शिक्षा जिसे समाज में सबसे पवित्र और सम्मानजनक पेशा माना जाता है, उसे चंद शातिर दिमागों ने 'धंधा' बना दिया है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस ने एक ऐसे 'एजुकेशन माफिया' (Education Mafia) का पर्दाफाश किया है, जिसने शिक्षा व्यवस्था की साख पर बट्टा लगा दिया है। गोमतीनगर पुलिस (Gomtinagar Police) ने एक अंतरराज्यीय गिरोह (Interstate Gang) का भंडाफोड़ किया है जो थोक के भाव में फर्जी डिग्रियां और मार्कशीट बांट रहा था।READ ALSO:-UP Weather Fury: यूपी में 'सफेद आफत' का राज; आगरा-अलीगढ़ में विजिबिलिटी हुई 'ज़ीरो', 39 जिलों में हाड़ कंपाने वाली ठंड का अलर्ट
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हैरानी की बात यह है कि इस गिरोह का सरगना कोई अनपढ़ अपराधी नहीं, बल्कि खुद एक पीएचडी होल्डर (PhD Holder) है। उसने अपनी शिक्षा और बुद्धि का इस्तेमाल समाज को शिक्षित करने में नहीं, बल्कि 15 करोड़ रुपये का फर्जी साम्राज्य खड़ा करने में किया। पुलिस ने छापेमारी कर 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया है और उनके पास से देश की 25 नामचीन यूनिवर्सिटीज की 900 से अधिक फर्जी डिग्रियां बरामद की हैं।
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डीसीपी पूर्वी शशांक सिंह ने इस बड़े खुलासे की जानकारी दी। अब पुलिस की रडार पर वो 1500 लोग भी हैं, जिन्होंने पैसे के दम पर ये फर्जी डिग्रियां खरीदीं और अब विभिन्न संस्थानों में नौकरियां कर रहे हैं।
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दुकान की तरह सजा रखा था 'डिग्री का मेन्यू'

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पुलिस की पूछताछ में जो खुलासे हुए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। आरोपियों ने फर्जी डिग्रियां बेचने के लिए बाकायदा एक 'रेट कार्ड' (Rate Card) तय कर रखा था। जैसे सब्जी मंडी में भाव तय होते हैं, वैसे ही यहां शिक्षा का सौदा होता था। छात्र की जरूरत और उसकी जेब के हिसाब से डिग्री तैयार की जाती थी।
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गिरोह का 'रेट कार्ड':

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    BA/MA (स्नातक/परास्नातक): 15,000 रुपये से 25,000 रुपये तक।
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    B.Tech/MBA (प्रोफेशनल कोर्स): 50,000 रुपये से 1 लाख रुपये तक।
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    PhD (डॉक्टरेट): 2 लाख रुपये से 4 लाख रुपये तक।
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पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह इतना शातिर था कि डिग्री के साथ-साथ माइग्रेशन सर्टिफिकेट, प्रोविजनल सर्टिफिकेट और मार्कशीट भी हूबहू असली जैसी तैयार करता था, ताकि किसी को शक न हो।
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कौन है मास्टरमाइंड? (The Mastermind)

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गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान अयोध्या निवासी सत्येंद्र द्विवेदी, उन्नाव निवासी अखिलेश कुमार और लखीमपुर खीरी निवासी सौरभ शर्मा के रूप में हुई है।
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इस पूरे खेल का असली खिलाड़ी और मास्टरमाइंड सत्येंद्र द्विवेदी है।

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    योग्यता: सत्येंद्र ने समाजशास्त्र (Sociology) में पीएचडी कर रखी है। वह शिक्षा प्रणाली की हर बारीकी, खामी और यूनिवर्सिटी के कामकाज के तरीके से वाकिफ था।
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    मोडस ऑपरेंडी: सत्येंद्र अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर उन छात्रों को टारगेट करता था जो या तो फेल हो गए थे, या जिनके पास पढ़ाई का समय नहीं था लेकिन नौकरी के लिए डिग्री चाहिए थी। उसने अपने ज्ञान का इस्तेमाल ठगी का नेटवर्क बनाने में किया।
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15 करोड़ का साम्राज्य और 1500 'फर्जी' डिग्रीधारी

