अपनी परंपरा के खिलाफ बताकर ठुकरा दिया।
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इस पर शंकराचार्य ने शनिवार को तीखा सवाल पूछा। उन्होंने कहा, "मेले में हाथी घूम सकता है, बुलडोजर चल सकता है, वीआईपी की बड़ी-बड़ी गाड़ियां फर्राटा भर सकती हैं, उनसे भगदड़ नहीं मचती? लेकिन चार आदमियों के कंधे पर चलने वाली हमारी पालकी से भगदड़ मच जाएगी? यह कैसा तर्क है? यह सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि हठधर्मिता का मामला है।"
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उन्होंने कहा कि "प्रशासन जिद पर अड़ा है। जिद करना एक प्रशासक (Administrator) का गुण नहीं होता। प्रशासक को फ्लेक्सिबल (लचीला) होना चाहिए ताकि काम सुचारू रूप से चले। अगर वो जिद कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि उनके पीछे कोई और शक्ति है जो उन्हें ऐसा करने के लिए कह रही है। जो जिद करके बैठा है, वह कुफल भोगेगा।"
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नोटिस का खेल: "सिद्ध करो तुम शंकराचार्य हो"
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माघ मेला प्रशासन और शंकराचार्य के बीच 'नोटिस वॉर' (Notice War) भी चल रहा है। अब तक प्रशासन ने दो नोटिस भेजे हैं:
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पहला नोटिस (19 जनवरी): प्रशासन ने पूछा कि सुप्रीम कोर्ट में शंकराचार्य पद को लेकर विवाद लंबित है, तो वे अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' क्यों लिख रहे हैं? 24 घंटे में जवाब मांगा गया।
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दूसरा नोटिस (22 जनवरी): इसमें कहा गया कि क्यों न उन्हें आवंटित जमीन और सुविधाएं वापस ले ली जाएं और उन्हें भविष्य में मेले में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया जाए।
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शंकराचार्य की ओर से उनके वकीलों ने जवाब दिया है। जवाब में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके पट्टाभिषेक (Coronation) पर रोक लगाई थी, लेकिन 'शंकराचार्य' की उपाधि के उपयोग पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है। उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। वकीलों ने यह भी कहा कि द्वारका और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्यों ने उन्हें मान्यता दी है। शंकराचार्य ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि वे या तो माफी मांगें या कोर्ट में घसीटे जाने के लिए तैयार रहें।
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खुले आसमान के नीचे बिगड़ी तबीयत
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शुक्रवार (23 जनवरी) को सातवें दिन धरने पर बैठे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत अचानक बिगड़ गई। कड़ाके की ठंड, कोहरा और ओस के बीच खुले आसमान के नीचे रहने के कारण उन्हें बुखार और शरीर में जकड़न की शिकायत हुई।
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इस बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, "हमारा शरीर खुले में और ओस में रहने का आदी नहीं है। यहां ठंड के बीच लगातार बाहर रहने से बुखार हो गया था। हमने दवा ले ली है और गरम कपड़े ओढ़कर बैठे हैं। अब काफी आराम है। लेकिन शरीर रहे या जाए, हम अपने संकल्प से नहीं डिगेंगे।"
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उनके अनुयायियों में इसे लेकर भारी आक्रोश है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी प्रशासन की आलोचना की है कि एक पूज्य संत को इस तरह ठंड में ठिठुरने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
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घटनाक्रम: अब तक कब-कब क्या हुआ?
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इस पूरे विवाद को सिलसिलेवार तरीके से समझना जरूरी है:
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18 जनवरी 2026 (मौनी अमावस्या): स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने अनुयायियों के साथ पालकी में बैठकर संगम स्नान के लिए निकले। प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर उन्हें रोक दिया। पुलिस और अनुयायियों के बीच धक्का-मुक्की हुई। शंकराचार्य ने बिना स्नान किए वापस लौटकर शिविर के बाहर धरना शुरू कर दिया।
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19 जनवरी 2026: मेला प्रशासन ने पहला नोटिस जारी किया, जिसमें 'शंकराचार्य' शब्द के इस्तेमाल पर स्पष्टीकरण मांगा गया। नोटिस आधी रात को तामील कराया गया।
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20 जनवरी 2026: कांग्रेस और सपा कार्यकर्ताओं ने शंकराचार्य के समर्थन में प्रयागराज कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया और पुलिस पर अभद्रता का आरोप लगाया।
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22 जनवरी 2026: प्रशासन ने दूसरा नोटिस भेजा, जिसमें सुविधाएं रद्द करने की चेतावनी दी गई। उसी दिन सीएम योगी ने सोनीपत में 'कालनेमि' वाला बयान दिया।
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23 जनवरी 2026: शंकराचार्य की तबीयत बिगड़ी। उन्होंने वैन में विश्राम किया। शाम को मीडिया से बात करते हुए सीएम योगी को 'असली कालनेमि' बताया और केशव मौर्य की तारीफ की।
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24 जनवरी 2026 (आज): शंकराचार्य अपनी मांग पर अडिग हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि माफी मिलने तक आंदोलन जारी रहेगा।
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गो-हत्या पर भाजपा की दुखती रग
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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का गो-हत्या पर बयान भाजपा के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है। उन्होंने जिस तरह से भाजपा विधायक नंद किशोर गुर्जर के बयान (50,000 गायें कटने का दावा) को आधार बनाया है, उससे सरकार बैकफुट पर है।
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शंकराचार्य का कहना है, "हम सरकार से केवल इतना मांग रहे हैं कि गो-हत्या पूरी तरह बंद हो और गाय को 'राष्ट्रमाता' घोषित किया जाए। अगर सरकार यह कर देती है, तो हमारा मुंह अपने आप बंद हो जाएगा। लेकिन वो ऐसा करने के बजाय हमें ही टारगेट कर रहे हैं।"
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धर्म और सत्ता का टकराव
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प्रयागराज का माघ मेला 2026 अब धर्म और सत्ता के बीच शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन गया है। एक तरफ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद हैं, जो अपनी परंपरा और आत्मसम्मान के लिए अड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ का प्रशासन है, जो नियमों और कानून का हवाला दे रहा है।
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लेकिन इस विवाद ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या प्रशासन द्वारा एक शंकराचार्य को नोटिस भेजना और उन्हें 'नकली' साबित करने की कोशिश करना उचित है? क्या 'कालनेमि' जैसे शब्दों का प्रयोग संतों के लिए मर्यादित है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह विवाद आने वाले समय में भाजपा के हिंदुत्व के किले में दरार डाल सकता है? फिलहाल, शंकराचार्य अपनी पालकी के पास डटे हैं और प्रशासन अपने नोटिस के साथ। देखना होगा कि यह 'धर्मयुद्ध' किस अंजाम तक पहुंचता है।
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प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच तकरार सातवें दिन भी जारी है। प्रशासन द्वारा नोटिस भेजे जाने और सुविधाएं छीनने की धमकी पर शंकराचार्य ने कहा कि वे "टुकड़ों पर पलने वाले लोग नहीं हैं।" उन्होंने सीएम योगी के 'कालनेमि' वाले बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि जिसके राज में गो-हत्या हो रही है, वही असली कालनेमि है। वहीं, उन्होंने डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की तारीफ करते हुए उन्हें सीएम पद के लिए योग्य बताया। ठंड के कारण शंकराचार्य की तबीयत भी नासाज है, लेकिन वे माफी मंगवाने की जिद पर अड़े हैं।
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