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डीसीपी पूर्वी शशांक सिंह ने बताया कि यह गिरोह साल 2021 से सक्रिय था। पिछले तीन-चार सालों में इन्होंने अपनी जड़ें काफी गहरी कर ली थीं।
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    कुल बिक्री: अब तक यह गैंग लगभग 1500 लोगों को फर्जी डिग्रियां बेच चुका है।
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    कमाई: पुलिस के अनुमान के मुताबिक, इन फर्जी दस्तावेजों के जरिए गिरोह ने करीब 15 करोड़ रुपये की काली कमाई की है।
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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन 1500 लोगों ने ये डिग्रियां खरीदीं, उनमें से अधिकांश अब प्राइवेट सेक्टर, कॉर्पोरेट कंपनियों और शायद कुछ सरकारी संविदा नौकरियों में भी तैनात हो सकते हैं। एक अयोग्य व्यक्ति डॉक्टर, इंजीनियर या मैनेजर बनकर समाज के लिए खतरा बना हुआ है।
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25 नामचीन विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जीवाड़ा

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पुलिस की छापेमारी में आरोपियों के पास से जो जखीरा बरामद हुआ है, उसने कई बड़े संस्थानों की सुरक्षा और साख पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोपी देश के करीब 25 नामचीन विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जी डिग्रियां छाप रहे थे।
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इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

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    स्वामी विवेकानंद सुभारती यूनिवर्सिटी, मेरठ
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    कलिंगा यूनिवर्सिटी, छत्तीसगढ़
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    साबरमती यूनिवर्सिटी, गुजरात
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बरामदगी की सूची: पुलिस ने आरोपियों के ठिकाने से भारी मात्रा में आपत्तिजनक सामग्री जब्त की है:
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    923 बनी हुई और अधबनी फर्जी डिग्रियां/मार्कशीट।
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    15 विभिन्न विश्वविद्यालयों और अधिकारियों की फर्जी रबर स्टैम्प (मोहरें)।
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    6 लैपटॉप और हाई-क्वालिटी प्रिंटर, जिनका इस्तेमाल दस्तावेज छापने में होता था।
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    भारी मात्रा में होलोग्राफिक स्टिकर्स और ब्लैंक लेटरहेड्स।
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अब उन 1500 लोगों की खैर नहीं!

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लखनऊ पुलिस का एक्शन सिर्फ इन तीन आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहेगा। डीसीपी शशांक सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि अब जांच का दायरा बढ़ाया जाएगा।
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    डेटा रिकवरी: पुलिस आरोपियों के लैपटॉप और मोबाइल से उन 1500 छात्रों/ग्राहकों का डेटा रिकवर कर रही है जिन्होंने ये डिग्रियां खरीदी हैं।
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    नौकरी पर खतरा: पुलिस उन संस्थानों और कंपनियों को पत्र लिखेगी जहां ये लोग फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ भी धोखाधड़ी (420 IPC) का मुकदमा दर्ज हो सकता है और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ सकती है।
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    कानूनी गाज: पुलिस का कहना है कि फर्जी दस्तावेज खरीदना और उसका इस्तेमाल करना भी उतना ही बड़ा अपराध है जितना उसे बनाना।
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कैसे चलता था धंधा?

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पूछताछ में पता चला है कि यह गिरोह सोशल मीडिया और एजेंटों के माध्यम से काम करता था। वे 'एजुकेशन कंसल्टेंसी' के नाम पर ऑफिस खोलते थे या ऑनलाइन विज्ञापन देते थे कि "फेल छात्र पास हों" या "बैठकर डिग्री पाएं"। जब कोई जरूरतमंद संपर्क करता, तो उसे भरोसा दिलाया जाता कि डिग्री 'बैक डेट' में असली यूनिवर्सिटी से दिलवाई जाएगी। लेकिन असल में, वे अपने लैपटॉप पर ही डिग्री डिजाइन करके प्रिंट कर देते थे।
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शिक्षा व्यवस्था के लिए अलार्म

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यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर सत्यापन (Verification) की प्रक्रिया इतनी कमजोर क्यों है कि 1500 लोग फर्जी डिग्री लेकर सिस्टम में घुस गए? लखनऊ पुलिस की यह कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन यह भी जरूरी है कि जो लोग इन डिग्रियों के सहारे नौकरियां हथिया कर बैठे हैं, उन्हें भी सिस्टम से बाहर किया जाए।
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पुलिस ने आम जनता से भी अपील की है कि वे डिग्री के शॉर्टकट के चक्कर में न पड़ें, क्योंकि अंत में इसका परिणाम जेल और बदनामी ही होता है।
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